अपूर्वानंद
नमस्कार, मैं अपूर्वानंद. कड़वी कॉफी की इस कड़ी में आपके सामने हाजिर हूँ. जैसा आप जानते हैं कि कड़वी कॉफी बातचीत का एक लंबा सिलसिला है, बल्कि हम कहते हैं लंबे सिलसिले हैं क्योंकि कड़वी कॉफी में हम अलग-अलग विषयों पर बात करते हैं और वैसे लोगों से बात करते हैं, जिन्होंने उन विषयों पर अपनी जिंदगी का अच्छा खासा वक्त लगाया है, उन पर काम किया है, अध्ययन किया है, जिंदगी का निवेश किया है और उन विषयों को गहराई में देखने की कोशिश की है. तो हम ऐसे मित्रों, ऐसे विद्वानों, ऐसे कार्यकर्ताओं से बात करने का प्रयास करते हैं. यह इसलिए कि हम किसी नतीजे पर पहुँचने की हड़बड़ी में न रहें. हम ऐसी भाषा से भी मुक्त हो सकें, जो नारेबाजी की भाषा है, फतवे देने की भाषा है. हम संवाद की प्रक्रिया भी शुरू कर सकें. इसलिए इसमें दोनों तरह के विषय होते हैं. एक जिन्हें आप कहते हैं कि आज की सुबह जिस पर कुछ पढ़ना चाहते हैं, देखना चाहते हैं, सुनना चाहते हैं और दूसरा वह जो हमारी जिंदगी को व्यापक तौर पर समझने के लिए आवश्यक है.
पूरा प्रदेश मणिपुर को लेकर उद्वेलित है, बेचैन है. देश के सारे लोग मणिपुर को समझना-जानना चाहते हैं. वो हिंदी बोलने वाले लोग हैं. हम कहते हैं कि भारत हमारा है. हमें यह मालूम पड़ता है कि भारत के बहुत सारे हिस्सों के और हिंदी बोलने वाले इलाकों के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं नॉर्थ ईस्ट में रहते हैं. हम यह नहीं जानते कि नॉर्थ ईस्ट कितना विविध है, कितना विस्तृत है, उसमें कितनी भाषाएं हैं, कितने प्रकार के लोग हैं, कितने प्रकार की जीवन शैलियां हैं और संस्कृतियां हैं. सिर्फ नॉर्थ ईस्ट कहने से उसका पता हमें नहीं चलता. मणिपुर इन आठ राज्यों में से एक राज्य है, जिसे आप उत्तर पूर्व कहते हैं. आज मणिपुर जल रहा है. आप कह सकते हैं कि मणिपुर की देह से खून बह रहा है. ऐसा क्यों हो रहा है? इसको हम सारे लोग समझना चाहते हैं. हम उन लोगों के जरिए इसको समझने की कोशिश कर रहे हैं मणिपुर जिनकी चिंता के केंद्र में है.
अभी हमारे साथ दो मित्र हैं, जॉन दयाल और हर्ष मंदर. जॉन दयाल वरिष्ठ पत्रकार हैं, लेखक हैं, नागरिक अधिकारों के प्रश्न पर लगातार मुखर रहे हैं और काम करते रहे हैं. यह उनके लिए सिर्फ बोलने तक सीमित नहीं है बल्कि उन जगहों तक जाना जहाँ हिंसा होती है, उसको समझने की कोशिश करना. जॉन दयाल लंबे समय से यह करते आए हैं. शांति के प्रयास करना और साथ-साथ इंसाफ के सवाल को न भूलना. उसी तरह हमारे मित्र हर्ष मंदर हैं, जिनसे आप लोग परिचित हैं. हर्ष लंबे समय तक भारतीय प्रशासनिक सेवा में रहे हैं. इसके साथ-साथ उन्होंने अनेक प्रकार के सामाजिक कार्य किए हैं. जैसे सड़क पर रहने वाले लोगों के आश्रय का इंतजाम करना और सिर्फ आश्रय नहीं, बल्कि इज्जत के साथ उनके जीने के तरीकों की तलाश करना. हर्ष की चिंता का एक केंद्रीय विषय रहा है इस देश में होने वाली सांप्रदायिक हिंसा, जिसको बाद में हम लोगों ने समझा कि वह दरअसल बहुसंख्यकवादी हिंसा है जिसका शिकार अल्पसंख्यक होते हैं. 2002 में गुजरात में मुसलमानों के खिलाफ जो हिंसा हुई उसको लेकर हर्ष तब से अनेक मोर्चों पर काम करते रहे हैं. वह अदालत का मोर्चा है, वह पुनर्वास का मोर्चा है. जो हिंसा के शिकार हुए, उनका हाथ थामने का उनके साथ खड़े रहने का मोर्चा है. उसके साथ ही देश के दूसरे हिस्सों में जो हिंसा होती रही है.
हिंसा से दो-चार होना बहुत आसान नहीं है. उसका असर आप पर भी पड़ता है. यह हम सारे लोग जानते हैं और खासकर वे जो इस तरह की हिंसाओं पर काम करते रहे हैं. तो यह स्वाभाविक ही था कि जब मणिपुर में हिंसा भड़के उठे तो हर्ष मंदर और जॉन दयाल सीधे वहाँ जाने की सोचें. जहाँ तक मुझे पता है, उन्होंने अपनी यात्रा तय की थी, फिर उसकी तारीखें बदलीं और 25 से 28 जुलाई तक आप दोनों और दूसरे मित्रों के साथ मणिपुर गए और वहाँ के इलाकों दौरा किया और लोगों से मिले. मैं यह जानना चाहता हूँ कि आप दोनों ने मणिपुर जाना क्यों तय किया? उसके पहले मैं अपने दर्शकों-श्रोताओं को यह बताना चाहता हूँ कि यह यात्रा बहुत पहले से चले आ रहे अभियान का हिस्सा है, जिसको कारवान-ए-मोहब्बत कहते हैं. कारवान-ए-मोहब्बत का एक उद्देश्य है जो हिंसा के निशाने पर रहे हैं, उनसे मिलना, उनकी तकलीफ साझा करना, उनके इंसाफ के संघर्ष में योगदान करने के तरीके खोजना और उस बात को देश और पूरी दुनिया में और लोगों तक ले जाना.
हर्ष मंदर
शुक्रिया. जैसे आपने कहा, कारवान-ए-मोहब्बत की शुरुआत हमने 2017 में की. जब हमें लगा कि नफरत की राजनीति की एक किस्म की आंधी देश में चल पड़ी है. उसका बड़ा स्वरूप लिंचिंग के तौर पर सामने आया. जब भीड़ इकट्ठा होकर किसी एक आदमी को पीट-पीटकर मार देती है. जो देश के कई हिस्सों में शुरू हुआ. हमें लगा कि बाकी देश के लोगों का फर्ज बनता है कि वो वहाँ पहुँचें और जो उससे गुजरा है, उसके दर्द को साझा करने की कोशिश करें. उन्हें विश्वास दिलाएं कि वो अकेले नहीं हैं, देश में बहुत सारे लोग हैं जो उनके दर्द में शामिल हैं, माफी भी माँगना कि हम लोग किस हालत में पहुँच गए हैं, यह वादा करना कि जब आप अपनी जिंदगी के टुकड़ों को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, इंसाफ के लिए लड़ रहे हैं तो हम आपके साथ रहेंगे और आपकी कहानी दुनिया को देश को बताएंगे. ये यात्राएं शुरू हुईं. बहुत असर हुआ. हम लोगों ने लगभग अब तक 35 ऐसी यात्राएं की हैं. मणिपुर के हालात जब हमने सुने, तो हम जानते थे कि यह बिल्कुल असाधारण किस्म की चुनौती देश के सामने है. नफरत जब अपने इंतेहा तक पहुँचती है तो हम वहाँ पहुँचते हैं. मुझको लगा कि हमारा फर्ज बनता है कि कारवान का एक दल बने और वहाँ राहत शिविरों में जाकर उनकी बात सुनने-समझने की हम पहल करें. इसलिए हम लोगों ने फैसला किया कि हम वहाँ जाएंगे. तारीख आगे बढ़ाने की जरूरत पड़ी क्योंकि ग्रुप बनाना जरूरी था. जो सभी यात्राओं में शामिल रहे हैं उनके अलावा हम लोगों ने इस बार कुछ पब्लिक हेल्थ के लोग रखे, कुछ और नौजवान रखे और हम निकल पड़े. वहाँ चार दिन हमने गुजारे.
अपूर्वानंद
मैं जॉन से यह जानना चाहूँगा कि वह क्यों शामिल हुए. आप कहाँ-कहाँ गए? उसके बाद आप जो कह रहे थे हर्ष कि आपने क्या तय किया? किन लोगों से मिलेंगे? किन लोगों से आप मिले.
