अगर विश्वविद्यालय सार्वजनिक तौर पर विचारों की अभिव्यक्ति रोके तो वह अपने उद्देश्य से विमुख है
24/03/2024 सार्वजनिक हित और सत्ता में हमेशा तनाव रहता है. बल्कि कई बार सत्ता अपने हित को ही सार्वजनिक हित मानने के लिए बाध्य करती है. जनता को इस द्वंद्व के प्रति सजग रखना ज्ञान के क्षेत्र में काम करने वालों का काम है. उनका सार्वजनिक बोलना या लिखना उनके लिए नहीं जनता के हित के लिए ज़रूरी है . ‘तक़रीबन दो साल बाद… कृपा हुई. पिछले 6 साल में तीसरी बार सेवामुक्त हो रहा हूं.’ कवि, पत्रकार मुकेश कुमार का संदेश सुबह-सुबह आया. किसकी कृपा, समझना बहुत मुश्किल नहीं था. मुकेशजी कोई सवा दो साल से लवली यूनिवर्सिटी में मीडिया विभाग में अध्यापक और डीन थे. कल वे वहां से सेवा मुक्त हुए. हुए या होने को मजबूर किए गए. या उनकी यूनिवर्सिटी ने महसूस किया कि उनका और वहां होना उसके हित में नहीं है. पिछले 6 साल में तीसरी बार सेवामुक्ति. लवली यूनिवर्सिटी के पहले वे श्री गुरुगोविंद सिंह ट्राइसेंटटेनरी यूनिवर्सिटी(एसजीटी यूनिवर्सिटी), गुड़गांव और माखललाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से हटाए जा चुके हैं. इन संस्थानों से उन्हें बाहर किए जाने की वजह भी समझी जा सकती है. भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसे...