बिना अनुभवों की साझेदारी के जनतांत्रिकता मुमकिन नहीं
22/09/2024 अंतरराष्ट्रीयता का मेल हुए बिना राष्ट्रवाद एक संकरी ज़हनीयत का दूसरा नाम होगा जिसमें हम अपने दड़बों में बंद दूसरों को ईर्ष्या और प्रतियोगिता की भावना के साथ ही देखेंगे. कविता में जनतंत्र स्तंभ की 34वीं और अंतिम क़िस्त. सच्चाइयां जो गंगा के गोमुख से मोती की तरह बिखरती रहती हैं हिमालय की बर्फ़ीली चोटी पर चांदी के उन्मुक्त नाचते परों में झिलमिलाती रहती हैं जो एक हज़ार रंगों के मोतियों का खिलखिलाता समंदर है उमंगों से भरी फूलों की जवान कश्तियां कि वसंत के नए प्रभात सागर में छोड़ दी गई हैं. ये पूरब पश्चिम मेरी आत्मा के ताने-बाने हैं मैंने एशिया की सतरंगी किरनों को अपनी दिशाओं के गिर्द लपेट लिया और मैं यूरोप और अमरीका की नर्म आंच की धूप-छांव पर बहुत हौले-हौले नाच रहा हूं सब संस्कृतियां मेरे सरगम में विभोर हैं क्योंकि मैं हृदय की सच्ची सुख-शांति का राग हूं बहुत आदिम, बहुत अभिनव. हम एक साथ उषा के मधुर अधर बन उठे सुलग उठे हैं सब एक साथ ढाई अरब धड़कनों में बज उठे हैं सिम्फ़ोनिक आनंद की तरह यह हमारी गाती हुई एकता संसार के पंच परमेश्वर का मुकुट पहन अमरता के सिंहासन पर आज हमारा...