जॉन दयाल
इसका एक वाक्य में भी जवाब हो सकता है, जो हमारा एक तरीके से ब्रह्मवाक्य है कि जो इससे प्रभावित हुआ, जिसको घटना ने छुआ, घायल किया है, उनसे मिले. तो यहाँ पर समाज का जो घायल था, उनसे मिले. मैतेई से मिले क्योंकि इंफाल अगर जाएंगे तो मैतेई से मिले बिना बात नहीं बनेगी. कैपिटल सिटी में हवाई अड्डा भी है, वहीं पर उतरते हैं. मगर यह शायद हमारी खुशकिस्मती थी कि इंफाल से एक किलोमीटर दूर पहाड़ियां शुरू हो जाती हैं और उन पहाड़ियों पर इंफाल के आसपास नागा भी रहते हैं. उनसे भी हम जाकर मिले. एक तरीके से आप कह सकते हैं कि हम मैतेई से मिले, नागा से मिले और कुकी से मिले. उनके घर तक जाना बड़ा मुश्किल है. अगर हम किसी से नहीं मिले तो वह है सरकार. न गवर्नर से मिल पाए, न चीफ मिनिस्टर से, जो एमपी के अलावा किसी से मिलते ही नहीं है. न पुलिस अधिकारियों से. हालाँकि उनके दफ्तर के सामने से हम कई बार गुजरे. मगर हम मिले सिर्फ उनसे जो घटना से प्रभावित हुए. सिर्फ डॉक्टर से, केयरगिवर से, पादरियों से, सोशल वर्कर से. उन लोगों से, जो उनके साथ काम कर रहे हैं. जो उनके पीछे की घटना भी जानते हैं. यह जो आजकल कैंप में रह रहे हैं उनकी मानसिक अवस्था भी जान सकते हैं. यह हमारी खुशकिस्मती थी कि हमारे साथ 3-4 डॉक्टर्स थे जो मनोविज्ञान में, पब्लिक हेल्थ में बहुत एक्स्पर्ट हैं. उनके अलावा हमारे साथ फोटोग्राफर्स थे, लेखक और वकील थे
अपूर्वानंद
तो इसका मतलब आप आप सबसे ही मिले. आप मैतेई समूह के लोगों से भी मिले. आप कुकी लोगों से मिले. नागा लोगों से भी आपकी मुलाकात हुई और आप शायद चर्च के लोगों से भी मिले होंगे. अलावा इसके कि सरकार, सरकार के अधिकारी, नेता इनसे आपकी मुलाकात नहीं हुई. वो शायद उपलब्ध नहीं थे. तो हर्ष मैं यह समझने का प्रयास कर रहा हूँ, जैसा अब तक इन तीन महीनों में कहा जाता रहा है कि यह दरअसल मैतेई-कुकी के बीच का संघर्ष नहीं है और यह दोतरफा है. तो क्या आप भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि यह दोतरफा है? अगर इस हिंसा का आप वर्णन करना चाहें तो आप कैसे करेंगे?
हर्ष मंदर
वास्तव में बहुत मुश्किल है. जब हम लोग उस चश्मे को लेकर जाते हैं, जिससे हम मेनलैंड इंडिया की सांप्रदायिक घटनाओं को समझते हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि दो समुदायों के बीच यह हिंसा हुई है, दोनों तरफ लगभग एक ही किस्म की कहानियां हैं. हम रिलीफ कैंपों में गए. मैतेई रिलीफ कैंपों में भी गए और कुकी रिलीफ कैंपों में भी गए. कभी-कभी हमें लग रहा था कि अगर हम यह भूल जाएं कि हम किस समुदाय के लोगों से बात कर रहे हैं तो कहानियाँ एक जैसी ही थीं. जहाँ एक मायनॉरिटी समुदाय के लोगों के पड़ोसी अचानक उनके पास पहुँचे और गांव के घरों को पूरी तरह से जलाकर राख कर दिया. लोगों ने बहुत मुश्किल से डरते हुए उसमें से निकलने की कोशिश की. कुछ लोग निकल पाए, कुछ लोग नहीं निकल पाए. रात के अंधेरे में एक-दो दिन पैदल चलते-चलते लोग कहीं उन इलाकों में पहुँचे, जहाँ उनकी बड़ी संख्या थी, जहाँ उनकी सुरक्षा हो सके.
दर्द एक किस्म का ही था. हिंसा का पैमाना एक जैसा नहीं है. कुकी समुदाय का लॉस ऑफ लाइफ और लॉस ऑफ प्रॉपर्टी काफी ज्यादा है, लेकिन यह भी सही है कि दोनों तरफ लोगों ने हिंसा झेली. दोनों तरफ जुल्म सहा और दोनों तरफ के लोगों ने जुल्म किया भी. मुझे लगता है कि यह एक सच्चाई है जिसे हमें पहचानना जरूरी है. एक चीज बहुत जल्दी मैं जोड़ना चाह रहा हूँ कि यह हम लोग मेजॉरिटी-मायनॉरिटी के जो कंपेरिजन करते हैं, उसमें एक बड़ा फर्क यह है कि ये दूसरे तरह के हथियार या तलवार लेकर लोग नहीं निकले. लोग बिल्कुल आधुनिक युद्ध के हथियार जैसे बम, एके-47 लेकर निकले. तो यह जिसे हम सांप्रदायिक हिंसा कहते हैं, यह वह घटना नहीं है. यह एक किस्म का गृहयुद्ध शुरू हो गया है. इसमें मायनॉरिटी कुकी लोगों को इस सरकार पर कोई विश्वास नहीं है और वो मानते हैं और उसके बहुत सारे जायज कारण भी हैं कि उनके खिलाफ मुख्यमंत्री और प्रदेश सरकार की इस युद्ध में भूमिका है.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
मैं आपसे सवाल कर रहा हूँ जॉन कि हर्ष ने कहा कि हम मेनलैंड के चश्मे से उसको न देखें. जिस बात को बहुत सारे दूसरे लोग भी कह रहे हैं और इसलिए यहाँ जो सांप्रदायिक हिंसा होती है, उसे उस रूप में नहीं समझा जा सकता. लेकिन क्या इसे मेजॉरिटेरियन वायलेंस (बहुसंख्यकों की हिंसा) कहेंगे. हालाँकि वह सिविल वॉर का रूप ले सकती है और इस पर हम लोग आगे भी बात करेंगे.
जॉन दयाल
आपके आखिरी टुकड़े का जवाब है- स्टेट स्पॉन्सर्ड वॉयलेंस. दिल्ली का चश्मा तो वहाँ चलेगा नहीं. स्टेट स्पॉन्सर्ड, स्टेट सपोर्टेड और उसके बाद खुद स्टेट पर्दे के पीछे चला जाता है और लोगों को लड़ने देता है. यह मैं अब सबसे बड़ा खुलासा करता हूँ कि जो हर्ष ने बात कही है कि दिल्ली के ऐनक से नहीं देखा जा सकता. न दिल्ली की राजनीति से, न पार्लियामेंट की राजनीति से देखा जा सकता है. अगर सिर्फ जंतर-मंतर के प्रदर्शनों को मैं देखता और चूँकि मैं खुद ईसाई हूँ और मैं कई बार वहाँ गया तो मुझे लगता कि शायद सिर्फ हिंदू मैतेई का ईसाई कुकी के ऊपर अत्याचार है. क्योंकि वो ईसाई हैं न कि वो कुकी हैं. नागा भी ईसाई हैं वहाँ. तमिल भी काफी तादाद में हैं, उनमें भी ईसाई हैं और बाकी जो दिल्ली से जाते हैं उनमें भी ईसाई लोग होंगे. वहाँ पर फादर्स हैं, क्रिश्चियंस हैं. वो सब सेफ हैं.
