Larger society needs to trust our universities : Kadwi Coffee 9
Larger society needs to trust our universities : Academics को Industry के साथ इंगेज करने की जरूरत
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भारत के विश्वविद्यालय कहाँ खड़े हैं, क्या भारतीय विश्वविद्यालय अपने यहाँ एक्सेलेंस को हासिल कर सकते हैं, क्या हैं उनके सामने बाधाएं, भारत की उच्चशिक्षा में कहाँ और कैसी गड़बड़ियाँ हैं और वो कैसे दूर की जा सकती हैं, इंडस्ट्री के साथ यूनिवर्सिटी कैसे संवाद स्थापित करे. इन्हीं और ऐसे बहुत से अहम सवालों के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापक और लेखक अपूर्वानंद ने अहमदाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर पंकज चंद्र से लंबी बात की.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
नमस्कार मैं अपूर्वानंद. कड़वी कॉफी की इस नई कड़ी के साथ आपके सामने फिर हाजिर हूँ. जैसा आपको मालूम है, कड़वी कॉफी अलग-अलग विषयों पर लंबी बातचीत का एक लगातार चलने वाला सिलसिला है. हम कोशिश करते हैं कि जिन विषयों पर अभी समाज में चर्चा हो रही है या हम सोच रहे हैं, उन पर ठहरकर बात कर सकें और उन मित्रों से कर सकें जो लंबे वक्त से इस पर काम करते रहे हैं. इरादा यह नहीं है कि हम सिर्फ अपना विचार व्यक्त कर दें. इरादा यह है कि उस विषय को समझा जा सके और इसीलिए इत्मिनान से बातचीत का एक सिलसिला कड़वी कॉफी के जरिए हमने शुरू किया है. आपने पिछली कड़ियां देखी होंगी, सुनी होंगी और पढ़ी होंगी क्योंकि हम इसे वीडियो के रूप में और पॉडकास्ट के साथ-साथ उसका टेक्स्ट आपको मुहैया कराते हैं. हमें इंतजार रहेगा कि आपको यह बातचीत कैसी लग रही है और उसमें हम आगे और कैसे सुधार कर सकते हैं.
आज हमारे साथ एक बहुत खास मित्र हैं प्रोफेसर पंकज चंद्र जो अभी अहमदाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति हैं और इसके पहले वे इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, बैंगलोर के निदेशक रह चुके हैं. प्रोफेसर पंकज चंद्र वैसे कुलपति या निदेशकों में नहीं हैं जिनके जीवन का ध्येय कुलपति होने या निदेशक होने में शेष हो जाता है, बल्कि विश्वविद्यालय या उच्चशिक्षा संस्थान उनकी चिंता के केंद्र में रहे हैं. 2017 में प्रोफेसर पंकज चंद्र की एक किताब प्रकाशित हुई थी Building Universities that Matter: Where are Indian Institutions Going Wrong?
इस किताब को उच्चशिक्षा के क्षेत्र में काम करने वालों ने बहुत रुचि लेकर पढ़ा था क्योंकि यह किताब जो सवाल पूछ रही थी वो पूछे जाने चाहिए कि आखिर विश्वविद्यालय बनते कैसे हैं और हम जो शिकायत करते रहते हैं कि भारत के विश्वविद्यालयों का पतन हो रहा है, उनमें 1000 तरह की गड़बड़ियां हैं, तो वो क्यों हो रही हैं? इस किताब में प्रोफेसर पंकज चंद्र ने उन विषयों पर विचार किया था. आज हम उच्चशिक्षा पर और विश्वविद्यालयों से जुड़े मसलों पर एक दूसरे से बातचीत करेंगे, समझने की कोशिश करेंगे कि हम जो विद्या, ज्ञान आदि की चर्चा बहुत करते रहते हैं और हम जो बहुत ही दंभपूर्वक यह कहते हैं कि बस हम विश्वगुरु होने वाले हैं. प्रोफेसर पंकज चंद्र क्योंकि आपने पढ़ाई दूसरे देशों में की है और दूसरे देशों में अध्यापन भी किया है. क्या आपको किसी एक ऐसे देश की याद है, जो यह दावा करता है कि वह विश्व गुरु होना चाहता है?
