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Showing posts from May, 2024

साहस के बिना जनतंत्र का बने रहना असंभव है

29/05/2024   साधारण लोग सहज रूप से साहसी होते हैं. मज़दूर अपने हक़ के लिए उठ खड़े होते हैं, किसान मोर्चे निकालते हैं, आदिवासी निहत्थे हथियारबंद राज्य के सामने खड़े हो जाते हैं, लेकिन जो भाषा का सजग अभ्यास करने का दावा करते हैं, उनका गला रुंध जाता है. कविता में जनतंत्र स्तंभ की पच्चीसवीं क़िस्त. अब समय पास है जब हमें सिर झुकाना पड़ेगा, अभिवादन में नहीं, न प्रार्थना में— शर्म से : भले हमारे बोलने से शायद ही फ़र्क पड़ता, पर हम चुप रहे यह चतुराई है. हमें कोशिश तो करनी थी. कि हमारे शोर से चैन की नींद न सो सके आततायी और उसे गोलियां खानी पड़ें. हमारे पास जो अंतःकरण था उसे किसी लोककथा की घटना की तरह हम किसी पिछले मुक़ाम पर भूल आए हैं और हमें अब उसकी कोई ज़रूरत नहीं लगती. वह पास होता तो हम व्यर्थ ही असहज अनुभव करते. हम कह भले न रहे हों, मन ही मन मना रहे हैं कि वह आततायी बहुत क्रूर न हो, मन ही मन मना रहे हैं कि वह आततायी बहुत क्रूर न हो, हमारी उपेक्षा करे और हमसे बदला लेने की बात भूल जाए, हमारी उस तक पहुंच तो कभी नहीं हो पाएगी— पर दूर से हमारे अभिवादन को वह अनदेखा न करे अपने विरुद के लोकार्पण...

कार्यकर्ता जनतंत्र का पहला व्यक्ति है जो जन के लिए इस तंत्र को संभव बनाता है

  28/05/2024 वक्त-बेवक्त वह साइकिल दनदनाता हुआ चला आता है कई बार मैं झुंझला उठता हूं उसके इस तरह चले आने पर उसके सवालों और उसके तंबाकू पर तिलमिला उठता हूं मैं मैं बेहद परेशान हो जाता हूं उसकी ग़लत-सलत भाषा उसके शब्दों से गिरती धूल और उसके उन बालों पर जो उसके माथे से पूरी तरह उड़ गए हैं कई बार उसकी भूकंप-सी चुप्पी मुझे अस्तव्यस्त कर देती है उसकी साइकिल में हवा हमेशा कम होती है हमेशा उसकी बग़ल में होता है एक और कोई चेहरा थाने बुलाया गया है मुझे थाने से चिढ़ है मैं थाने की धज्जियां उड़ाता हूं मैं उस तरफ़ इशारा करता हूं जिधर थाना नहीं है जिधर पुलिस कभी नहीं जाती वह धीरे से हंसता है और मेरी मेज़ हिलने लगती है मेरी मेज़ पर रखी किताबें हिलने लगती हैं मेरे सारे शब्द और अक्षर हिलने लगते हैं मैं उसे रोकता नहीं न कहता हूं कल परसों दोपहर शाम वह उठता है और दरवाज़ों को ठेलकर चला जाता है बाहर मेरी उम्मीद उसका पीछा नहीं करती सिर्फ़ कुछ देर तक चील की तरह हवा में मंडराती है और झपट्टा मारकर ठीक उसी जगह बैठ जाती है जहां से वह चला गया था (‘एक ठेठ देहाती कार्यकर्ता के प्रति’) केदारनाथ सिंह की इस कविता म...

नेहरू के बाद भारत में जनतंत्र

27/05/2024   मकान अपनी पीठ गरमा रहे थे जब शहर ज़र्द हो उठा और फिर अंजीरी बैंजनी आख़िर में: अंधेरे ने निगल लिया माणिक . कारखानों ने पत्थरी लबादे पहन लिए उन्होंने बीड़ी जलाई, और फिर गीली क़मीज़ों को कंधों पर डाले, वे लौटे दड़बों की ओर. ‘क्या हुआ, रे सुंद्रे?, ‘आज अगरबत्ती न जलाना. तूने नहीं सुना? नेहरू चले गए.’ ‘अच्छा? फिर तो छुट्टी है आज.’ थकान से चूर, दुनिया ढेर हो गई बिस्तरे पर. अकेला, मैं चलता रहा. सड़कें डरावनी थीं. मैं मिला एक हथठेलेवाले से, जो कंदील लिए जा रहा था. ‘कहां ले जा रहे हो इस रोशनी को?’ ‘आप देख नहीं रहे जनाब! वहां ऊपर अंधेरा अपने दांत दिखा रहा है!’ यह सब जब नेहरू मरे. नारायण सुर्वे की कविता ‘जब नेहरू मरे’ को जेरी पिंटो की अंग्रेज़ी में पढ़ना और उससे हिंदी में उसका तर्जुमा करना ज़रा अटपटा है, लेकिन इस प्रक्रिया से हमारी अपनी आज की स्थिति पर रोशनी पड़ती है. हम ख़ुद अपने तक किसी और के रास्ते पहुंचते हैं. ख़ुद को किसी और की रोशनी में देखना और किसी और की ज़बान में समझना एक प्रकार की जनतांत्रिक प्रक्रिया है. इस कविता का आख़िरी हिस्सा मानीखेज है. नेहरू की मौत हुई है. एक हाथ...

