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Showing posts from August, 2023

बिहार: अध्यापकों का डांस करना अपराध है, राज्यपाल निलंबित कर देते हैं!

    वक़्त  बेवक़्त         08 Mar, 2021 राजभवन को क्यों एक विश्वविद्यालय के रोज़मर्रा के व्यापार में रुचि लेनी चाहिए? क्यों उसने विश्वविद्यालय की अपनी जाँच को नहीं माना? क्या राजभवन कुलपति को नज़रअंदाज़ करके निर्णय ले सकता है? ले सकता है, वह हमने देखा। सवाल है, क्या उसे ऐसा करना चाहिए? बिहार के छपरा स्थित जयप्रकाश नारायण विश्वविद्यालय के 16 अध्यापकों को विश्वविद्यालय के कुलाध्यक्ष ने नाचने के चलते निलंबित कर दिया है। राज्य के सारे विश्वविद्यालयों के कुलाध्यक्ष राज्यपाल हुआ करते हैं। राज भवन ने बतलाया कि शिक्षकों का आचरण उनके पद की मर्यादा के विरुद्ध था। इसलिए उन्हें दंडित किया गया है। जाँच समिति के सदस्य निलंबित पिछले साल बाबू राजेंद्र प्रसाद की जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम के समाप्त हो जाने के बाद बेतकल्लुफाना माहौल में इन अध्यापकों ने एक लोकप्रिय गीत पर नृत्य किया। यह कुलाध्यक्ष को नागवार गुजरा। एक जाँच समिति बिठाई गई। उसने जब इस आरोप को गंभीर नहीं पाया तो समिति के सदस्यों को भी निलंबित कर दिया गया। यानी राजभवन ने पहले ही तय कर लिया था कि आरो...

हिंदू होने के लिए क्या अब नफ़रत और हिंसा ज़रूरी हो गई?

   वक़्त  बेवक़्त         15 Mar, 2021 हिंदू धर्म का और भी सरलीकरण कर दिया गया है। उसके लिए मानसिक और आध्यात्मिक श्रम की आवश्यकता नहीं। मन में अन्य धर्मावलम्बियों के लिए द्वेष होना ही पर्याप्त है। विशेषकर मुसलमानों के लिए। फिर किसी मुसलमान को अकेले देखकर उसे पीट देना, उसकी फ़िल्म बनाना और उसे चारों ओर प्रसारित करना। जितने प्राणी उसे देखते हैं, उन्हें पुण्य की अनुभूति होती है, फिर उसे आगे प्रसारित करते हैं। यह हिंदू धर्म के बारे में नहीं है। न मंदिर के बारे में। यह उस नफ़रत और हिंसा के बारे में है जो हिन्दुओं के मन में घर करती जा रही है। जिसके चलते अब हिंदू होने का अर्थ गीता का मर्म समझना, शिव, राम या कृष्ण या शक्ति का उपासक होना नहीं है। बल्कि अब हिंदू की परिभाषा है एक ऐसा प्राणी जो मुसलमान, ईसाई और पाकिस्तान से घृणा करता है। उसे वेद नहीं चाहिए क्योंकि वैदिक संस्कृत को पढ़ने और समझने में दांतों पसीना आ जाएगा, उसे उपनिषद् नहीं चाहिए और न गीता क्योंकि गीता का अर्थ क्या है, यह समझने के लिए उसे तिलक, गाँधी और विनोबा से विचार विमर्श भी करना पड़ेगा। उसे अपन...

दिल्ली को लेकर केंद्र सरकार की साम्राज्यवादी लालसा

              वक़्त  बेवक़्त         22 Mar, 2021 सत्ता में आने के बाद संघीय सहकार जैसे चतुर शब्दों का जाप करने के बाद सरकार ने एक के बाद एक ऐसे कदम उठाए हैं जिनसे संघीय भावना धीरे-धीरे क्षरित होती गई है। बीजेपी की “साम्राज्यवादी” और “विस्तारवादी” विचारधारा हर प्रदेश को अपने उपनिवेश में बदल देना चाहती है।  दिल्ली को पूरी तरह अपने अँगूठे के नीचे लाने के लिए केंद्र सरकार ने जो  क़ानूनी संशोधन प्रस्तावित  किया है उसका सबसे पहला विरोध उमर अब्दुल्ला ने किया। उमर ने एक सिद्धांत के पक्ष में आवाज़ उठाई। उन्होंने कहा कि हालाँकि 2019 में ‘आप’ ने जम्मू-कश्मीर को टुकड़े-टुकड़े करने और उसका दर्जा घटा देने का समर्थन किया था लेकिन हम दिल्ली की चुनी हुई सरकार की शक्तियों पर इस हमले की भर्त्सना करते हैं। दिल्ली को इसका हक है कि वह एक  पूर्ण राज्य रहे  जिसमें जनता के द्वारा चुनी हुई सरकार के पास सारी ताकत हो न कि केंद्र द्वारा नामित एक लेफ्टिनेंट गवर्नर के पास।  याद रहे कि 2019 में जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को खत्...