प्रोफेसर पंकज चंद्र
शुक्रिया अपूर्वानंद जी. मुझे तो अभी तक समझ में नहीं आया कि विश्व गुरु होने का मतलब क्या है? लेकिन हमें लगता है कि बात शायद यह है कि क्या हम एजुकेशन से या एजुकेशनल रिसर्च से विश्व में आगे बढ़ सकते हैं? अगर इस विचार से हम एजुकेशन को देखें तो यह ऑब्जेक्टिव बुरा नहीं है. ऑब्जेक्टिव तो हमेशा से एजुकेशन का यही रहा है कि किस तरह से हम अपने विचार आगे रखें, किस तरह से नई पीढ़ी को आगे बढ़ाएं. मेरे ख्याल से कोई भी देश ऐसा नहीं है जो अपने को कहता है कि मैं विश्वगुरु हूँ या सबसे आगे हूँ, या सबसे पीछे हूँ. सभी लोग जानते हैं कि एजुकेशन तो बड़ा एक कॉम्प्लिमेंटरी ज़ोन है कि 10 लोग उसमें साथ आते हैं. आज के समय में तो सबसे बड़ा इंडिकेटर यह है कि सबसे अच्छे शोध वहीं हो रहे हैं जहाँ पर कई देशों के लोग साथ आ रहे हैं. तो मुझे लगता है कि उस चर्चा में तो हम-आप नहीं घुसेंगे.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
मैं दरअसल इसी विषय पर सोच रहा था जिसे ज्ञान-विज्ञान कहते हैं, राष्ट्रीय सीमाओं में बँधा हुआ नहीं होता है. इसलिए जब हम यह कहते हैं कि यह यूरोप का ज्ञान है, तो यह एक तरह से सही है, लेकिन पूरी तरह से सही नहीं है क्योंकि यूरोप में भी अगर कोई ज्ञान पैदा हुआ है, भौगोलिक रूप से अगर किसी व्यक्ति ने यूरोप या अमेरिका या अफ़्रीका में पहली बार कहीं विचार व्यक्त किया है, तो वह सिर्फ वहाँ का नहीं होता. उसमें पूरी दुनिया का योगदान होता है. तो एक तो ज्ञान किसी राष्ट्रीय सीमा में बँधा हुआ नहीं होता और जैसा आपने कहा कि अभी दुनिया में वही विश्वविद्यालय या शोध संस्थान बहुत अच्छा काम कर रहे हैं, जिनमें अलग-अलग देशों के मस्तिष्क साथ मिलकर उस समस्या से जूझ रहे हैं, जिस समस्या को सुलझाना चाहते हैं या जिसका समाधान करना चाहते हैं. वह सिद्धांत का निरुपण हो, किसी दवा की खोज हो या कोई और चीज़ हो. इसमें अलग-अलग मुल्कों के लोग आते हैं और इसलिए आपका जो अपना अनुभव रहा है उसमें एक ऐसा कैंपस या परिसर जिसमें अलग-अलग देशों के छात्र और अलग-अलग देशों के अध्यापक साथ हों, उसके बेहतर होने की उम्मीद ज्यादा है, बजाय उसके जो बिल्कुल एक तरह के लोग यहाँ पर हों. इसके बारे में आप क्या कहेंगे?
