दलितों का वोट है लेकिन राज उनका नहीं है
22/05/2024
पसीना मिश्रित जल से
उगाईं फसलें
लगाए पेड़
पल भर ठिठककर
जानना चाहा धूप का रंग
न फसल अपनी हो सकी
न पेड़ ही
तपती दुपहर में
रजबाहे की गलियों में
बहते गंगाजल से
बुझाई प्यास अनेक बार
बिना हिसाब किए –
कितनी रेत समाई पेट में
कितना पानी बदला लहू में
फिर भी
न गंगा ही अपनी हो सकी
न रजबाहे की रेत ही
शिवालय के दरवाज़े से दूर
खड़े होकर मांगी मन्नतें
सही दुत्कार बामन की
यह सोचकर-
कभी तो खुलेगा दरवाज़ा
अपने लिए भी
भीतर सोया देवता
जागेगा किसी रोज़
पी जाएगा समूचा विष
बाहर आकर
न दरवाज़ा ही खुला कभी
न देवता ही अपना हो सका
बालिग़ होते ही
नाम लिखाया मत-सूची में
काग़ज़ का मोहर लगा टुकड़ा
हर बार डाला मत पेटी में
इस उम्मीद में-
कोई और नहीं
लोकतंत्र तो अपना होगा
गोपनीयता की शपथ में
रची गईं साज़िशें
ख़ाकी वर्दी की मंत्रणा में
मरी-दबी इच्छाओं के सायरन-सी
गूंजती आवाज़ें
लूट-खसोट
मारा-मारी
पालों की अदला-बदली
संसद के गलियारों का
अधमरा लोकतंत्र भी
न अपना हो सका
न जगा सका
विश्वास ही!
ओम प्रकाश वाल्मीकि की कविता का शीर्षक है ‘लेखा-जोखा’. यह भारतीय जनतंत्र का लेखा जोखा तो है ही, भारतीय सामाजिक जीवन का भी है. आख़िरकार दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. जनतंत्र का संचालन संविधान करता है. लेकिन संविधान की शपथ उस सामाजिक अभ्यास से मुक्ति नहीं दिलाती जो पारंपरिक रूप से श्रेष्ठता, ऊंच नीच, अलगाव, पवित्रता और प्रदूषण पर टिका हुआ है. इन सारी चीज़ों को संस्कृति मानकर छुआ नहीं जाता.
डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने संविधान स्वीकार करने के क्षण में ही चेतावनी दे थी जब उन्होंने कहा था जनतंत्र का बिरवा ऐसी भारतीय ज़मीन में लगाया जा रहा था जो स्वभावतः ग़ैर जनतांत्रिक है.
जनतंत्र का सबसे पहला मूल्य है बराबरी. जाति विभाजित समाज का बुनियादी मूल्य है: ग़ैर बराबरी. बराबरी औपचारिक नहीं, मात्र रूपगत नहीं, बल्कि वास्तविक. इसका मतलब है प्राकृतिक और सार्वजनिक संसाधनों के स्वामित्व और उनके उपयोग में समानता. उन तक सबकी समान पहुंच हो सके, संविधान यह लक्ष्य निर्धारित करता है और उम्मीद की जाती है कि जनतांत्रिक प्रक्रियाएं इस लक्ष्य की यात्रा को सुगम बनाएंगी. लेकिन यह हुआ नहीं या होने नहीं दिया गया.
मैं हर कक्षा से यह प्रश्न ज़रूर पूछता हूं, जो पी. साईनाथ से प्रेरित है. ज़्यादातर विद्यार्थियों का अभी भी गांव से नाता है. और गांव टोलों में बंटे हुए हैं. उनके बीच रिश्ता है. वह उपयोगिता पर आधारित लेन-देन का है. प्रश्न यह है कि गांव में पेयजल का स्रोत किस जगह है. स्कूल और पंचायत घर भी किन टोलों के बीच है. और उपजाऊ ज़मीन.
