हिन्दुओं के 'गुंडाकरण' के लिए कौन से तत्व/लोग जिम्मेदार?
वक़्त बेवक़्त, 29 Jul, 2024
उनकी चीख चिल्लाहट का मुक़ाबला करना कठिन है। लेकिन जब समाज उन्हें अपने नेता के तौर पर चुनने लगे तब मानना चाहिए कि हिंसा के आगे उसकी लाचारी वजह नहीं है कि वह चुप दीखता है।अगर उसका बड़ा हिस्सा इसमें ख़ुद भाग न भी लेता हो तो उसे इससे उज्र हो, इसका भी सबूत नहीं। बल्कि जब वह घृणा और हिंसा के प्रचारकों को अपना प्रतिनिधि बना लेता है तो वह इस गुंडा प्रवृत्ति पर अपनी मुहर लगता है और उसे बढ़ावा ही देता है। समाज को इसका ज़िम्मा लेना ही होगा।
भारतीय धर्मनिरपेक्षता पूर्ण नहीं थी, सर्वथा निर्दोष न थी लेकिन विविध प्रकार के आचार व्यवहार वाले समूहों के सह अस्तित्व के लिए, जिसमें आपस में कम से कम टकराव हो और कोई समूह ख़ुद को किसी से कमतर न समझे, यह सबसे अच्छी नीति थी।कोई ख़ुद को हीन न समझे, सबको राज्य में भागीदारी का अहसास हो, यह अच्छी राजकीय नीति का प्रमाण है।
धर्मनिरपेक्षता समाज में हिंसा को कम करने का भी तरीक़ा है।वह मानवीय जीवन पद्धति है। वह महत्तम स्तर पर दूसरे या अजनबी के प्रति उत्सुकता या सम्मान है और न्यूनतम रूप में अनजान या अन्य के प्रति सहनशीलता है। अंग्रेज़ी उपनिवेशवाद से मुक्त होने के बाद से हिंदू समाज इस न्यूनतम और अधिकतम के बीच रहा है। उसने अगर दूसरे को अपना नहीं बनाया, पूर्णतः स्वीकार नहीं किया तो उसे धकिया कर ख़ुद से अलग भी नहीं किया। हम सबकी ज़िंदगी की कहानियाँ इसका सबूत हैं। दुनिया भर में इसलिए माना गया कि हिंदू सहिष्णु होते हैं, वे स्वभावतः विविधता को स्वीकार करनेवाले हैं।हिंदुओं ने भी गर्व से कहा, और वे बहुत ग़लत न थे कि हमने भारत में धर्मनिरपेक्षता को सुरक्षित रखा है।
अगर आज़ादी 60 साल तक भारत में धर्मनिरपेक्षता के लिए हिंदुओं को श्रेय मिला तो इधर के 10 सालों में सांप्रदायिकता या बहुसंख्यकवाद के उभार और उसके प्रभुत्व के लिए भी उन्हें दोष लेना चाहिए। पहली बार भारत के किसी प्रधानमंत्री ने गर्व से कहा कि उसने धर्मनिरपेक्षता को भारतीय राजनीति के शब्दकोश से बाहर कर दिया है।उसने कहा कि हमने ऐसा माहौल बना दिया है कि कोई नेता, कोई राजनीतिक दल अब इस लफ़्ज़ को ज़ुबान लाने की हिम्मत नहीं करता।और हिंदू समाज ने प्रधान मंत्री की इस दंभोक्ति को चुपचाप सुना।
2002 में गुजरात के जनसंहार के बाद भी पूरे देश में अफ़सोस और ग़ुस्से से भरी प्रतिक्रिया हुई। सरकार भाजपा नीत ही थी फिर भी वाजपेयी को दुख व्यक्त करना पड़ा,अपने मुख्यमंत्री को ताड़ित करना पड़ा।मानवाधिकार आयोग सक्रिय हुआ, अदालतों ने भी इंसाफ़ की कोशिश की। भारत भर के मीडिया ने इस हिंसा की निंदा की।
धीरे धीरे वह आदमी भाजपा का सबसे बड़ा नेता हो गया। भारत के पूँजीपतियों ने उसे सिरमौर बनाया और मीडिया ने उसका गुणगान शुरू किया। फिर वह भारत का प्रधानमंत्री बना। यह वही व्यक्ति है जिसने 2019 में चुनाव जीतने के बाद गर्वपूर्वक कहा कि उसने धर्मनिरपेक्षता को भारतीय राजनीति से बहिष्कृत कर दिया है।
हिंदू श्रेष्ठता का तर्क वास्तव में संख्या बल का तर्क है। जो तथाकथित हिंदू जीवन पद्धति को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं और इसलिए दूसरों के साथ उसे मानने को ज़ोर ज़बरदस्ती करते हैं वे ही ईसाई बहुल देशों या इलाक़ों में खामोश हो जाते हैं। जो भाजपा बिहार, उत्तर प्रदेश में गाय को पवित्र, अवध्य मानती है वह उसे गोवा और नागालैंड या मिज़ोरम या केरल में भोज्य मानती है। इसका मतलब है कि ताक़त सिर्फ़ संख्या में है, संख्या बल ही वास्तविक बल है। जहाँ हिंदू बहुसंख्या में है वह दूसरों पर हिंसा करेगा कि वे उसके अनुसार चलें लेकिन जहाँ वह अल्पसंख्या में होगा, वहाँ होंठ सिल लेगा।

हिन्दुओं के 'गुंडाकरण' के लिए कौन से तत्व/लोग जिम्मेदार?