प्रोफेसर पंकज चंद्र
बिल्कुल सही कहा आपने. अब आप सोचिए, साइंस कोई लोकल साइंस तो होती नहीं है या ह्यूमेनिटीज़ कोई लोकल तो होती नहीं है. कॉन्टेक्स्ट लोकल होता है. अब हिंदुस्तान में मुझे लगता है कि जो सबसे दिलचस्प समय माना जाता है, वह मेरे ख्याल से शुरुआती 20वीं सदी का था. जब बहुत सारे वैज्ञानिक जेसी बोस, एसएन बोस, मेघनाथ साहा थे. ये कोई इंडियन साइंस नहीं कर रहे थे. वो इंडियन थिंकिंग, इंडियन नॉलेज को ग्लोबल नॉलेज के साथ जोड़ रहे थे. दूसरा वो ग्लोबल स्तर पर एक्सेलेंस अचीव करना चाहते थे. जेसी बोस ने रेडियो वेव वगैरह की खोज की, जिस समय मार्कोनी कर रहे थे और कहते हैं वह तो उनसे आगे भी थे. उन्होंने ही पहले टेलीफोनी के बारे में बात की तो आपकी बिलकुल बात सही है. मुझे लगता है कि पढ़ने-लिखने-सोचने का, शोध करने का माहौल जितना डायवर्स होगा, उतना ही अलग-अलग विचार आ सकेंगे जो किसी एडवांसमेंट ऑफ नॉलेज के लिए बहुत जरूरी है. हम जब बीएचयू गए पढ़ने तो वहाँ तो पहली बार पूरे देश से बच्चे आ रहे हैं. उससे क्या होता है. वह सबको मौका देती है. सबको सबके विचार, सबके एक्सपिरियंस अलग हैं, सो यह डायवर्सिटी तो बहुत ही क्रिटिकल एलिमेंट है और आप दुनिया की कोई भी अच्छी यूनिवर्सिटी देख लीजिए. उसकी खूबसूरती है कि अच्छे-अच्छे लोग पूरे दुनिया भर से आ रहे हैं, चाहे पढ़ने के लिए, चाहे पढ़ाने के लिए. चाहे रिसर्च लैब में 15 और भाषाएं बोली जा रही हैं. उनके अपने कॉन्टेक्स्चुअल आइडियाज आ रहे हैं. तो यह डायवर्स व्यूज, डायवर्स बैकग्राउंड, डायवर्स पर्सपेक्टिव का इंस्टीट्यूशनल ग्रोथ के लिए होना बहुत ही ज्यादा जरूरी है.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
अभी आपने एक शब्द का इस्तेमाल किया एक्सेलेंस या उसे हम उत्कृष्टता कहें या श्रेष्ठता कहें. हम लोग जो पिछले कई वर्षों से एक दूसरे से विश्वविद्यालयों, उच्चशिक्षा संस्थानों के बारे में बातचीत करते रहे हैं. हम बाकी लोगों के साथ एक दूसरे से सहमत होते रहे हैं कि विश्वविद्यालय का एक मकसद दरअसल एक्सेलेंस हासिल करना, समाज को बतलाना है कि एक्सेलेंस क्या होता है? कामचलाऊपन की संस्कृति नहीं होनी चाहिए बल्कि एक्सेलेंस की संस्कृति होनी चाहिए. तो अक्सर लोग विश्वविद्यालय के बारे में बात करते समय इस पक्ष पर बात नहीं करते कि विश्वविद्यालय का एक मकसद उत्कृष्टता या श्रेष्ठता की प्राप्ति है. इसलिए अगर उसका एक मकसद श्रेष्ठता की प्राप्ति है, श्रेष्ठता के विचार को स्थापित करना है तो वह ऐसा किन उपायों से कर सकता है. आपको यह मौका मिला. एक तो आप एक संस्थान के निदेशक हुए जो बहुत पहले से चला आ रहा था, जिसका लंबा इतिहास था और हम निजी तजुर्बे के बारे में भी जानना चाहेंगे. दूसरा विश्वविद्यालय जो अपेक्षाकृत नया था और जिसे अपनी तरह से गढ़ने विकसित करने की छूट आपको थी. तो मैं इस इस बात पर अभी टिका हुआ हूँ कि अगर श्रेष्ठता का उद्देश्य है और आपने कुलपति या निदेशक के रूप में इसे मकसद रखा है, तो आपने अपने संस्थान में कौन सी प्रक्रियाएं शुरू कीं, जिनसे आपने इसको हासिल करना चाहा?
