12/06/2024 जनतंत्र तरलता और निरंतर गतिशीलता से परिभाषित होता है. न तो व्यक्ति कभी अंतिम रूप से पूर्ण होता है, न कोई समाज. लेकिन अपूर्णता का अर्थ यह नहीं कि आप अपने साथ कुछ करते ही नहीं, ख़ुद को पूर्णतर करने का प्रयास लगातार चलता है. कविता में जनतंत्र स्तंभ की 31वीं क़िस्त. …और, जब मेरा सिर दुखने लगता है, धुंधले-धुंधले अकेले में, आलोचनाशील अपने में से उठे धुएं की ही चक्करदार सीढ़ियों पर चढ़ने लगता हूं. और हर सीढ़ी पर लुढ़की पड़ी एक-एक देह, आलोचन हत मेरे पुराने व्यक्तित्व, भूतपूर्व, भुगते हुए, अनगिनत ‘मैं’. अनेक शवों, अर्ध-शवों पर ही रखकर निज सर्व-स्पृश पैर, मेरे साथ चलने लगता भावी-कर-बद्ध मेरा वर्तमान ! किंतु, पुनः-पुनः उन्हीं सीढ़ियों पर नए-नए आलोचक-नेत्र (तेज़ नाक वाले तमतमाए-से मित्र) खूब काट-छांट और गहरी छील-छाल, रंदों और बसूलों से मेरी देखभाल, मेरा अभिनव संशोधन अविरत क्रमागत. अभी तक सिर में जो तड़फड़ाता रहा ब्रह्मांड, लड़खड़ाती दुनिया का भूरा मानचित्र चमकता है दर्दभरे अंधरे में वह क्रमागत काण्ड. उसमें नए नए सवालों की झखमार ; थके हुए, गिरते-पड़ते, बढ़ने का दौर; मार-काट करती हुई...