उनकी चीख चिल्लाहट का मुक़ाबला करना कठिन है। लेकिन जब समाज उन्हें अपने नेता के तौर पर चुनने लगे तब मानना चाहिए कि हिंसा के आगे उसकी लाचारी वजह नहीं है कि वह चुप दीखता है।अगर उसका बड़ा हिस्सा इसमें ख़ुद भाग न भी लेता हो तो उसे इससे उज्र हो, इसका भी सबूत नहीं। बल्कि जब वह घृणा और हिंसा के प्रचारकों को अपना प्रतिनिधि बना लेता है तो वह इस गुंडा प्रवृत्ति पर अपनी मुहर लगता है और उसे बढ़ावा ही देता है। समाज को इसका ज़िम्मा लेना ही होगा।
भारतीय धर्मनिरपेक्षता पूर्ण नहीं थी, सर्वथा निर्दोष न थी लेकिन विविध प्रकार के आचार व्यवहार वाले समूहों के सह अस्तित्व के लिए, जिसमें आपस में कम से कम टकराव हो और कोई समूह ख़ुद को किसी से कमतर न समझे, यह सबसे अच्छी नीति थी।कोई ख़ुद को हीन न समझे, सबको राज्य में भागीदारी का अहसास हो, यह अच्छी राजकीय नीति का प्रमाण है।
धर्मनिरपेक्षता समाज में हिंसा को कम करने का भी तरीक़ा है।वह मानवीय जीवन पद्धति है। वह महत्तम स्तर पर दूसरे या अजनबी के प्रति उत्सुकता या सम्मान है और न्यूनतम रूप में अनजान या अन्य के प्रति सहनशीलता है। अंग्रेज़ी उपनिवेशवाद से मुक्त होने के बाद से हिंदू समाज इस न्यूनतम और अधिकतम के बीच रहा है। उसने अगर दूसरे को अपना नहीं बनाया, पूर्णतः स्वीकार नहीं किया तो उसे धकिया कर ख़ुद से अलग भी नहीं किया। हम सबकी ज़िंदगी की कहानियाँ इसका सबूत हैं। दुनिया भर में इसलिए माना गया कि हिंदू सहिष्णु होते हैं, वे स्वभावतः विविधता को स्वीकार करनेवाले हैं।हिंदुओं ने भी गर्व से कहा, और वे बहुत ग़लत न थे कि हमने भारत में धर्मनिरपेक्षता को सुरक्षित रखा है।
अगर आज़ादी 60 साल तक भारत में धर्मनिरपेक्षता के लिए हिंदुओं को श्रेय मिला तो इधर के 10 सालों में सांप्रदायिकता या बहुसंख्यकवाद के उभार और उसके प्रभुत्व के लिए भी उन्हें दोष लेना चाहिए। पहली बार भारत के किसी प्रधानमंत्री ने गर्व से कहा कि उसने धर्मनिरपेक्षता को भारतीय राजनीति के शब्दकोश से बाहर कर दिया है।उसने कहा कि हमने ऐसा माहौल बना दिया है कि कोई नेता, कोई राजनीतिक दल अब इस लफ़्ज़ को ज़ुबान लाने की हिम्मत नहीं करता।और हिंदू समाज ने प्रधान मंत्री की इस दंभोक्ति को चुपचाप सुना।
2002 में गुजरात के जनसंहार के बाद भी पूरे देश में अफ़सोस और ग़ुस्से से भरी प्रतिक्रिया हुई। सरकार भाजपा नीत ही थी फिर भी वाजपेयी को दुख व्यक्त करना पड़ा,अपने मुख्यमंत्री को ताड़ित करना पड़ा।मानवाधिकार आयोग सक्रिय हुआ, अदालतों ने भी इंसाफ़ की कोशिश की। भारत भर के मीडिया ने इस हिंसा की निंदा की।
धीरे धीरे वह आदमी भाजपा का सबसे बड़ा नेता हो गया। भारत के पूँजीपतियों ने उसे सिरमौर बनाया और मीडिया ने उसका गुणगान शुरू किया। फिर वह भारत का प्रधानमंत्री बना। यह वही व्यक्ति है जिसने 2019 में चुनाव जीतने के बाद गर्वपूर्वक कहा कि उसने धर्मनिरपेक्षता को भारतीय राजनीति से बहिष्कृत कर दिया है।
हिंदू श्रेष्ठता का तर्क वास्तव में संख्या बल का तर्क है। जो तथाकथित हिंदू जीवन पद्धति को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं और इसलिए दूसरों के साथ उसे मानने को ज़ोर ज़बरदस्ती करते हैं वे ही ईसाई बहुल देशों या इलाक़ों में खामोश हो जाते हैं। जो भाजपा बिहार, उत्तर प्रदेश में गाय को पवित्र, अवध्य मानती है वह उसे गोवा और नागालैंड या मिज़ोरम या केरल में भोज्य मानती है। इसका मतलब है कि ताक़त सिर्फ़ संख्या में है, संख्या बल ही वास्तविक बल है। जहाँ हिंदू बहुसंख्या में है वह दूसरों पर हिंसा करेगा कि वे उसके अनुसार चलें लेकिन जहाँ वह अल्पसंख्या में होगा, वहाँ होंठ सिल लेगा।









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