आरएसएस राहुल गांधी की मान्यता के लिए इतना बेकरार क्यों?
वक़्त बेवक़्त,28 Oct, 2024
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं को इसका काफ़ी मलाल है कि राहुल गाँधी उनसे नहीं मिलते। उनका कहना है कि वे किस मुहब्बत की बात करते हैं जब हमसे गले नहीं मिलते। आर एस एस किसी से मुहब्बत चाहता है, यह सुनकर किसी का भी हँसते हँसते पेट फट सकता है। लेकिन...
आर एस एस से राहुल गाँधी नहीं मिलते, इस वाक्य का क्या मतलब है? क्या आर एस एस प्रमुख ने कभी राहुल गाँधी से मिलने की इच्छा जतलाई है? मिलने को समय माँगा? अगर प्रमुख नहीं तो किसी दूसरे पदाधिकारी ने? इसका कोई प्रमाण हमारे पास नहीं कि राहुल गाँधी को ऐसा पत्र लिखा गया और उन्होंने उसका उत्तर नहीं दिया या मिलने से इनकार कर दिया।आर एस एस ने चूँकि यह नहीं बतलाया है,हम यही मान सकते हैं कि राहुल के मिलने न मिलने का सवाल तभी पैदा होता जब संघ की तरफ़ से कोई अनुरोध उन्हें जाता।
पिछले दो सालों में अलग अलग क़िस्म के लोगों को राहुल गाँधी से मिलते देखा है। ‘भारत जोड़ो’ यात्रा के दौरान अनेक ऐसे लोग उनसे मिले जो उनके आलोचक या विरोधी रहे हैं। कई बुद्धिजीवी, व्यवसायी, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक कार्यकर्ता उनसे मिले और लंबी चर्चाएँ कीं। यह शिकायत हमने नहीं सुनी कि किसी ने राहुल गाँधी से मिलना चाहा हो और उन्होंने मिलने से इनकार कर दिया हो। क्या इस यात्रा के दौरान आर एस एस के किसी पदाधिकारी ने उनसे मिलना चाहा? राहुल गाँधी ने तो कहा था कि जो भी भारत के जोड़ने यानी यहाँ के लोगों को आपस में जोड़ने में आयक़ीन करता है, यात्रा में आ सकता है। आर एस एस के पदाधिकारी दो कदम ही इसमें क्यों नहीं चले?
अगर आर एस एस ने अपनी तरफ़ से कोई पहल नहीं की फिर भी वह राहुल गाँधी के उससे न मिलने को लेकर दुखी है तो संभवतः आर एस एस यह कहना चाहता है कि राहुल गाँधी ने उससे मिलने की इच्छा क्यों नहीं जतलाई। वे क्यों झंडेवालान के उसके दफ़्तर या नागपुर के हेडगेवार भवन नहीं गए? या उन्होंने आर एस एस के प्रमुख या उसके किसी नेता से मिलने के लिए पत्र क्यों नहीं लिखा?