वहाँ जाने के बाद आपको पता लगता है कि किस तरीके से कुकी समाज की सोशलॉजिकल, एंथ्रोपॉलॉजिकल एंटिटी, उनके अस्तित्व पर प्रहार है. किसी भी हालत में उनको डराकर अगर हो सके तो कब्रिस्तान, नहीं तो पाकिस्तान नहीं तो बर्मा भेजा जाए. उसके लिए अगर आप आज किसी भूतपूर्व मुख्यमंत्री से बात करते हैं, किसी रेडक्रॉस के आदमी से बात करते हैं, किसी सोशल वर्कर से बात करते हैं, किसी प्रोफेसर से बात कर सकते हैं, या फिर किसी घटिया किस्म के खूंखार आदमी से बात कर सकते हैं. वो कुकी को कुकी नहीं कहते. वो कहते हैं चिन कुकी नार्को टेररिस्ट जैसे उनका अस्तित्व बिना नार्को टेररिज्म के नहीं है. चिन का मतलब है कि वह बर्मा से आया है, कुकी उसका नाम है. उनको हटाने के लिए यह बहुत जरूरी हो गया है कि सरकार उन सबको कहे कि वो नार्को टेररिस्ट हैं, चीन, बर्मा, थाईलैंड और बांग्लादेश से मिले हुए हैं और गैरभारतीय काम कर रहे हैं, एंटीनेशनल हैं. यह बहुत बड़ा जुमला बन जाता है. तो यह शिफ्ट हुआ है. इसलिए मैं इसको सिर्फ एंटी क्रिश्चियंस वॉयलेंस न समझूँ और उसका रेस्पॉन्स मैं ईसाई होने की तरह न दूँ, बल्कि मैं समझूँ कि इसका राजनीतिक पहलू है और वह कितना खतरनाक है. उसका रेस्पॉन्स मैं नागरिक की तरह दूँ जो पूरे भारतवर्ष के लिए चिंतित है, न सिर्फ अपनी कौम के लिए.
मेरा ख्याल है कि वहाँ पर जाए बिना समझ नहीं आएगा. और वह भी हेलिकॉप्टर से नहीं जाइए. सड़क का जो बीच का रास्ता है, वहीं आपको समझ आएगा कि आप कहाँ हैं. इंफाल में आप सेफ हैं क्योंकि वहाँ एक भी कुकी नहीं है. चूराचांदपुर में आप सेफ हैं क्योंकि वहाँ कोई मैतेई नहीं है. वह जो बीच का रास्ता है. कार से जा रहे हैं तो मुसलमान ड्राइवर मजाक कर रहे हैं कि भारत में वही एक टुकड़ा है मणिपुर में जिसमें मुसलमान सेफ है. कुछ हिस्से में हिंदू सेफ नहीं है, कुछ हिस्से में ईसाई सेफ नहीं है. रास्ते में आप जाएंगे तो आपको दो किलोमीटर में सात बैरिकेड मिलेंगे. मैतेई और कुकी के लगाए बैरिकेड हैं और कुछ पुलिस के हैं. भारत की बीएसएफ पर हमको गर्व होता है जैसे पाकिस्तान बॉर्डर पर वो ऊंट के ऊपर बैठकर करते हैं. सीआरपीएफ पर हमको गर्व होता है कि भारत में जब भी सांप्रदायिक दंगा होता है, पहले यही लोग जाते हैं. इसके अलावा आसाम, राइफल्स, मणिपुर पुलिस. आप कहेंगे सरकारी तन्ख्वाह पर पलने वाली मिलिशिया है. इसके अलावा जब आप इंफाल से जाते हैं तो वहाँ एक अलग किस्म की मिलिशिया है. उसमें मैतेई माताएं हैं जिन्होंने कटे हुए पेड़ों के जरिए सड़क बंद कर रखी है. पाँच मिलिशिया को पार करते हैं और उसके बाद फिर एक टुकड़ा आता है जहाँ पर मैतेई नहीं हैं. यहाँ पर कुकी हैं. जहाँ पर सड़क एक मिट्टी की दीवार से बंद की गई है, जिसमें भाले घुसे हुए हैं. उसके बाद कुकी महिलाएं आती हैं और पड़ोस में कुकी जवान जिनके हाथों में बंदूक हैं.
तो आप समझ सकते हैं कि ये जो दो मिलिशिया हैं, कुकी मिलिशिया उधर और मैतेई मिलिशिया इधर. एक तरीके से आप कह सकते हैं कि भारतीय सेनाएं पीसकीपिंग फोर्स की तरह काम कर रही हैं. उनको अलग करने के लिए. इस पर मैं बाद में आऊँगा कि यह भी सत्य है या नहीं. मगर यह जो बीच में बॉर्डर आ जाता है, आपको ट्रांजीशन का पता लग जाता है कि कैसे हुआ होगा. वहाँ पर हमने भारतीय सेना के बंकर भी देखे जो कुकी की तरफ हैं. हमने कोई बंकर नहीं देखा जो मैतेई की तरफ हो. और शायद वह हमारी भी कमजोरी हो सकती है या शायद हम हर जगह नहीं गए. मगर जब इस तरीके से हम देखते हैं तो आप पाते हैं जहाँ पर कुकी पहाड़ियां और मैतेई प्लेन या वैली मिलते हैं तो यह दो-तीन किलोमीटर का पैच हो जाता है. जो अंदर छोटे-मोटे एंक्लेव हैं, बस्तियां हैं, जैसे वैली में कुकी की कुछ बस्तियां या चूराचांदपुर में मैतेई की कुछ बस्तियां, वो आइलैंड्स थे, वो तो फँस ही गए थे. वहां तो जनसंहार हुआ ही हुआ और ज्यादातर कन्फ्रंटेशन यह जो बेल्ट है, इसमें हो रही है. और इसको देखे बिना आपको मणिपुर की समस्या का हल नहीं समझ आएगा. आप गैरजिम्मेदार हो जाएंगे.
अपूर्वानंद
आपने बिलकुल ठीक कहा. आप दोनों के कहने से यह समझ में आया कि हम जिसे सांप्रदायिक हिंसा कहते हैं, उस सांप्रदायिक हिंसा को अब तक जैसे समझा गया है, वैसे मणिपुर को नहीं समझा जा सकता. लेकिन क्या उसका कारण यह है कि एक इलाका, जिसे कुकी कह सकते हैं कि वह उनका इलाका है और उस इलाके पर आप उस तरह कब्जा नहीं कर सकते या नियंत्रण नहीं कर सकते जैसे बाकी इलाकों पर कर सकते हैं. तो क्या एक अंतर यह है और अगर यह नहीं होता? मैं यह समझने की कोशिश कर रहा हूँ जैसे जॉन ने कहा उससे अभी तक यह समझ में आ रहा है कि हिंसा की शक्ति दोनों के पास है. कुकी लोगों के पास भी हिंसा की शक्ति है, लेकिन खुद जॉन ने कहा कि यह स्टेट स्पॉन्सर्ड या स्टेट सपोर्टेड वायलेंस है. और अगर हम स्टेट स्पॉन्सर्ड-स्टेट सपोर्टेड वायलेंस कहेंगे तो इसे स्टेट सपोर्टेड मैतेई लेड वायलेंस कहना पड़ेगा क्योंकि स्टेट कुकी को तो सपोर्ट नहीं कर रहा है, कुकी के खिलाफ़ ही है. तो इसमें एक मेजॉरिटी व्यू तो है. उसका एक रंग है. मैं फिर इसमें एक तरह की विडंबना देखता हूँ. दोनों से ही पूछता हूँ कि चूँकि एक इलाका है, जहाँ कुकी खुद को किलेबंद कर सकते हैं. इसलिए यह दूसरी हिंसा से भिन्न है, जहाँ हिंसा के शिकार होने वाले अल्पसंख्यकों के पास कोई इलाका नहीं होता. तो क्या यह अंतर है या कोई और है?