रोहित वेमुला को दलित होने का अधिकार भी नहीं है?

  वक़्त  बेवक़्त,  27 May 2024 जिनकी याददाश्त ठीक है वे जानते हैं कि रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद भाजपा के नेताओं ने, जिनमें स्मृति ईरानी सबसे मुखर थीं, बार-बार रोहित पर इल्ज़ाम लगाया कि वह झूठ बोल रहा था कि वह दलित था। रोहित की माँ को भी झूठा साबित करने की कोशिश की गई थी। नई लोकसभा के लिए 2024 के चुनाव के दौरान बार-बार रोहित वेमुला की याद आती रही। इसकी बड़ी वजह यह है कि इस बार चुनाव-प्रचार में जो शब्द सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किए गए, उनमें अनुसूचित जाति, जनजाति, या दलित और आदिवासी जैसे शब्द सबसे अधिक सुनाई पड़े। भारतीय जनता पार्टी के मुख्य प्रचारक नरेंद्र मोदी ने, जो संयोग से भारत के प्रधानमंत्री भी हैं, सबसे पहले इन समुदायों के हितों के प्रति चिंता ज़ाहिर की। उनके इशारे को समझकर भाजपा के सारे नेताओं ने चिल्ला-चिल्लाकर कहा कि उन्हें डर है कि कांग्रेस पार्टीवाले इन दलित और आदिवासी समुदायों के हिस्से के संसाधनों का अपहरण कर लेंगे और उन्हें मुसलमानों को बाँट देंगे। यह हिस्सा मुख्य रूप से आरक्षण के रूप में इन्हें मिल रहा है। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस इनका आरक्षण लेकर मुसलम...

वर्चस्व के पुराने समीकरण का अस्वीकार विश्वविद्यालय जीवन की पहली सीख है

  25/05/2024 विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी शिक्षा अगर कोई है तो वह है दूसरों से हमदर्दी. दूसरे यानी वे जिनसे मनुष्यत्व के अलावा हमारा और कुछ नहीं मिलता: न जेंडर, न धर्म, न भाषा, न राष्ट्रीयता. कविता में जनतंत्र स्तंभ की बाइसवीं क़िस्त. वह समाज जहां पुरुष के भीतर के स्त्रीत्व की हत्या बचपन से धीरे-धीरे की जाती है उसके भीतर की स्त्री भी एक दिन भागकर किसी विश्वविद्यालय में ही बच पाती है विश्वविद्यालय में ही युवा इतिहास, भूगोल, गणित पढ़ते हुए सीखते हैं समाज बदलना और अपने लिए नहीं दूसरों के हक़ के लिए भी घर से निकलना वे धीरे-धीरे पुरुष से मनुष्य होना सीखते हैं और साथ संघर्ष करती स्त्रियों को भी देह से ज़्यादा जानने, समझने लगते हैं विश्वविद्यालय के युवा आदमी के हक़ की आवाज़ उठाते हैं व्यवस्था के लिए किसी आदमी को मशीन-भर हो जाने से बचाते हैं लाश भरकर घर से दफ़्तर और दफ़्तर से घर लौटते आदमी को ज़िंदा होने की वजह बताते हैं एक आत्मा-विहीन समाज जो पुरुषों को स्त्रियों से सामूहिक दुष्कर्म करना सिखाता है और उसकी हर हत्या पर चुप्पी साधे रहता है जहां सदियों से यही रीति चलती है उसी समाज के किसी विश्वव...

जाति पर किस तरह बात करना जातिवाद है?

  24/05/2024 ‘जातिविहीनता’ की सुविधा किसे है कि वह अपनी जाति की पहचान की मुखरता के बिना भी जीवन के हर मरहले पार करता जाए? किसे इसकी इजाज़त नहीं है? कविता में जनतंत्र स्तंभ की इक्कीसवीं क़िस्त. वे पसंद नहीं करते ‘जाति’ पर बात करना क्योंकि वे नहीं हैं पासी-चमार भंगी-महार जबकि वे हर रोज़ करते हैं इस्तेमाल इन जातियों को गाली की तरह कड़ी मशक़्क़त और तू-तू , मैं-मैं के बाद मैंने जुटाया है एक आईना जिसमें उभरता है बिंब जो उन्हें लगता है बीभत्स प्रतिशोध से भरा हुआ जितनी बार भी देखते हैं वे उतनी ही बार हो जाता है उनका चेहरा विद्रूप अमानुषिक दर्प से भरा हुआ वे फुसफुसाते हैं— दार्शनिक मुद्रा में क्रांति बोध और जनतंत्र बोध खो देते हैं अपना अर्थ लहूलुहान हैं स्मृतियां जंग लगी बाद की खरोंचों से आंबेडकर की आदमकद मूर्ति के पास बैठा मोची चीखता है ऊंची आवाज़ में ‘किस हरामज़ादे की देन है यह जाति’ आईना धुंधलाने लगा है जिसे क़मीज़ से पोंछकर खड़ा हूं चौराहे पर जहां से गुजरा है अभी-अभी एक जुलूस जिसमें शामिल थे बिन चेहरों के लोग जिनके हाथों में चमक रही थीं तलवारें, त्रिशूल और तमंचे उनके पीछे चल रहा था एक ट्...