जब विद्यार्थी अपने गांव के नक़्शों को दिमाग़ में खींचते हैं तो वे एक तथ्य समान पाते हैं: यह सब कुछ दलितों के टोलों से दूर है. दलित गांव के सीमांत पर रहते हैं. दलितों को इन सारे संसाधनों के इस्तेमाल के लिए ख़ासी मशक़्क़त करनी होती है. और ग़ैर दलित या ‘उच्च जातियों’ के इलाक़े में, वह भौगोलिक, राजनीतिक और भावनात्मक इलाक़े हैं, प्रवेश की क़ीमत बहुत महंगी है. वह जान से चुकानी होती है.
दलित ख़ुद संसाधन मात्र रहे हैं. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता ‘तुलसीदास’ के इस अंश को देखिए:
वे शेष-श्वास, पशु, मूक-भाष,
पाते प्रहार अब हताश्वास;
सोचते कभी, आजन्म ग्रास द्विजगण के
होना ही उनका धर्म परम,
वे वर्णाधम, रे द्विज उत्तम,
वे चरण-चरण बस, वर्णाश्रम-रक्षण के!
गांव के नक़्शे का भारतीय जनतंत्र के नक़्शे से गहरा रिश्ता है. आंबेडकर ने गांवों को हिंदू सामाजिक क्रम का कारख़ाना बतलाया था जहां वह रोज़ाना पैदा किया जाता है. निराला ने लिखा था कि उनका उपयोग मात्र वर्णाश्रम रक्षण के लिए है. उनका परम धर्म ब्राह्मणों का आजन्म ग्रास बने रहने में ही है. इसीलिए आंबेडकर गांधी द्वारा गांवों को गौरवान्वित करने और उन्हें आत्मशासी इकाई के बनाए जाने के सख़्त ख़िलाफ़ थे. संविधान सभा ने इस विचार को अस्वीकार कर दिया. आंबेडकर ने कहा कि गांवों को आत्मशासी बनाने से ज़्यादा बड़ी विपदा अस्पृश्यों के लिए कुछ और हो नहीं सकती.
दलित संसाधन हैं हिंदू सामाजिक क्रम को चलाए रखने के लिए और सारे आर्थिक व्यापार के लिए भी. दलितों के श्रम का उनकी स्वीकृति से शोषण करते हुए उसे ही स्वाभाविक बतलाना और कभी भी सांस्कृतिक, प्राकृतिक और राजनीतिक संसाधनों पर उनके प्रभुत्व या स्वामित्व के प्रश्न पर विचार न करना.
लेकिन यह कविता वह सवाल करती है कि अपने श्रम से दलित जो पैदा करते हैं, उस पर उनका हक़ कितना है:
पसीना मिश्रित जल से
उगाईं फसलें
लगाए पेड़
पल भर ठिठककर
जानना चाहा धूप का रंग
न फसल अपनी हो सकी
न पेड़ ही
प्यास?
तपती दुपहर में
रजबाहे की गलियों में
बहते गंगाजल से
बुझाई प्यास अनेक बार
बिना हिसाब किए –
कितनी रेत समाई पेट में
कितना पानी बदला लहू में
फिर भी
न गंगा ही अपनी हो सकी
न रजबाहे की रेत ही
और संस्कृति?
शिवालय के दरवाज़े से दूर
खड़े होकर मांगी मन्नतें
सही दुत्कार बामन की
यह सोचकर-
कभी तो खुलेगा दरवाज़ा
अपने लिए भी
भीतर सोया देवता
जागेगा किसी रोज़
पी जाएगा समूचा विष
बाहर आकर
न दरवाज़ा ही खुला कभी
न देवता ही अपना हो सका
जनतंत्र से उम्मीद थी. मतदान का जो समान अधिकार दलितों को मिला या उन्होंने लिया, वह भी ऐसे जनतंत्र का संसाधन बन गया जो पारंपरिक वर्चस्व को और मज़बूत करे. दलितों का वोट है लेकिन राज उनका नहीं है:
लूट-खसोट
मारा-मारी
पालों की अदला-बदली
संसद के गलियारों का
अधमरा लोकतंत्र भी
न अपना हो सका
न जगा सका
विश्वास ही!