हर्ष मंदर
भौगोलिक सरहद तो है. जो वैली है वह मैतेई इलाका माना जाता है और जो पहाड़ हैं उनमें कुछ इलाके में कुकी और कुछ इलाके में नागा रहते आ रहे हैं. यह सरहद तो है पर इससे बहुत ज्यादा कॉम्प्लेक्स कहानी है. 2000 साल या उससे ज्यादा वक्त से मैतेई लोगों का एक अलग राज्य रहा है मणिपुर में और वो उस पर बहुत जायज तौर पर गर्व भी करते हैं. 1949 में वास्तव में मणिपुर आखिर में इंडिया का हिस्सा बना. दूसरी तरफ पहाड़ों में नागा लोग भी शायद हजारों साल से रह रहे हैं. कुकी लोग मानते हैं कि उनका यहाँ आना-जाना हाल ही में हुआ. जब हम एक समुदाय के लोगों से बात करते हैं और जैसे जॉन ने कहा हम पूर्व मुख्यमंत्री से मिले, पीस ह्यूमैनिटी कमेटी के लोगों से मिले, साधारण लोगों से मिले, माताओं से मिले और रिलीफ कैंपों में मिले तो एक ही कहानी मिलती थी. मैतेई लोगों की कहानी है कि ये कुकी लोग पहले तो हिंदुस्तानी ही नहीं हैं. ये बर्मा से आए फॉरेन इन्फिल्ट्रेटर्स हैं. दूसरा इनका मुख्य काम है ड्रग्स. ये पॉपी (पोस्त) की खेती करते हैं और ड्रग्स फैला रहे हैं, जिससे हमारे नौजवानों को नुकसान हो रहा है. उनका तीसरा आरोप है कि वो जंगल नष्ट कर रहे हैं क्योंकि रिजर्व फॉरेस्ट में उनके झूम कल्टीवेशन के तरीके से हमारे जंगल नष्ट होंगे. और उनका यह भी कहना है कि हिंसा उन्हीं की तरफ से हुई और बढ़ी. उसी तरह जब कुकी समाज में जाते हैं और वहाँ के पादरी, स्टूडेंट लीडर से लेकर कैंपों तक में बात करते हैं, तो हम बिल्कुल दूसरी कहानी सुनते हैं. वो कहानी सुनाते हैं कि पहले तो हम इस देश के ही निवासी हैं. दूसरा, यह बिल्कुल सही है कि हमारे कुछ लोग पॉपी कल्टीवेशन करते हैं, लेकिन ड्रग्स का अगर सचमुच बड़े स्तर पर व्यापार है, तो इंफाल और दिल्ली के लोग, नेता और दूसरे लोग जुड़े हैं, ऐसा उनका आरोप है. तीसरे, उनका कहना है कि वो तो जंगलों में ही रहते आ रहे हैं और उससे जंगलों को कभी कोई नुकसान नहीं हुआ. उनका यह डर है कि मैतेई लोग जब एसटी स्टेटस लेंगे तो वो पहाड़ों में आकर हमारे इलाकों की हमारी जमीनें खरीदेंगे, जिस पर अभी रोक है. हम लोगों को रिजर्वेशन के कारण सरकारी पदों में जो जगह मिली है, वो उन पर कब्जा कर लेंगे. और आखिर में उनका आरोप है कि मुख्यमंत्री खुलकर हमारे खिलाफ एक तरह से गृहयुद्ध में पक्षधर बन गए हैं.
जब हम दोनों तरफ की बातें सुनते हैं, मुझे लगा कि यहाँ समझौते की कोई जगह ही नहीं है और दोनों मान रहे हैं कि यह हमारा अस्तित्व का एक किस्म की आखिरी लड़ाई है. अगर हम हार गए तो हमारा अस्तित्व खत्म हो जाएगा. मैतेई भी यह मान रहे हैं और कुकी भी यह मान रहे हैं और उनको जोड़ने की कोशिश सरकार की तरफ से बिल्कुल नहीं हो रही है. That is the complexity of this. और आखिर में मैं सोच रहा था कि बातचीत शुरू भी कहाँ से हो तो मुझे लगा कि शायद शुरुआत वहीं से हो कि जब हम लोग कुकी लोगों के साथ बैठें तो वो अपना दर्द याद करें जिससे वो गुजरे हैं, लेकिन यह भी याद करें कि दूसरे समुदाय के लोग भी उसी तरह के दर्द से गुजरे हैं और मैतेई लोगों से हम बात करें तो वो भी अपने दर्द को याद करें, लेकिन दूसरे समुदाय के भी दर्द को भी याद करें. जब हम बात कर रहे थे तो एक तरह से उन्होंने कंप्लीट्ली ब्लॉक ऑफ कर दिया. वह सिर्फ हमलोगों के साथ इतना जुल्म हुआ है, कहते हैं, लेकिन दूसरे समुदाय के साथ हुए जुल्म को बिल्कुल एकनॉलेज भी नहीं करते. खाई बहुत ज्यादा गहरी है. एक तरह के अस्तित्व की लड़ाई दोनों तरफ मान रहे हैं और हथियारबंद तरीके से मॉडर्न वॉरफेयर के तौर पर इसको लड़ रहे हैं और सरकार ऐसे बैठी हुई है.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
मैं आपका आशय समझ रहा हूँ. जॉन से मैं वही जानना चाहता हूँ कि इस इतिहास को ऐसे बतलाया गया है कि यह मैतेई लोगों की समझ है मणिपुर के बारे में और यह बहुत दिलचस्प और विडंबनापूर्ण इसलिए भी है कि एक समझ हाल तक थी कि भारत ने जबर्दस्ती मणिपुर को मिलाया है और मणिपुर की स्वायत्तता का संघर्ष मैतेई समूह कर रहे थे. उसमें भारत के बहुत सारे मानवाधिकार समूह उनके साथ खड़े थे कि उनके मानवाधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए. अब वही मैतेई समूह कुकी लोगों की माँगों को पूरी तरह ठुकरा रहे हैं और भारत के नाम पर ठुकरा रहे हैं. और वो कह रहे हैं कि हम भारतीय हैं और ये घुसपैठिए हैं. तो एक तरह से अगर भारत में मणिपुर का अब पूरा इंटीग्रेशन हुआ, तो वह फाइनल इंटीग्रेशन इस हिंसा के जरिए हो रहा है, जिसमें एक आउटसाइडर एक घुसपैठिया नॉमिनेट कर लिया गया है, खोज लिया गया है और अब मैतेई लोग कह रहे हैं कि वो दरअसल भारतीय राष्ट्र के असली रक्षक हैं और वो भारत राष्ट्र को बाहरी लोगों से बचाना चाहते हैं. अब इसको किस रूप में देख रहे हैं जॉन?
जॉन दयाल
मैंने कहा कि पहले तो भारत के इतिहास और भूगोल का थोड़ा बहुत ध्यान हर बच्चे को रखना चाहिए. उसको पता होना चाहिए कि एवरेस्ट भारत की रक्षा तो करता है, पर भारत में नहीं, नेपाल में है. हालाँकि सब समझते हैं कि भारत का नहीं है और न दिल्ली के आसपास है. हमको कुछ विडंबनाएं मणिपुर की भी जाननी पड़ेंगी. मणिपुर आजादी के कुछ दिन बाद भारत का अंग बना. मणिपुर सिर्फ 250 साल पहले हिंदू बना, सिर्फ 150-125 साल ईसाई बना. सब चीजें वहाँ पर एक तरीके से भारत की तरह नहीं हैं. भारत के एडमिनिस्ट्रेशन में और भारत की पॉलिटिक्स में भी उनके बारे में अज्ञान है. हम लोग भूल जाते हैं कि जब मणिपुर राज्य था, तो वहाँ पर एक राजा था, जिसको वो कहते हैं कि सूर्यवंशी था और 2000 साल से है और विश्व का सबसे पुराना रजवाड़ा है.
जब वह रजवाड़ा था तब भी पहाड़ों पर कोई मैतेई नहीं रहता था. पहाड़ों पर नागा ही रहते थे और भिन्न-भिन्न किस्म की जनजातियां रहती थीं. वो अपने आपको नागा भी नहीं कहते थे, कुकी भी नहीं कहते थे. सब लोग एक्जिस्ट कर रहे थे कुछ दिन पहले तक. झगड़े होते थे, लड़ाई होती थी, हर कोई एक दूसरे से लड़ता था. अगर सात लोग हैं वहाँ तो सातों किसी न किसी समय एक दूसरे के खून के प्यासे रहते थे. कभी तीन मिलकर चार से लड़ जाते थे और यह होता रहा. आज भी कुछ हद तक वह है, मगर आज की हिंसा में क्रूरता आई है. जैसे हर्ष ने कहा दोनों तरह से है. मगर किस तरफ खून ज्यादा हुए हैं, किस तरफ रेप ज्यादा हुए हैं, किस तरफ घर ज्यादा जलाए गए हैं, किस जगह गाँव जलाए गए हैं तो कुकियों के ऊपर ज्यादा अत्याचार हुआ है.
यहाँ पर जो कूरता आई है, वह गुजरात और मुंबई में 93 के बाद, कंधमाल में भी नहीं देखी गई थी. वहाँ पर भी गैंग रेप हुए, कंधमाल में भी नंगा घुमाया गया. सब कुछ हुआ, मगर वहाँ कंधमाल की बाकी औरतें ताली नहीं बजा रही थीं, अपने मर्दों को नहीं कह रही थीं कि आप इसके साथ जाकर दोबारा रेप कीजिए. यहाँ पर हुआ. इस तरह की क्रूरता आई है. एक जगह दो महीने के बच्चे का कत्ल होता है, एक जगह दो साल के बच्चे का कत्ल होता है, पुलिसवालों का कत्ल होता है, सैनिक का कत्ल होता है और बहुत ही खूबसूरत, जवान तबका बहुत सी महिलाएं. हमको कैसे पता लगा. इन्होंने इन सबकी फोटो मिनी सेक्रेटेरिएट के आगे एक मेमोरियल में लगा रखी हैं. उनका लाश नंबर नहीं है, उसकी शक्ल आपको मिल जाती है.