प्रोफेसर पंकज चंद्र
एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस में एक जरा चैलेंज हो गया है कि हर इंस्टीट्यूशन जल्दीबाजी में अपने ग्रोथ के कामों में लग गया है, जबकि एजुकेशन और एक्स्लेंस थोड़ा स्लो कुकिंग वाली प्रणाली है. उसमें आपको सोच-विचार करके, धीरे से कदम लेकर, धीरे से लोगों को एक साथ जोड़कर, उनके विचारों को सामने रखकर आगे बढ़ना पड़ेगा. तब जाकर मुझे लगता है कि उसमें से खूबसूरती से अच्छी चीजें निकलकर आएंगी. हम 3-4 इंस्टीट्यूशंस के साथ हिंदुस्तान में जुड़े. एक तो चीज है कि कहीं न कहीं एक्सेलेंस में गवर्नेंस का हाथ बहुत बड़ा है. ये जितने भी स्टेकहोल्डर्स हैं, उनको पहले तो यकीन करना चाहिए कि हम एक्सेलेंस से लाइवलीहुड ले सकते हैं, एक्सेलेंस से बेहतर सिटिजंस बना सकते हैं, एक्सेलेंस से ही हम लव फॉर लर्निंग बना सकते हैं, जो मेरे खयाल से एजुकेशन के उद्देश्य रहे हैं. हमारे दिमाग में तो हैं. अगर हम उस गवर्नेंस सिस्टम को इस तरह से बना सकें. स्टेकहोल्डर्स कौन हैं? स्टूडेंट हैं, फैकल्टी हैं, एक्सटर्नल स्टेकहोल्डर्स हैं जो पैरेंट्स हैं और लार्जर सोसाइटी है, एक एम्प्लॉयर है. अगर इस ढंग से सोचें तो कहीं न कहीं जो समाज और पेरेंट्स को समझाने का भी इंस्टीट्यूशन का दायित्व रहता है कि क्यों एक्सेलेंस की जरूरत है और किस किस्म से पढ़ाई या किस किस्म से हमारे छात्रों का पर्सपेक्टिव बनाएंगे, क्यों बनाया जाएगा. तो एक तो कम्यूनिकेशन वाली बात है. दूसरी बात यह है कि हम किस तरह अपनी फैकल्टी का सेलेक्शन करते हैं, क्या देखते हैं उसमें? किस तरह से हम स्टूडेंट्स को लेकर आते हैं?
हमारे यहाँ इंडिया में कई लोग कहते हैं कि सेलेक्शन नहीं होता, एलिमिनेशन होता है इंस्टीट्यूशंस में क्योंकि नंबर्स बहुत ज्यादा हैं. तो यह भी सोचने की बात है कि अगर हम इस पर्स्पेक्टिव से स्टूडेंट्स को यूनिवर्सिटी में लाने की कोशिश कर रहे हैं तो उसके एक्सेसलेंस पर क्या नतीजे होंगे? अगर हम बच्चे को एक कैंडिडेट की तरह देखते हैं कि उसमें क्या खूबी है, वह क्या करना चाहता है, हम इंस्टीट्यूशन के बतौर आगे बढ़ने में उसकी कैसे मदद कर सकते हैं या नहीं कर सकते तो मुझे लगता है कि उस पर्सपेक्टिव से अगर हम एडमिशन या और चीजें देखें या जो एजुकेशनल एनवायर्नमेंट क्रिएट करते हैं, उसको अलग ढंग से करेंगे. क्योंकि हम कुछ सौ या डेढ़ हजार या दस हजार बच्चों को एक समूह की तरह नहीं देख रहे हैं, हम सबको व्यक्ति की तरह देख रहे हैं. उनकी एजुकेशन को कस्टमाइज करने की कोशिश कर रहे हैं. सो मुझे लगता है कि यह एक दूसरी बात है जो हम कहीं न कहीं अगर ध्यान रखेंगे तो शायद एक्सेलेंस के ऑब्जेक्टिव या गोल की तरफ बढ़ सकते हैं. तीसरी बात...
