डॉ. महावीर नरवाल स्मृति व्याख्यान, आईएमए हॉल में चर्चा:किताब एक रंगमंच की तरह है, साहित्य हमें ठहर कर सोचने की फुर्सत देता है आईएमए हाल में डॉ. महावीर नरवाल स्मृति व्याख्यान का आयोजन रविवार को किया गया। साहित्यकार एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानन्द ने जिस घर में पुस्तक नहीं, वह घर कैसा और समाज कैसा विषय पर विचार व्यक्त किए। कहा कि किताब एक रंगमंच की तरह है और साहित्य हमें फुर्सत देता है ठहर का सोचने की। एक समाज तब तक ही जिन्दा रहता है, जब तक वह किताबें पढ़ता रहता है। किताब की बुनियादी शर्त है कि वह हमें दूसरी जिन्दगी में ले जाती है। किताब हमारी सोच का दायरा विस्तृत करती है। किताब और विचार से बड़े-बड़े तानाशाह भी डरते हैं। जो जिंदगीभर किताबी रहता है, वह किताब नहीं लिख सकता। असल में हम जब मुखर होते हैं, तभी किताब बनती है। किताब का मुख्य काम जनतांत्रिक मूल्यों को आगे लाना है। जनतंत्र में भाषा शिक्षण बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि डॉ. महावीर नरवाल ने जनतांत्रिक मूल्यों के काम किया। उन्हें हमेशा याद रखा जाएगा।
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