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Showing posts from April, 2024

Israel का समर्थन करके Arabs ने दिया Palestine को धोखा

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  https://youtu.be/mMb5Z8Ke0-E?s i=DhNmUj9jHrxtWULq

विश्वविद्यालयों के लिए क्यों ज़रूरी हैं समरवीर सिंह जैसे अध्यापक!

  वक़्त  बेवक़्त,  29 Apr, 2024 अगर यह होता कि समरवीर सिंह की जगह लेनेवाले उनके मुक़ाबले अधिक काबिल हैं तो भी कोई बात थी। लेकिन जैसा छात्रों ने बतलाया कि ये नए बहाल किए गए लोग पहले के अध्यापकों के मुक़ाबले बहुत कमतर हैं। यह बात समरवीर सिंह की न रहने की तकलीफ़ और बढ़ा देती है।  ‘कल समरवीर सिंह की पहली बरसी है। क्या आप उसमें हिस्सा लेंगे?’ एक छात्र का संदेश फ़ोन पर आया। मुझे झटका लगा। एक साल हो गया? समरवीर सिंह की आत्महत्या का एक साल? कुछ शर्म भी आई कि मुझे याद करना पड़ रहा है कि कब समरवीर ने ख़ुदकुशी से जान दी थी। ‘कहाँ?’, मैंने पूछा। मुझे लगा था कि शायद हिंदू कॉलेज में, जहाँ समरवीर पढ़ाते थे, यह स्मृति सभा हो रही हो। मेरा अनुमान ग़लत निकला। यह सभा ऑनलाइन होनी थी। बाद में आयोजक ने बतलाया कि कॉलेज में जगह मिलना मुश्किल थी। एक ‘एढाक’ अध्यापक की ख़ुदकुशी की याद कॉलेज की छवि के लिए ठीक न थी।  ऑनलाइन सभा में 30-35 लोग शामिल हुए। 4-5 अध्यापक, वे भी सब उस कॉलेज के नहीं। विद्यार्थी भी कई दूसरे कॉलेजों के। हिंदू कॉलेज के अध्यापकों को क्या इसकी ख़बर नहीं थी? या समरवीर सिंह क...

29 माओवादियों की मौत के लिए ज़िम्मेदार कौन- राज्य या खुद माओवादी?

    वक़्त  बेवक़्त    22 Apr, 2024 माओवादियों ने आरोप लगाया है कि भारतीय सुरक्षा बल के जवानों ने उनके 17 लोगों को पकड़कर मार डाला। ये उन 29 माओवादी लड़ाकों में शामिल हैं जिनके बारे में भारतीय सुरक्षा बल का दावा है कि वे सब उनसे मुठभेड़ में मारे गए हैं। यह हमला 16 अप्रैल को कांकेर इलाक़े में हुआ। अगर माओवादी कह रहे हैं कि उनमें से 17 मुठभेड़ में नहीं बल्कि ज़ख़्मी हालत में मार डाले गए जब वे लड़ने की स्थिति में नहीं थे तो भी वे यह तो स्वीकार कर ही रहे हैं कि यह मुठभेड़ हुई थी। उधर भारतीय सुरक्षा बल का कहना है कि माओवादी झूठ बोल रहे हैं। 29 के 29 माओवादी मुठभेड़ में ही मारे गए हैं। माओवादी अब लोगों की सहानुभूति लेने के लिए यह झूठ गढ़ रहे हैं। सच क्या है, जानना असंभव नहीं तो लगभग असंभव तो है ही। माओवादियों के ख़िलाफ़ यह कामयाब हमला छत्तीसगढ़ के कांकेर इलाक़े में हुआ। आस पास के गाँवों में रहनेवाले मुँह खोलने को तैयार नहीं हैं। सुरक्षा बल की बात पर यक़ीन करना अगर भोलापन है तो उतनी ही मूर्खता है माओवादियों के बयान को सच मान लेना। जो हो, यह तो सच है कि दोनों के बीच मुठभेड...

Modi’s elections or Dictator Aladeen’s Olympics?

  15 Apr 2024 Many in India are making comparisons between the upcoming elections and the rigged Olympic Games depicted in the 2012 comedy Dictator. They are not wrong. There is a  famous scene  in Sasha Baron Cohen’s 2012 comedy “Dictator”. Dictator Aladeen participates in a 100-metre race that is part of the Olympic Games that he himself organised. He has the pistol that announces the start of the race. He fires it after he starts running. As he runs ahead of his competitors, he shoots anyone who comes close to him. One by one, all the runners fall down – either with a bullet wound or out of fear. When Dictator Aladeen becomes visibly out of breath, the people holding the ribbon that makes up the finish line start running towards him. He crosses that ribbon and wins the race. We are then told that he has won a total of 14 medals in the Olympic Games. This scene has become quite popular on Indian social media since it was announced that elections for the 18th Lok Sabha w...

क्या भारत को सांस्कृतिक आज़ादी मिली ?

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  14.04.2024 https://youtu.be/AK5kZ25SVjs?si=0rBirOKl4z2hJM4r

क्या भारत अभी भी धर्मनिरपेक्ष देश है?

  वक़्त  बेवक़्त,   15 Apr, 2024 सुखद आश्चर्य हुआ कि भारत के बहुसंख्यक जन अभी भी मानते हैं कि उनका देश सारे धर्मों के लोगों का देश है।‘लोकनीति’ के नए देशव्यापी सर्वेक्षण में 79% लोगों ने कहा देश सबका है, सिर्फ़ 11% ने कहा कि यह मात्र हिंदुओं का देश है। चारों तरफ़ से रोज़ रोज़ जो खबर आती है, उससे मालूम होता है कि अलग-अलग विश्वासों के लोगों के साथ-साथ रहने का विचार इस देश में कब का तर्क कर दिया गया है। लेकिन यह सर्वेक्षण तो कुछ और कहता है। फिर इसकी व्याख्या कैसे करें?  कुछ वक्त पहले प्रकाशित प्यू सर्वेक्षण की रिपोर्ट में भी इस विषय पर कुछ मिलता जुलता निष्कर्ष था। उस सर्वेक्षण में भी  बहुमत ने कहा कि सभी धर्मों का सम्मान भारतीयता के मूल में है। इसलिए अगर ‘लोकनीति’ का सर्वेक्षण यही बात कहता है तो कुछ नया नहीं है। फिर भी अगर सर्वेक्षण का यह नतीजा खबर बन गया तो उसकी कुछ तो वजह होगी। चारों तरफ़ से रोज़ रोज़ जो खबर आती है, उससे मालूम होता है कि अलग-अलग विश्वासों के लोगों के साथ साथ रहने का विचार इस देश में कब का तर्क कर दिया गया है। लेकिन यह सर्वेक्षण तो कुछ और कहता ...