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Showing posts from September, 2023

बुद्धदेब दासगुप्ता को क्यों लगा कि देश अब रहने लायक नहीं?

          वक़्त  बेवक़्त          31 Dec, 2018 देश में ऐसा क्या हो गया है कि लोगों को ख़तरा महसूस होने लगा है? क्या स्थितियाँ इतनी ख़राब हो गई हैं कि सचमुच लगने लगा है जैसे हम इस देश में और रह नहीं सकते? पिछले चार वर्षों से लेखकों, कलाकारों, फ़िल्मकारों और बुद्धिजीवियों के ख़िलाफ़ पूरा राजकीय तंत्र आक्रामक क्यों है? क्या इसलिए कि वे राष्ट्र से सवाल पूछ रहे हैं और उसे अपनी कसौटी पर कस रहे हैं? “... सचमुच लगने लगा है जैसे हम इस देश में और रह नहीं सकते।” फ़िल्मकार बुद्धदेव दासगुप्ता ने किंचित खिन्नता से अपनी वेदना प्रकट की जब टेलीग्राफ़ अख़बार के प्रसून चौधरी ने उनसे नसीरुद्दीन शाह पर हो रहे हमलों का ज़िक्र किया। बुद्धदेव बाबू ने कहा, “चूँकि यह नसीर के साथ हुआ, यह बड़ी ख़बर है लेकिन यह तो आज हर किसी के साथ हो रहा है। यह सिर्फ़ कलाकारों के साथ नहीं हो रहा, प्रत्येक नागरिक आज ख़ुद को ख़तरे में महसूस कर रहा है। चीज़ें इतनी ख़राब हो गई हैं कि सचमुच लगने लगा है जैसे हम इस देश में और रह नहीं सकते।” बुद्धदेव दासगुप्ता का जीवन यथा...

जब गुजरात हिंसा ही हिंसकों को पढ़ा गई प्यार का पाठ...

           वक़्त  बेवक़्त            07 Jan, 2019 हिंसा और नफ़रत से जुड़े प्रश्न आज सबसे अहम हो गए हैं। किसी एक देश या सभ्यता के लिए नहीं, यह एक सार्वभौम प्रश्न और चुनौती है कि घृणा और हिंसा को कैसे समझा जाए और कैसे उन पर काबू पाया जाए? यह तभी हो सकता है जब हिंसा का कारण मालूम हो। ये कारण वे हैं जिन्हें बदलना है इसलिए समझना भी उन्हें ज़्यादा ज़रूरी है। क्या नफ़रत करनेवाला प्यार करनेवाले में बदल सकता है? क्या घृणा स्थायी भाव है? घृणा के बारे में व्यक्तियों के सन्दर्भ में और समूहों के सन्दर्भ में अलग-अलग बात करने की ज़रूरत है? क्या समूहगत घृणा का स्वरूप अलग होता है? क्या घृणा अपने आप में हिंसा है, क्या वह हिंसा को अनिवार्यतः जन्म देती है? क्या वह टाइम बम की तरह हम सबके भीतर है?  इक्कसवीं सदी में ये प्रश्न सबसे अहम हो गए हैं। किसी एक देश या सभ्यता के लिए नहीं, यह एक सार्वभौम प्रश्न और चुनौती है कि घृणा और हिंसा को कैसे समझा जाए और कैसे उन पर काबू पाया जाए? घृणा और हिंसा को पूरी तरह समाप्त करना खामख्याली ही, ऐसा...

बहुसंख्यकवाद के दौर में धैर्य और अधैर्य पर गाँधी ने क्या कहा था?

      , वक़्त  बेवक़्त          14 Jan, 2019 धैर्य और अधैर्य को लेकर पुत्र देवदास गाँधी और पिता मोहनदास करमचंद गाँधी के बीच  संवाद हुआ था। उसी अधीर गाँधी के जन्म के हम डेढ़ सौवें साल में हम हैं। बहुसंख्यकवाद के प्रति अपने अधैर्य के चलते अपनी जान गँवानेवाले गाँधी की ह्त्या के सत्तर साल भी पूरे हुए। हमें भी धैर्य और अधैर्य में चुनाव करना है। 'हम भारतीय पर्याप्त बेसब्र नहीं हैं', इस बार की अपनी भारत यात्रा में  मशहूर अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने यह शिकायत की। बुज़ुर्ग सब्र की नसीहत देते पाए गए हैं, लेकिन हमारा यह बुज़ुर्गवार अध्यापक हमें अधैर्य की शिक्षा दे रहा है। ज्यां द्रेज़ के साथ अपनी पिछली किताब में भारत की दुर्दशा का वर्णन करने के बाद उन दोनों ने एक अध्याय लिखा,'बेसब्री की ज़रूरत'। सेन ज़िंदगी का लंबा हिस्सा भारत से बाहर गुजारने के बावजूद मानसिक रूप से भारत में रहते आए हैं। वे विश्व नागरिक हैं, रवीन्द्रनाथ टैगोर की परम्परा में, इंग्लेंड और अमरीका में लंबा वक़्त गुज़ारा है लेकिन भावनात्मक तौर पर वे भारत के ही नागरिक ...

सकारात्मकता : हुक़्म मानने की मानसिकता या आज़ादी की?

         वक़्त  बेवक़्त        21 Jan, 2019 मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने एक मुक़दमे के दौरान वकील प्रशांत भूषण को ‘पॉज़िटिव’ रहने की सलाह दी। प्रधानमंत्री के अधिकतर समर्थक तो अक्सर विरोधियों को नकारात्मक क़रार देते रहते हैं। क्या नकारात्मक कहने की जगह शायद आलोचनात्मक कहना अधिक मुनासिब नहीं होगा?  मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने एक मुक़दमे के दौरान वकील प्रशांत भूषण को ‘पॉज़िटिव’ रहने की सलाह दी। पॉज़िटिव की हिंदी सकारात्मक है, लेकिन इस शब्द का इस्तेमाल करते ही कई लोग इसे कठिन या क्लिष्ट बताकर नाक भौं सिकोड़ लेंगे। हम लेकिन अभी भाषा पर बात नहीं कर रहे हैं, न्यायमूर्ति के सकारात्मकता के आग्रह पर कुछ सोच रहे हैं। न्यायमूर्ति ने कहा, ‘मुझे यक़ीन है कि आप इस दुनिया को रहने के लिए एक बेहतर जगह बनाना चाहते हैं। ऐसा करने का एक तरीक़ा यह है कि आप चीज़ों को सकारात्मक रवैये से देखना शुरू करें। चीज़ों को नकारात्मक दृष्टि से न देखें। चीज़ों के प्रति सकारात्मक नज़रिया अपनाएँ। दुनिया काफ़ी बेहतर जगह हो जाएगी। कल से ही ऐसा करके देखिए।’ जैसा पुर...