जनतंत्र में दलितों की भागीदारी क्या मात्र संख्या के तौर पर है? या वे इस जनतंत्र की शक्ल भी तय कर सकते हैं? क्या वे भी राज चला सकते हैं?
जनतंत्र का अर्थ है जन की सुरक्षा, उसकी प्रतिष्ठा, उसका प्रभुत्व. सुरक्षा न्यूनतम आकांक्षा है. जनतंत्र में किसी समुदाय की स्थिति का पता इस बात से चलता है कि इस प्रश्न की उसकी प्राथमिकताओं की सूची में कहां जगह है? क्या वह सबसे ऊपर है या उसे लेकर आश्वस्ति है?
भारत में ब्राह्मण या क्षत्रिय या भूमिहार या आम तौर पर हिंदुओं के लिए यह प्रश्न प्रमुख नहीं है. हालांकि उन्हें समझाने की कोशिश ज़रूर हो रही है और वे इसे मानना भी चाहते हैं कि उन्हें चारों तरफ़ से ख़तरा है. मुसलमानों के अलावा दलित उनके लिए ख़तरा हैं क्योंकि वे उनकी आजीविका आरक्षण से छीन लेना चाहते हैं. लेकिन सुरक्षा का जो न्यूनतम स्तर है जिसमें एक व्यक्ति या समुदाय शारीरिक तौर पर सुरक्षित रह सके, वह भी दलितों को मयस्सर नहीं.
हिंदुओं के प्रभुत्ववाले राज्य उत्तर प्रदेश में दलित उत्पीड़न के रोज़ाना औसतन 40 मामले दर्ज किए गए हैं. यह राज्य जो ख़ुद को राम राज्य कहलाना चाहता है, दलितों के उत्पीड़न में देश में सबसे आगे है. लेकिन बाक़ी मामलों में ख़ुद को प्रगतिशील मानने वाले दक्षिण भारत के राज्यों में हालात दलितों के लिए सुखदायी नहीं हैं. सिर्फ़ तमिलनाडु में 2022 के आंकड़ों के मुताबिक़ 2000 दलित उत्पीड़न के मामले दर्ज किए गए. दलितों को हर क़िस्म की हिंसा का सामना करना पड़ता है. हत्या, बलात्कार, जो भी संपत्ति है, उसकी या तो तबाही या उसे छीन लिया जाना, दलितों के आम अनुभव हैं.
अगर जनतंत्र सुरक्षा की यह न्यूनतम मांग पूरी नहीं कर सकता तो वह अपना कैसे हो?
आरक्षण के कारण संसद और विधानसभाओं में दलित प्रतिनिधियों की संख्या अच्छी ख़ासी है. इतनी कि वे दलित प्रश्न को जनतंत्र का सबसे बड़ा सवाल मानने को अपने दलों और विधायिकाओं को बाध्य कर सकें. लेकिन साल 2018 में जब पूरे देश में दलितों ने दलित उत्पीड़न के ख़िलाफ़ क़ानून को शिथिल किए जाने के विरोध में आंदोलन किया और 2 अप्रैल को भारत बंद का आह्वान किया, उस बंद में उन पर भयंकर हिंसा की गई, कई जगह पुलिस और सवर्णों द्वारा मिलकर. पर आपराधिक मामला दलितों के ख़िलाफ़ ही दर्ज हुआ.
दलित जन प्रतिनिधियों ने न इस आंदोलन में भाग लिया, न ही उन्होंने आंदोलन के दमन पर भी मुंह खोला. फिर ये दलित प्रतिनिधि कौन-सा जनतंत्र बना रहे हैं?
ज़मीन तोड़ी, कोड़ी, फसल उगाई, वह अपनी नहीं, पानी के लिए रास्ता बनाया, लेकिन पानी अपना नहीं, मंदिर खड़े किए, लेकिन भगवान अपना नहीं, वोट देकर जनतंत्र बनाया, वह भी अपना नहीं! फिर?
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