हर्ष ने एक बहुत बड़ी बात कही है. जब आप किसी कैंप में जाते हैं, अगर आप किसी का दुख समझने की कोशिश करें और वहाँ के जो स्पोक्सपर्सन हैं, जो अच्छी तरह बोल सकते हैं अगर उनको सुनें, तो आपको दोनों की टोनेलिटी में, दोनों के डिस्क्रिप्शन में, किस तरीके से वो बखान कर रहे हैं, किन लोगों को वो अपने खिलाफ बताते हैं और कि उनको किसने बताया, अपनी आपबीती सुनाते हैं. और उस आपबीती में अगर कुछ आता है तो वह है क्रूरता, जो सब जगह हुई. फिर उनका दुख कम करने में, उनके आँसू पोंछने में, उनको दवाई देने में आजकल एक दिक्कत आ रही है. ये लोग अपने हाल पर छोड़ दिए गए. मैतेई गवर्नमेंट कॉलेज इंफाल में और कुकी चर्च के कंपाउंड्स में पचासों जगह अपने हाल पर छोड़ दिए गए हैं कि कोई भी ईश्वर के नाम पर अगर दान दे दे तो ठीक है, सरकार कुछ नहीं कर रही है. 500 रुपए मिला है इनको. यह दिल्ली में एक दिन का मिनिमम वेज भी नहीं है. एक दिन का मिनिमम वेज तीन महीने में मिला है. उसको कहाँ लपेट लेंगे, क्या उससे कर देंगे, क्या खरीदेंगे, अल्लाह मालिक है. मेरा ख्याल है, इसके ऊपर हमको सबसे पहले काम करना चाहिए. हमारे साथ जो डॉक्टर्स थे, उनमें एक लेडी डॉक्टर भी थी. डॉक्टर ने देखते ही हमको बताया कि यहाँ के जो बच्चे हैं इनके मुँह को देखने से पता लगता है कुपोषण है क्योंकि उनको क्या मिल रहा है? कुकी बच्चों को क्या मिलता है, चावल का पानी एक तरीके से कह सकते हैं जिसमें कुछ दाने चावल के और कुछ दाने नमक के हैं. दाल नहीं है चर्च कंपाउंड में. और यहाँ कॉलेज कंपाउंड में कभी दाल है कभी नहीं है. मगर बच्चे दोनों तरफ कुपोषित हैं और तीन महीने हो गए हैं. अगर छोटा बच्चा है दो महीने का-चार महीने का, छह महीने का, चार साल का तो इस स्टेज पर उसको कुपोषण आगे उसके दिमाग पर असर करेगा, उसकी हड्डियों पर असर पड़ेगा और उसकी ग्रोथ पर असर पड़ेगा.
अपूर्वानंद
तो हर्ष और जॉन आप लोग दोनों कैंपों में गए. आपने कहा कि दोनों कैंपों के लोगों को अपने हाल पर छोड़ दिया गया है तो क्या इंफाल में जो मैतेई कैंप हैं, वहाँ भी सरकार कोई मदद नहीं पहुँचा रही है? इंफाल में तो सरकार है, वह यह कह सकती है कि वैली में उसको काम नहीं करने दिया जा रहा है, लेकिन फिर मैतेई लोगों के कैंप में भी उतनी ही असंवेदनशीलता क्यों दिख रही है? क्या आपकी कोई बात हुई?
हर्ष मंदर
नहीं. बहुत कोशिश की मैंने चीफ सेक्रेटरी से मिलने की, लेकिन मुलाकात के लिए वक्त नहीं मिला. ये बातें मैं रखना चाह रहा था, हम लोग रखना चाह रहे थे. मैतेई कैंप इतनी बदहाली में नहीं थे जितना कुकी के कैंप थे. उसमें उनकी तादाद भी कम थी और वो ज्यादातर स्टेडियम, बिल्डिंग्स वगैरह में थे. खाने की कुछ मदद दी जा रही थी. लेकिन वहाँ भी मैं मानता हूँ कि मैं आईएएस अफसर रहा हूँ और आईएएस अफसर जानते हैं कि सरकार को वो कैंप चलाना चाहिए, सरकार के अधिकारी वहाँ होने चाहिए थे. उनके डॉक्टर, उनके ऑफिसर्स वो सब चलाते हैं, उनकी ट्रेनिंग होती है. फिर भी सरकार की वहाँ पर कुछ मौजूदगी है, लेकिन जो कुकी इलाका है वहाँ पर बिलकुल ही नहीं है. they have been left on their own और जो चर्च की हम बात करते हैं, यह एक लोकल इवेंजेलिकल चर्च वहाँ पर है. इनका विदेशों से कोई संबंध नहीं है. जो पैसा वो उसके लिए जुटा रहे थे, वह वास्तव में लोकल लोगों ने ही जमा किया है. उसी से वो चला रहे हैं. इसलिए ये हालात हैं जो हमने देखा कि बच्चे लिटरली चावल और नमक से अपना भोजन कर रहे हैं. हमलोग एक जगह गए जहाँ एक एमएलए ने खुद अपने घर में इन सबको रखा है और वह अपने ही पैसों से इनको खाना खिला रहे हैं. वो मैतेई एरिया में था, लेकिन कुकी एरिया में बिल्कुल ही लोगों को... और मैं मानता हूँ कि प्राथमिकता बहुत सारी चीजों की है, लेकिन ऐसे वक्त में जहाँ काफी दूर तक इतनी भी रौशनी नहीं दिख रही है कि लोग एक साथ बैठकर निकट भविष्य में इसका हल निकालेंगे. तो वो हालात कि जब लोग वापस अपने घरों में जा सकें, वो हालात पता नहीं कब आएंगे? इस बीच में जब यह सारी लड़ाई चल रही है, बच्चे पैदा हो रहे हैं, छोटे-छोटे बच्चे माँ का दूध पी रहे हैं, थोड़ा बड़े हो रहे हैं, बुजुर्ग लोग हैं, बीमारियां हैं. यह एक मानवीय संकट है.
क्या अमृतकाल के भारत में 75 साल बाद भी हमलोगों के पास 50 हजार लोगों की देखभाल के साधन हमारे पास नहीं हैं? सरकार की जवाबदेही सबसे पहले करना बहुत जरूरी है कि जब सिविल वॉर चल रही है तो कम से कम इसके कारण जो सामान्य लोग शिकार हुए हैं, वो कुछ अपनी जिंदगी काट सकें. यह सरकार की पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए और मैं यह कहना चाह रहा हूँ कि 2002 गुजरात से कई बार कंपेरिजन होते हैं. एक जो मुझे लगता है कि बहुत बड़ा कंपेरिजन और जायज कंपेरिजन है कि 2002 गुजरात में पहली बार मैंने देखा था कि जहाँ सरकार ने खुलकर कहा कि हम कोई रिलीफ कैंप नहीं लगाएंगे. एक वक्त था जहाँ अकेले अहमदाबाद में लगभग एक लाख लोगों को कैंपों में रहना पड़ा था. वह पूरा उस समुदाय पर ही छोड़ दिया गया था और मुस्लिम समाज के पास इस हालत में कौन सी जगह थी? तो कब्रिस्तानों में कैंप लगे हुए थे. कई महीनों तक कैंप कब्रिस्तानों में चला. इस सरकार ने बहुत लड़ाई के बाद कुछ भोजन का योगदान किया. वही परंपरा दिल्ली में 2020 में भी हमने देखी, जहाँ सरकार ने रिलीफ की जिम्मेदारी नहीं ली और वह अब हम देख रहे हैं मणिपुर में, जहाँ सरकार इस न्यूनतम संवैधानिक जिम्मेदारी से भी पीछे है.
