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Showing posts from September, 2024

बिना अनुभवों की साझेदारी के जनतांत्रिकता मुमकिन नहीं

  22/09/2024   अंतरराष्ट्रीयता का मेल हुए बिना राष्ट्रवाद एक संकरी ज़हनीयत का दूसरा नाम होगा जिसमें हम अपने दड़बों में बंद दूसरों को ईर्ष्या और प्रतियोगिता की भावना के साथ ही देखेंगे. कविता में जनतंत्र स्तंभ की 34वीं और अंतिम क़िस्त. सच्चाइयां जो गंगा के गोमुख से मोती की तरह बिखरती रहती हैं हिमालय की बर्फ़ीली चोटी पर चांदी के उन्मुक्त नाचते परों में झिलमिलाती रहती हैं जो एक हज़ार रंगों के मोतियों का खिलखिलाता समंदर है उमंगों से भरी फूलों की जवान कश्तियां कि वसंत के नए प्रभात सागर में छोड़ दी गई हैं. ये पूरब पश्चिम मेरी आत्मा के ताने-बाने हैं मैंने एशिया की सतरंगी किरनों को अपनी दिशाओं के गिर्द लपेट लिया और मैं यूरोप और अमरीका की नर्म आंच की धूप-छांव पर बहुत हौले-हौले नाच रहा हूं सब संस्कृतियां मेरे सरगम में विभोर हैं क्योंकि मैं हृदय की सच्ची सुख-शांति का राग हूं बहुत आदिम, बहुत अभिनव. हम एक साथ उषा के मधुर अधर बन उठे सुलग उठे हैं सब एक साथ ढाई अरब धड़कनों में बज उठे हैं सिम्फ़ोनिक आनंद की तरह यह हमारी गाती हुई एकता संसार के पंच परमेश्वर का मुकुट पहन अमरता के सिंहासन पर आज हमारा...

हिन्दी की चिन्ता में कौन दुबला हुआ जा रहा है?

वक़्त  बेवक़्त,  16 Sep, 2024 “अंग्रेज़ी माध्यम स्कूलों में पढ़नेवाले बच्चे अपनी संस्कृति और परंपराओं से दूर हो गए हैं।” मध्य प्रदेश के संस्कृति और पर्यटन मामलों के मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी ने हिंदी दिवस के मौक़े पर यह दुख प्रकट किया। उनका कहना था कि ऐसे बच्चे पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण करने लगे हैं।  मंत्री महोदय ने आगे हिंदी में इसका उदाहरण प्रस्तुत किया: “ हमारे पूर्वज कहा करते थे:असतो मा सद् गमय , तमसो मा ज्योतिर्गमय”। लेकिन अंग्रेज़ी माध्यम स्कूलों में पढ़नेवाले बच्चे मोमबत्ती जलाकर उसे फूँक मारकर बुझा देते हैं, यानी वे प्रकाश से अंधकार में चले जाते हैं। और जिस केक पर मोमबत्ती फूँकी जाती है, जिसपर थूक पड़ता है, उसे सब खाते हैं और सोचते हैं कि वे प्रगतिशील हो गए हैं।” मंत्री महोदय उस तस्वीर को भूल गए जिसमें उनके सर्वोच्च  नेता अपने मार्गदर्शक के जन्मदिन पर केक काटकर उन्हें खिलाते दीख रहे हैं या ख़ुद भारतीय जनता पार्टी के सदस्य गण इस नेता के जन्मदिन पर केक काटने की प्रतियोगिता कर रहे हैं! कौन 71 किलो का केक काटेगा या 71 केक काटे जाएँगे या 71 फीट लंबा केक काटा जा...

दुनिया का हर जनतंत्र अधूरा है क्योंकि उसने औरत को पढ़ने का तरीक़ा पूरा सीखा ही नहीं

  08/09/2024 दुनिया भर के हर देश और समाज को औरत को पहचानने में, उन्हें समझने, उनके साथ इंसानी रिश्ता क़ायम करने में में काफ़ी लंबा वक़्त लगा. उसकी वजह थी समाज और तंत्र की उसमें दिलचस्पी का अभाव. लगता है कि वह देखता है लेकिन असल में देखता नहीं. कविता में जनतंत्र स्तंभ की 33वीं क़िस्त. पढ़ा गया हमको जैसे पढ़ा जाता है काग़ज़ बच्चों की फटी कॉपियों का चनाजोर गर्म के लिफ़ाफ़े बनाने के पहले! देखा गया हमको जैसे कि कुफ़्त हो उनींदे देखी जाती है कलाई घड़ी अलस्सुबह अलार्म बजने के बाद! सुना गया हमको यों ही उड़ते मन से जैसे सुने जाते हैं फ़िल्मी गाने सस्ते कैसेटों पर ठसाठस्स भरी हुई बस में! भोगा गया हमको बहुत दूर के रिश्तेदारों के दुख की तरह! एक दिन हमने कहा हम भी इंसान हैं— हमें क़ायदे से पढ़ो एक-एक अक्षर जैसे पढ़ा होगा बीए के बाद नौकरी का पहला विज्ञापन! देखो तो ऐसे जैसे कि ठिठुरते हुए देखी जाती है बहुत दूर जलती हुई आग! सुनो हमें अनहद की तरह और समझो जैसे समझी जाती है नई-नई सीखी हुई भाषा! इतना सुनना था कि अधर में लटकती हुई एक अदृश्य टहनी से टिड्डियां उड़ीं और रंगीन अफ़वाहें चीख़ती हुई चीं-चीं ‘द...

तमिलनाडु का महाविष्णु प्रसंगः स्कूल राष्ट्रीय चेतना फैलायें या वैज्ञानिक चेतना?

    वक़्त  बेवक़्त,   09 Sep, 2024 तमिलनाडु की सरकार एक समिति गठित करने पर विचार कर रही है जो  तय करेगी कि राज्य के सरकारी स्कूलों में किस तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। वह संभवतः यह भी बताए कि कार्यक्रमों में किस प्रकार के लोग, अतिथि, वक्ता बुलाए जा सकते हैं। सरकार ने यह ऐलान एक विवाद के बाद किया जो चेन्नई के अशोक नगर गर्ल्स सेकेंडरी स्कूल और सईदापेट मॉडल हायर सेकेंडरी स्कूल में एक ‘मोटिवेशनल’ वक्ता महाविष्णु के भाषण के बाद पैदा हुआ।  'परंपोरूल फाउंडेशन' के महाविष्णु ने दोनों जगहों पर  छात्रों को अपने पिछले जन्मों में किए गए कर्मों के फल के बारे में भाषण दिया। महाविष्णु ने छात्रों को बतलाया कि लोग गरीब या विकलांग इसलिए पैदा होते हैं कि उन्होंने पिछले जन्मों में बुरे कर्म किए होते हैं। वह आज जिस हाल में हैं, वह पिछले जन्मों के कर्म का फल है। महाविष्णु ने अंग्रेजों पर आरोप लगाया कि उन्होंने भारत की गुरुकुल व्यवस्था नष्ट कर दी। महाविष्णु ने यह भी दावा किया कि हमारे पास ऐसे श्लोक थे जिनसे बारिश हो सकती थी या जो रोगों को दूर कर सकते थे। यहाँ त...