इन सवालों से परे हमें याद रखना ज़रूरी है कि आर एस एस की महत्त्वाकांक्षा एक ऐसे संगठन के रूप में स्वीकृति की है भारत के प्रत्येक समुदाय के लोग जिसकी छत्रछाया में रहने की याचना करें। इसलिए उसने ख़ुद को सांस्कृतिक संगठन के रूप में प्रचारित किया। संस्कृति जीवन के हर क्षेत्र से जुड़ी है इसलिए वह हर इलाक़े में नेतृत्वकारी भूमिका चाहता है।वास्तव में वह एक राजनीतिक संगठन है जिसका इरादा भारत पर क़ब्ज़े का है। राजनीतिक होते ही उसे प्रतियोगिता का सामना करना पड़ेगा। लेकिन वह ख़ुद को प्रतियोगिताओं से परे, सबके ऊपर दिखलाना चाहता है। इसलिए वह ख़ुद को ग़ैर राजनीतिक दिखलाना चाहता है।
वह सबकी स्वीकृति या मान्यता चाहता है। बल्कि यह कहना चाहता है कि हर किसी को उसकी तरफ़ से मान्यता मिलनी चाहिए जिससे उनकी वैधता सिद्ध हो। वह यह भी दिखलाना चाहता है कि वह सारे दलों, विचारधाराओं से ऊपर है और वह हर किसी से संवाद करना चाहता है। इसलिए अगर कोई उससे बात नहीं कर रहा, तो गलती उसकी है, आर एस एस की नहीं।
इस इनकार के पहले नेहरू एक बार गोलवलकर से मिलने को तैयार हुए थे 1947 में। गोलवलकर के अनुरोध पर हुई उनकी यह मुलाक़ात काफ़ी तनावपूर्ण रही। गोलवलकर ने नेहरू को समझाने का प्रयास किया कि आर एस एस जैसे संगठन की भारत को ज़रूरत है ताकि वह विश्व पर अपना असर डाल सके। नेहरू ने इस पर गोलवलकर को डाँट लगाई और कहा कि ऐसी ताक़त को कभी शैतानी नहीं होना चाहिए। फिर गोलवलकर ने यह सिद्ध करने के लिए देर तक तर्क किया कि सांप्रदायिक हिंसा में संघ की कोई भूमिका नहीं है।नेहरू यह झूठ सुनने के मूड में न थे।अपने अधिकारियों को इस बैठक के बारे में लिखते समय नेहरू ने गोलवलकर का नाम तक लेना ज़रूरी नहीं समझा। बाद में उन्होंने गोलवलकर के पत्रों का उत्तर देना भी ज़रूरी नहीं समझा।
गोलवलकर ने इनकार किया। धीरेंद्र झा ने मणि बेन की डायरी के हवाले से बतलाया है गाँधी को चूँकि इसपर भरोसा था कि बुरे से बुरे लोगों में सुधार लाया जा सकता है, उन्होंने गोलवलकर और आर एस एस को मौक़ा देना मुनासिब समझा।उन्होंने आर एस एस प्रमुख से कहा कि आर एस एस के ऊपर लग रहे आरोपों से और हिंसक गतिविधियों से ख़ुद को अलग करते हुए संघ प्रमुख को बयान देना चाहिए। लेकिन गोलवलकर ने ऐसा करने से इनकार कर दिया और गाँधी को कहा कि वे अपनी तरफ़ से यह बात कह सकते हैं। गाँधी ने गोलवलकर से हुई बात को इसी प्रकार प्रार्थना सभा में कहा। गोलवलकर की चतुराई साफ़ थी। हिंसा से ख़ुद अलग करते हुए और उसे ग़लत ठहराते हुए कोई सार्वजनिक बयान आर एस एस प्रमुख उस वक्त देता तो उसके कार्यकर्ताओं में भारी भ्रम फैलता क्योंकि उन्हें तो हिंसा के लिए संगठित किया जा रहा था।
नेहरू और गाँधी का समझौता विहीन रुख़ छोड़ दें तो ऐसे नेता भारत में थे जो संघ के निर्दोषिता के दावे पर या ख़ुद को बदलने के उसके वादे पर भरोसा करना चाहते थे। पटेल उनमें एक थे। नेहरू के देश से बाहर रहते हुए उन्होंने गोलवलकर की भेंट का अनुरोध मान लिया। इस मुलाक़ात के बारे में बाद में नेहरू को पटेल ने लिखा कि लगता है इन लोगों को अकल आ रही है।उन्होंने गोलवलकर को हिंसा और घृणा का रास्ता छोड़कर मानवता और सद्भाव की राह पर आने को कहा। संविधान के प्रति वफ़ादारी के लिए कहा। पटेल जब उसे अपना रास्ता बदलने को कह रहे थे तो इसका मतलब यही है न कि इसके पहले वे मानते थे कि आर एस एस ग़लत रास्ते पर था?
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