अपूर्वानंद
जो हर्ष कह रहे हैं, फर्क तो है और इससे हिंसा के स्वरूप का भी पता चलता है कि एक तो मैतेई कैंप कम हैं, उनकी तादाद कम है यानी विस्थापित होने वाले कम लोग हैं. उसके कारण अलग हो सकते हैं, लेकिन संख्या कम है और उसी प्रकार हिंसा के शिकार लोगों में मैतेई लोगों की संख्या कम है. जैसा जॉन आपने पहले कहा कि मारे गए लोगों में भी उनकी संख्या कम है, कुकी लोगों की संख्या ज्यादा है. तो कुकी शिविर या कुकी कैंप राहत कैंप पूरी तरह से निराश्रित हैं. उनमें सरकार कहीं दिखाई नहीं पड़ रही है. एक प्रश्न जॉन से यह है कि मैतेई शिविर को भी मैतेई समुदाय के हवाले कर दिया गया है या सरकार वहाँ है? दूसरा यह कि यह सरकार की जो गैरहाजिरी है, हर्ष खुलकर यह कह रहे हैं कि एक सिविल वॉर चल रहा है. आपने पहले कहा कि यह विडंबना है कि इंडियन आर्मी पीसकीपिंग फोर्स है और उस पर आप आगे बात करना चाहेंगे. तो क्या इंडियन स्टेट या भारतीय राज्य मणिपुर से पूरी तरह से लुप्त हो गया है? क्या हम यह कहेंगे कि यह राज्य है, लेकिन वह दूसरे तरीके से काम कर रहा है?,
जॉन दयाल
राज्य अगर काम कर रहा है तो अपनी चुप्पी से काम कर रहा है. आवाज न लगाकर काम कर रहा है. प्रधानमंत्री का मुँह न खोलना तीन महीने तक, मुख्यमंत्री का मुँह न खोलना. मुख्यमंत्री ने कहीं का दौरा नहीं किया है, प्रधानमंत्री तो करेंगे भी नहीं. स्टेट कुकी के साथ तो नहीं है. कुकी एरिया में भी नहीं है. मैतेई एरिया में चूँकि राजमहल वहीं है, चीफ मिनिस्टर हाउस वहीं पर है, हाइकोर्ट वहीं पर है, राज्य तो वहाँ पर पहले से है, मगर क्या इन समुदायों के साथ है? सड़क के ऊपर पाँच हजार लोग कुकी के खिलाफ प्रदर्शन तो कर सकते हैं, मगर कोई चंदा नहीं है यहाँ लोगों के लिए अनाथों के लिए. यह ठीक बात है चूँकि यहाँ जो बाहर से विस्थापित आए हैं, उनको सरकारी जगहों पर रखा गया है. मगर अभी भी वो दानपात्र पर जीवित हैं. वहाँ पर हफ्ते में एक दिन या दो दिन डॉक्टर आता है. दवाइयां बिल्कुल नहीं हैं, खासकर डायबिटीज की दवाई, संक्रामक रोगों की दवाई, बुखार-जुकाम की दवाइयों के अलावा कोई दवाई नहीं है वहाँ पर.
हर्ष मंदर
यहाँ कहना चाहता हूँ कि खासकर इन शिविरों में कहीं भी शिक्षा का कोई काम नहीं चल रहा है. They are losing an entire generation of education.
जॉन दयाल
बच्चे क्या करेंगे? वो ब्लैंक आँखों से खेल रहे हैं, घूम रहे हैं, कुछ कर नहीं रहे हैं. बच्चे बिना शिक्षा के हैं, शिक्षक बिना स्कूल के हैं क्योंकि बड़ी तादाद में शिक्षक भी विस्थापित हुए हैं. और बताता हूँ कि कुकी ज्यादा क्यों विस्थापित हुए हैं? क्योंकि वो मैतेई एरिया में आकर काम करते थे, इंफाल में आकर काम करते थे. जहाँ पर हम गए थे, वह होटल एअरपोर्ट के पास है. उससे कुछ ही दूरी पर एक चर्च और उसके आगे एक ईसाई कॉलोनी है. यह स्लम नहीं है. यह वहाँ की डिफेंस कॉलोनी है, वहाँ का महारानी बाग है. सभी ईसाइयों के घर हैं. वहाँ पर एक-एक घर चुन-चुनकर जला दिया गया है. चर्च की हालत देखेंगे तो किसी भी आदमी की आँसू आ जाएंगे. हिंदू के भी आँसू आ जाएंगे. भगवान के घर की ऐसी हालत नहीं होनी चाहिए. वहाँ पर जो पुलिस वाले हैं वो हिंदू थे, वो भी कह रहे थे कि क्या बकवास हो रही है, यह सोचने की बात है. मगर यह सबसे बड़ा मानव संकट लगता है. बातचीत का सिलसिला यहीं से शुरू होना चाहिए कि इन बच्चों को कैसे दवाई पहुँचाई जाए, कैसे खाना पहुँचाया जाए. वहाँ पर हेलिकॉप्टर से एमपी और जर्नलिस्टों को नहीं जाना चाहिए. कार जा नहीं सकती क्योंकि उसको लूट लिया जाएगा, ट्रक जा नहीं सकता क्योंकि ट्रक में रसद लूट ली जाएगी. आज चूराचांदपुर में हेलीकॉप्टर की रोज 10 सर्विस हों, 100 सर्विस हों. जहाँ पर दवाइयां पहुँच सकें, खाना पहुँच सके, गोश्त की बात नहीं हो रही है, अच्छी क्वालिटी का चावल पहुँच सके. कुछ तो आ सके. अगर पैसे भेजेंगे तो कहाँ से खरीदेंगे वो. दुकानें खाली हो चुकी हैं. वहाँ पर एक एनजीओ का रसदघर है जो खाली हो चुका है.
हर्ष मंदर
दवा की दुकानों में कह रहे हैं कि दवा भी नहीं आ रही हैं मतलब आप खरीद भी नहीं सकते दवाई पहाड़ों में.
जॉन दयाल
अगर आप ह्यूमेनेटेरियन एड भेजें तो कम से कम सांत्वना तो होगी कि हमारे साथ भारत की सरकार है या भारत में कोई सरकार है भी जो हमारे साथ है. उसके बाद आप लोगों को बुलाएं. यह सिविल वॉर चल नहीं सकती भारत में. कब तक चलेगी और अगर होगी तो इसमें दखलंदाजी होगी और बैर बढ़ेगा. इसको आज ही कम से कम दिनों में खत्म करना चाहिए. इस पर बहस कीजिए, लोगों को बुलाइए जो पारंपरिक जनजातीय नेता हैं, उनके प्रमुखों को बुलाइए, इनके चुने गए प्रतिनिधियों को बुलाइए, इनके धार्मिक नेताओं को, इंटेलेक्चुअल नेताओं को बुलाइए. वहाँ पर भी हर्ष मंदर होंगे बहुत सारे या भारत की कोई ऐसी जगह है जहाँ 10 साल में हर्ष जैसे लोग न आएं या हमारा देश इतना रेगिस्तान हो गया है. फिर तो हम सब गए. वहाँ पर भी अच्छे लोग हैं, उनको बुलाइए, उनसे बात कीजिए. सॉल्यूशन आएगा और सरकार आपने आपको बड़ा न बनाए, डंडी न मारे.
अपूर्वानंद
तो जॉन यह कह रहे हैं कि शुरुआत इससे होनी चाहिए, जो आपने भी कहा कि एक तरह की इंसानी पहल हो. जो वह शिविरों से शुरू हो सकती है, जहाँ आप बच्चों की शिक्षा का इंतजाम करें और शायद यह इस तरह से हो सकता है. मुझे मालूम नहीं है कि कैसे होगा क्योंकि अभी यह काफी कठिन है, लेकिन कुछ मैतेई समूह भी कुकी शिविरों में सहायता पहुँचाने का काम करें और हालाँकि कुकी और मैतेई के बीच समीकरण अभी बिल्कुल असमान है, तो यह मांग करना कि कुकी ऐसा करें, शायद बहुत उचित नहीं होगा. लेकिन नंदिता हक्सर ने जो लिखा है, मैं उसको पढ़ रहा था. उन्होंने कहा कि मैतेई समाज को पहल करनी होगी और उसे पहल करनी चाहिए तो क्या हर्ष आप इससे सहमत हैं?
हर्ष मंदर
मैं पूरी तरह से सहमत हूँ. गुजरात 2002 का अनुभव भी मैं याद कर रहा था. वास्तव में मेरे नौजवान साथियों को मैं याद कर रहा था कि गोधरा के केंद्र में जब यह सारी हिंसा हुई थी और वह एक तरह से एपीसेंटर था तो लोगों के घर जलाए गए थे, तो हमने एक कॉल दिया था कि हम लोगों के घर दोबारा बनवाने के लिए सहायता प्रदान करेंगे. लेकिन हमारी शर्तें होंगी कि हर घर में हिंदू और मुसलमान मिलकर घर का पुनर्निर्माण करेंगे. लोगों ने कहा था कि यह असंभव है, लेकिन 80 गाँवों में ऐसे लोग सामने आए और उससे एक तरह हीलिंग का प्रॉसेस शुरू हो पाया. मैं शत-प्रतिशत सहमत हूँ कि लोग पहले तो मानें कि मुझे बहुत पीड़ा है कि मैं मैतेई हूँ, मुझे बहुत पीड़ा है कि मैतेई के साथ जो हिंसा हुई और जिनके घर जलाए गए. मुझे इसकी भी पीड़ा है जो कुकी लोगों के घर जलाए गए, उनके साथ जो हिंसा हुई. यहाँ से बातचीत शुरू हो. और पहले तो सरकार असिस्टेंस दे, लेकिन यह असंभव बिल्कुल नहीं है. जहाँ हम अपेक्षा कर रहे हैं कि मैतेई डॉक्टर्स कुकी इलाके में जाएं और काम करें. मैतेई सोशल वर्कर्स उस समाज में जाकर काम करें और होंगे लोग. मुझे पूरा यकीन है कि ऐसे लोग होंगे जो यह करना चाहते होंगे और वहीं से होंगे. वरना ऐसे लग रहा है कि बिल्कुल युद्ध वाली स्थिति है. हम बार-बार युद्ध की बात क्यों कर रहे हैं. क्योंकि इतनी बड़ी दरार हो गई है. लग रहा है कि कोई उसके पार जा ही नहीं सकता. हमें इंसानियत का एक सेतु बनाना जरूरी है जिसमें लोग दोनों तरफ जा सकते हों.