प्रोफेसर अपूर्वानंद
नहीं, आप अपनी बात जारी रखें. आपने छात्रों के दाखिले की बात की कि हम दाखिले से ज्यादा एलिमिनेट करते हैं, उनकी संख्या बहुत ज्यादा है. लेकिन दुनिया में कुछ देशों में यह विचार है और हमारे देश में काफी प्रबल होता जा रहा है. आपने शुरू में डायवर्सिटी की बात की थी. अगर हम उसको भी ध्यान में रख लें कि सारे विश्वविद्यालयों को एक यूनिफॉर्म प्रॉसेस, मेकेनिज्म के जरिए छात्रों को दाखिल करना चाहिए. भारत में उसे लेकर प्रयोग शुरू हुआ है. अगर मुझे ठीक याद है तो चीन दूसरा देश है जो यह काम करता है. लेकिन जिन्हें हम अमेरिका के श्रेष्ठ विश्वविद्यालय कहते हैं, जहाँ जाने के लिए हमारे लोग बहुत उत्सुक रहते हैं. तो यह जो एक यूनिफॉर्म या एक कंबाइंड जरिया है, जिससे सारे विश्वविद्यालयों में दाखिले की प्रक्रिया तय हो जाएगी. जो चीन में भी है और जिसको लोग मानते हैं कि ठीक है. इसमें और दूसरी चीज जो आपने कही कि छात्रों का दाखिला एक बहुत महत्वपूर्ण चीज है जिसमें विश्वविद्यालय का हाथ रहना चाहिए. तो उसे आप हमें कुछ समझाएंगे क्या?
प्रोफेसर पंकज चंद्र
मुझे लगता है कि यह जो यूनिफॉर्म स्टैंडर्डाइज्ड सेंट्रलाइज्ड एडमिशन प्रॉसेस की थिंकिंग है, यह एक कंट्रोल मेकेनिज्म है. एक एंटिटी है, एक स्टेट है जो विश्वविद्यालयों को, कॉलेजों को कंट्रोल करने की कोशिश है और उनको वह कह रहा है कि आप सब कुछ अपने आप नहीं कर सकते. Education is based on faith and trust. एक सेंट्रल बॉडी कह रही है कि आप भरोसे के लायक नहीं हैं. कोई हार्वर्ड को तो बोलता नहीं है कि आप भरोसे के लायक नहीं हैं लेकिन वह तो एडमिशन देता है. बच्चे का हार्वर्ड में एडमिशन हो सकता है, हो सकता है कि स्टैनफर्ड में एडमिशन न भी हो. तो अब मुझे तो लगता है सबसे बड़ी बात यहीं पर आती है कि हम अपने इंस्टीट्यूशंस पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं. उनका जो फंडामेंटल टास्क है कि बच्चों को देखें और कहें कि हम किस तरह से आपको अपने इंस्टीट्यूशन में लेकर आएंगे. उसके बहुत से इंप्लिकेशन ये हैं कि हम फिर सात-आठ साल से जैसे कि इंजीनियरिंग एडमिशन में होते ही आए हैं, वो केवल उस एग्जाम की तैयारी करते हैं और स्कूल में बिल्कुल ध्यान नहीं देते हैं.
