साहस के बिना जनतंत्र का बने रहना असंभव है
29/05/2024 साधारण लोग सहज रूप से साहसी होते हैं. मज़दूर अपने हक़ के लिए उठ खड़े होते हैं, किसान मोर्चे निकालते हैं, आदिवासी निहत्थे हथियारबंद राज्य के सामने खड़े हो जाते हैं, लेकिन जो भाषा का सजग अभ्यास करने का दावा करते हैं, उनका गला रुंध जाता है. कविता में जनतंत्र स्तंभ की पच्चीसवीं क़िस्त. अब समय पास है जब हमें सिर झुकाना पड़ेगा, अभिवादन में नहीं, न प्रार्थना में— शर्म से : भले हमारे बोलने से शायद ही फ़र्क पड़ता, पर हम चुप रहे यह चतुराई है. हमें कोशिश तो करनी थी. कि हमारे शोर से चैन की नींद न सो सके आततायी और उसे गोलियां खानी पड़ें. हमारे पास जो अंतःकरण था उसे किसी लोककथा की घटना की तरह हम किसी पिछले मुक़ाम पर भूल आए हैं और हमें अब उसकी कोई ज़रूरत नहीं लगती. वह पास होता तो हम व्यर्थ ही असहज अनुभव करते. हम कह भले न रहे हों, मन ही मन मना रहे हैं कि वह आततायी बहुत क्रूर न हो, मन ही मन मना रहे हैं कि वह आततायी बहुत क्रूर न हो, हमारी उपेक्षा करे और हमसे बदला लेने की बात भूल जाए, हमारी उस तक पहुंच तो कभी नहीं हो पाएगी— पर दूर से हमारे अभिवादन को वह अनदेखा न करे अपने विरुद के लोकार्पण...