अपूर्वानंद
जी हाँ. जॉन, हर्ष जो कह रहे थे, उसको अगर थोड़ा आगे बढ़ाएँ. एक और पक्ष की तरफ हम जाएं. वह पक्ष यह है कि इसमें नाइंसाफी हुई है, हत्याएं हुई हैं, बलात्कार हुए हैं, यौन हिंसा हुई है. परसों मैं करण थापर के साथ दो महिलाओं का इंटरव्यू देख रहा था जिसमें वह बतला रही थी कि कैसे एक के पति और उसकी सास को उसके सामने मार डाला गया और कैसे मैतेई औरतें और मर्द मिलकर एक साल के बच्चे को मार रहे थे. वह औरत बच गई. हालाँकि उसको भी मारने की कोशिश की गई. तो ये घटनाएं इंसाफ चाहती हैं.
यह भी एक विडंबनापूर्ण बात है कि सर्वोच्च न्यायालय में भारत सरकार ने कहा है कि यौन हिंसा का जो मामला वीडियो पर अभी सामने आया है, उसकी जाँच और मुकदमा दोनों एक तो सीबीआई को दी जाए और मुकदमा असम के बाहर चले यानी गौहाटी हाईकोर्ट के बाहर. तो एक प्रकार से संघीय सरकार यूनियन गवर्नमेंट खुद ही अविश्वास जता रही है कि उसे मणिपुर की सरकार पर विश्वास नहीं है. और यह अविश्वास इतना गहरा है कि असम की अदालत भी नहीं कर सकती? यह गुजरात में हुआ था. जॉन आपको याद होगा, जिसमें गुजरात के कई मुकदमे गुजरात से बाहर किए गए थे क्योंकि वहाँ साफ तौर पर पूर्वाग्रह था. यह हर्ष को भी याद है, जॉन को भी. तो यह जो हालत है, जिसमें अपनी ही कार्रवाई से यूनियन गवर्नमेंट या संघीय सरकार बतला रही है कि वह राज्य सरकार पर विश्वास नहीं करती. यहाँ तक कि वह उसकी न्याय प्रक्रिया पर भी विश्वास नहीं करती. बाहर करना पड़ेगा क्योंकि शायद विटनेस प्रोटेक्शन नहीं होगा, बाकी चीजें नहीं होंगी और न्याय नहीं हो पाएगा. तो ऐसी स्थिति में जब लोग सब जानते हैं, लेकिन वह सरकार बनी हुई है, बीरेंद्र सिंह बने हुए हैं और संघीय सरकार यह कर रही है तो फिर यह प्रक्रिया शुरू कैसे होगी?
जॉन दयाल
प्रक्रिया शुरू तो तब होगी जब लोग पकड़े जाएंगे और पुलिस एक्शन करेगी जमीन पर. इस हिस्से में तो पुलिस बिल्कुल नहीं है और दूसरे हिस्से में भी पुलिस नाममात्र का काम कर रही है, जो हमने अपनी आँखों से देखा. आज की तारीख में सड़क कैसे साफ की जाए, कैसे इंफाल में रसद आएगी, अभी इंफाल में रेलवे स्टेशन मिलने वाला है, जो भी रसद आएगी, वह कैसे कुकी इलाकों में जाए, लूटी न जाए. मेरा खयाल है कि रेप ट्रायल्स परसों भी हो सकती है, अगर आदमी पकड़ा जाए तो? मगर हमको प्रायॉरिटाइज करना पड़ेगा. क्या हमारे लिए जरूरी है? हमको प्रायॉरिटाइज करना है. यह जो सोशल क्राइसिस हुई है. सबसे पहले इंटरनेशनल रेडक्रॉस नहीं, भारतीय रेड क्रॉस तो जाए वहाँ पर.
अपूर्वानंद
वह भी नहीं है?
हर्ष मंदर
कोई भी नहीं दिखा.
जॉन दयाल
आर्मी ने कई बार बड़ा काम करके दिखाया है, जब ऐसी क्राइसिस आती हैं. आर्मी मेडिकल कोर इतना बड़ा अस्पताल वहाँ पर देती है जो सिविल अस्पताल को शर्मसार कर दे. वह नहीं है. अभी मिलिट्री फोर्स ने भी अपने अस्पताल वहाँ पर नहीं खोले हैं. कम से कम वह तो खोल सकते थे. एक दो एंबुलेंस पीपीपी करती हुई घूम रही हैं. पीसकीपिंग आप पूरी तरह ठीक से कीजिए. अगर आप हर रोज दिल्ली और इंफाल में एंटी कुकी डेमॉन्स्ट्रेशन करते रहेंगे तो उससे आत्मविश्वास तो बढ़ेगा नहीं. कम से कम आप तो आगे आइए. प्रधानमंत्री को मेरा कहना है कि आज की तारीख में यह जो सारा हल्ला हो रहा है, इसे बंद करने के लिए पार्लियामेंट के अंदर एक बड़ा बयान देना चाहिए और जो प्रायॉरिटाइज किया गया है, ह्यूमेनिटेरियन, पीसकीपिंग और उसके बाद जो पॉलिटिकल सॉल्यूशन है. पॉलिटिकल सॉल्यूशन तो फाइनल है, वह हो गई तो उसके बाद तो और कोई चीज की जरूरत नहीं होगी. उसको समय नहीं दे सकते. आजकल भारत में कई खंड हैं, कई जगह हैं, जिनकी पॉलिटिकल सॉल्यूशन आज भी नहीं है. हम भी जानते हैं, सब लोग जानते हैं. ठीक भी है, चलता रहता है रफ्ता-रफ्ता धीरे-धीरे टुकड़े-टुकड़ों में पॉलिटिकल सॉल्यूशन आती रहती है. यहाँ पर आज क्राइसिस प्वाइंट यह नहीं है कि कोर्ट कह दे इनको स्टेटस दे दिया जाए. क्राइसिस प्वाइंट यह है कि उनके बच्चे मर रहे हैं तो कोई राहत दी जाए. जिसने कानून तोड़ा है कोई भी हो, उसको आप पकड़िए.
पत्रकारों को खुली छूट दीजिए. हालाँकि आज का पत्रकार इतना डरा हुआ है दो-चार को छोड़कर. वह जाना नहीं चाहता और जाए भी तो कैसे, किस सड़क से जाएगा? वहाँ पर आपको भारतीय पत्रकार की कार नहीं मिलेगी. डॉयचे वैले, बीबीसी की कार मिल जाएगी. मगर वहाँ भारतीय पत्रकारों को भी खुली छूट होनी चाहिए. वह जो लोग कह रहे हैं कि माँ औरतें छोटे से बच्चे को पीट रही हैं, जबकि सड़क पर भी कोई चलती हुई औरत को बच्चा मिल जाए, तो वह उसको उठा लेती है. पुलिस वाले उठा लेते हैं, दिल्ली में पुलिस विमेन पड़े हुए बच्चे को उठा लेती है और अपने घर ले जाती हैं. क्या यह वहाँ पर नहीं हो सकता था, हो सकता था कोई शह ही नहीं मिली. और इक्का-दुक्का जिससे मदद करने की कोशिश की भी उसको धमकी दी गई. कई लोगों को जो टीवी पर कुकी के हक में बोले और खुद मैतेई लोगों को, उनके रिश्तेदारों को, उनकी पत्नी को, उनके घर को दिल्ली में और इंफाल में धमकी दी गई.
अपूर्वानंद
यह हमने दिल्ली में देखा है कि बहुत सारे मित्र जो कुकी हैं लेकिन खुलकर नहीं बोलना चाहते. जैसे हैदराबाद के प्रोफेसर जो कुकी हैं, उन्होंने अपनी बात कही, तो उन पर एफआइआर दर्ज कर दी गई और अब वह उस एफआईआर के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में हैं, तो यह काफी खतरनाक है. आप अगर यहाँ हैं भी और यह जो तरीका कि अगर आप राज्य के बारे में कुछ भी बोलेंगे तो वह अपने राज्य में एफआईआर कर देंगे. असम में एफआईआर होगी, त्रिपुरा में होगी या मणिपुर में होगी और फिर आपको गिरफ्तार करके वहाँ ले जाया जाएगा. तो बाहर रहकर भी आप सच नहीं बोल सकते, वह नहीं बता सकते. यह भी एक बहुत बड़ी दुविधा है, जो मैं मणिपुर के अपने मित्रों के बीच देखता हूँ, लेकिन यह आखिरी प्रश्न है.
और मैं जानता हूँ कि आप समझने का ही प्रयास कर रहे हैं कि हम क्या करें और ऐसे हालात में एक असहायता का भी अनुभव होता है कि मणिपुर में मानवाधिकार को लेकर एक लंबे समय से संघर्ष रहा है. आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट, मणिपुर की इरोम शर्मिला का संघर्ष और इसलिए मणिपुर के मानवाधिकार के संघर्ष को भारत के मानवाधिकार समूहों ने काफी समर्थन दिया. उसमें मैतेई समूह शामिल रहे हैं जिनके साथ भारत के मानवाधिकार समूहों का जिंदा रिश्ता रहा है. मुझे अभी तक याद है कि आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट पर सर्वोच्च न्यायालय में मणिपुर को लेकर ही भारत के मानवाधिकार समूहों ने मुकदमा किया था. मुकुल सिन्हा और बाकी लोग थे. अगर मुझे गलत याद नहीं तो वह जस्टिस आफताब आलम थे. भारत के मानवाधिकार संगठनों और मणिपुर के मानवाधिकार संगठनों का एक लंबा मेलजोल का इतिहास रहा है. भारत के लोगों ने काफी काम किया है, तो क्या यह संभव नहीं है कि भारत के जो मानवाधिकार समूह हैं, वो पहलकदमी करें, जिनकी आप बात कर रहे हैं.
हर्ष मंदर
बिल्कुल. मेरा मानना है कि भारत की जो सिविल सोसायटी है, उसमें जो मानवाधिकार के लोग हैं और जो ह्यूमेनिटेरियन एजेंसी हैं, दोनों को मणिपुर के लोगों से हाथ से हाथ मिलाकर काम करना चाहिए. उनके लिए सबसे ज्यादा जरूरत का, सबसे ज्यादा खतरे का वक्त है. वहाँ जाकर उनके साथ खड़े रहना बहुत जरूरी है. अगर रिलीफ सबसे पहली प्राथमिकता है. सरकार से पूरा हिंदुस्तान का समाज मदद के लिए लड़े कि सरकार क्यों नहीं अपनी जिम्मेदारी निभा रही है. फिर जो न्याय की बात है, उसमें सब लोग मिलकर यह लड़ाई लड़ें. यह पहल बहुत ज्यादा जरूरी है और वहाँ से एक तरह से शुरुआत हो सकती है. आखिर में मैं फिर से कहना चाह रहा हूँ कि मणिपुर के हालात की सबसे बड़ी जवाबदेही और जिम्मेदारी सरकार की है, केंद्र और राज्य सरकार की है. उस जिम्मेदारी को सरकार निभाए उसके लिए पूरे भारत के समाज को आवाज उठाना जरूरी है.
अपूर्वानंद
अगर मैं जॉन आपसे आखिरी सवाल करना चाहूँ कि क्या इस हिंसा के लिए दरअसल संघीय सरकार जिम्मेदार है क्योंकि संघीय सरकार ने इस हिंसा को जारी रहने दिया है. तो हम सिर्फ उसे राज्य समर्थित नहीं कह सकते, बल्कि संघीय सरकार द्वारा भी मौन समर्थन उसको प्राप्त था कि यह हिंसा जारी रहनी चाहिए.
जॉन दयाल
मैं समझ नहीं पाया कि मोदी जी के मन में क्या था जब उन्होंने मौन साधा और यह चीज बढ़ने दी. इसका किस तरीके से वह हिंदुस्तान के इलेक्शन में इस्तेमाल कर पाएंगे, किस तरीके से जो हिंदू-मुस्लिम यहाँ पर चल रहा है, उसको फैला पाएंगे, किस और तरीके से इसका राजनीतीकरण कर पाएंगे, मुझे समझ नहीं आ रहा है क्या वजह थी उनके मन में. क्या उनकी समझ थी नॉर्थ ईस्ट के बारे में. एक-एक करके उन्होंने सरकारें खरीदीं. जिन 10 एमपी को जो कांग्रेसी थे, उन्होंने भाजपाई बताया, दंगे के तुरंत बाद उनके खिलाफ़ हो गए कि हमें यह चाहिए. तो इनका जो राजनीतिक इरादा था, वह तो फेल हो गया. अब इनको अपनी मूँछ की सोचनी चाहिए. यह सॉल्यूशन कैसे किया जाए. भारत के हित में उसकी सोच रही है और उसके लिए हर्ष और मैं कई बार बोल सकते हैं कि आपको बातचीत करनी है, आपको वहाँ पर अपना दर्द दूर करना है, जो घाव है उस पर मरहम लगाना है, जो बच्चे हैं उनको दवाई देनी है, स्कूल खोलने हैं इंटरनेट खोलना है. तीन महीने हो गए हैं इंटरनेट नहीं है. एक सेकेंड के लिए इंटरनेट ऊपर-नीचे हो जाए तो हम लोग बौखला जाते हैं. तीन महीने से इंटरनेट नहीं है. अगर आप कहते हैं कि हम लॉन्ग डिस्टेंस एजुकेशन करेंगे, तो वह भी नहीं कर पा रहे, कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं. ठीक से रसद भी नहीं है. इन चीजों को लीजिए. फौज को काम करने दीजिए, बॉर्डर टाइट कीजिए. अगर इन्फिल्टरेशन है तो फौज क्या कर रही है हमारी. तय कीजिए कि हम बॉर्डर पर तार लगाएंगे. बांग्लादेश बॉर्डर पर लगाया है, इस पर भी लगाइए. जो भी कुछ करना है, कीजिए और बहाना मत बनाइए. गरीब इंसान को न मारिए.
अपूर्वानंद
बहुत शुक्रिया आप दोनों का और हम जो समझ पाए हैं वह यह है कि इसकी पूरी राजनीति समझने की कोशिश की जा रही है. जैसा जॉन कह रहे थे कि आखिर वो हासिल क्या करना चाहते हैं इससे, जो समझ में आता है हमें कि भारतीय जनता पार्टी यह हासिल करना चाहती है कि वह दिखा सके कि बाहरी लोगों का खतरा भारत में अभी तक बना हुआ है और ये बाहरी लोग ही मणिपुर में सारा संकट पैदा कर रहे हैं. अभी तक इंफाल में जो प्रदर्शन हो रहे हैं, जिनकी बात आप दोनों ने की, वो प्रदर्शन बंद होने चाहिए. जॉन ने बहुत स्पष्ट कहा है कि अगर वे प्रदर्शन आप करते रहेंगे जिन प्रदर्शनों में चालाकी और बेईमानी के साथ कहा जा रहा है कि हम शांति चाहते हैं, लेकिन उसके साथ यह कहा जा रहा है नार्को टेररिज़्म बंद होना चाहिए, उसके साथ कहा जा रहा है कि इन्फिल्टरेशन बंद होना चाहिए, उसके साथ कहा जा रहा है एनआरसी लागू होनी चाहिए. तो शांति हो और उसके साथ ये सारी चीजें हों, इसी में बेईमानी बहुत स्पष्ट है. तो जब तक हम इस बेईमानी को नहीं पहचानेंगे, तब तक मणिपुर में शांति नहीं शुरू होगी. लेकिन मणिपुर सिर्फ भारतीय सरकार की चिंता का विषय नहीं होना चाहिए जैसे आप दोनों ने कहा. और मैं आप दोनों से सहमत हूँ कि भारत के जो रेडक्रॉस जैसे संगठन हैं, दूसरे संगठन हैं, जो ह्यूमेनिटेरियन एड करते हैं, उन्हें हिम्मत से सामने आना चाहिए और खासकर उन्हें कुकी इलाकों में जाना चाहिए क्योंकि वहाँ ज्यादा किल्लत बनी हुई है और कुकी इलाकों को राज्य की कोई भी सहायता नहीं मिल रही है. आप दोनों का बहुत-बहुत शुक्रिया, एक तो मणिपुर जाने के लिए और मणिपुर के बारे में भारत को स्पष्ट तरीके से बतलाने के लिए कि दरअसल वहाँ की हिंसा का स्वरूप क्या है और हमारे साथ बातचीत का वक्त निकालने के लिए. बहुत-बहुत शुक्रिया.
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