लर्निंग और एजुकेशन तो बहुत सोशियोलॉजिकल प्रॉसेस हैं. तो जो बच्चा स्कूल खत्म करके यूनिवर्सिटी आ रहा है वह कहीं न कहीं एग्ज़ाम पास करने की मशीन बनकर आ रहा है. मेरे ख्याल से उसमें लर्निंग सीकिंग इंडीविजुअल की क्षमता थोड़ी सी कम हो जाती है. मुझे लगता है कि हमारे यहाँ एजुकेशन पॉलिसी बनाने वालों में शायद एक और रियलाइजेशन न हो कि हर इंस्टीट्यूशन उसके लोगों से बनता है. वहाँ की फैकल्टी, वहाँ का एडमिनिस्ट्रेशन, वहाँ का स्टाफ. हर इंस्टीट्यूशन दूसरे से अलग है. उसकी स्ट्रेंथ्स अलग है, उसका एरिया ऑफ फोकस अलग है, उसका कल्चर अलग है. आप हमारे अच्छे माने जाने वाले इंस्टीट्यूशंस आईआईटी या आईआईएम को ही देख लें. हर इंस्टीट्यूशन अलग है. तो क्या बच्चा हर इंस्टीट्यूशनल कल्चर में क्या अच्छी तरह से परफॉर्म करेगा. यह भी तो सवाल उठता है. उसको हमें उस कल्चर में ले जाना चाहिए जहाँ पर वह कॉन्टेक्श्चुअली बहुत ही अच्छा परफॉर्म करे, जहाँ पर वह अपने को उठा सके. उसके लिए इंस्टीट्यूशन को यह ऑटोनॉमी तो होनी ही चाहिए कि वह कैसे स्टूडेंट्स को सेलेक्ट करें. एक डर लोगों का रहता है कि ये इंस्टीट्यूशंस जो हैं, ये ठीक ढंग से नहीं करेंगे. तो जो इंस्टीट्यूशन ठीक ढंग से नहीं करेंगे, तो वो बैठ भी जाते हैं. वहाँ अच्छे बच्चे जाते भी नहीं हैं. तो यह तो बहुत ही बड़ा मुद्दा है. हमारे यहाँ अभी तक इस तरह था नहीं. इंस्टीट्यूशन अपने आप चुनते थे. अब जेएनयू के ही उदाहरण ले लीजिए. अब पता नहीं अभी एडमिशन कैसे होता है लेकिन आज से 30 साल पहले जब एडमिशन होता था तो बड़ा ही सोच-विचार करके, बड़ा इंटेरेस्टिंग ढंग से एडमिशन प्रॉसेस होता था. जो कॉन्टेक्श्चुअली लर्निंग को भी लेकर आता है और एक्सेलेंस है उसके परफॉर्मेंस को भी देखता है. वह सब देखकर वो स्टूडेंट मिक्स बनाते थे. जो स्टूडेंट का जो फॉर्मेशन है वह एजुकेशन के लिए बहुत क्रिटिकल है कि किस ढंग से हम उसे ड्राइवर्स बनाएं, किस ढंग से ऐसे बच्चे लेकर आएं जिनकी अलग-अलग स्किल्स हैं, जो जब साथ में बैठेंगे तो सबका ही औसत ऊपर उठेगा. उसी से नए आइडियाज़ नए एक्सपीरियंस बनते हैं. और हम अब एक सेंट्रलाइज्ड सिस्टम की तरफ जा रहे हैं जिसके बहुत सारे परिणाम हैं. वह इंस्टीट्यूशन को अलग ढंग से बना रहा है और आगे भी बनाएगा.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
हाँ, अभी चूँकि पहला-दूसरा ही साल है, तो जैसा आपने कहा कि अकादमिक दुनिया में हम बहुत जल्दी निष्कर्षों पर नहीं पहुँचते और जब तक हमारे पास पर्याप्त सूचनाएं न हों, आंकड़े न हों, हम उसका अध्ययन नहीं कर पाते कि इसके पहले क्या स्थिति थी और इसने कैसे प्रभाव डाला है. तो हो सकता है कि अभी हम तुरंत इस पर टिप्पणी न कर सकें लेकिन सैद्धांतिक रूप से जो आपने बात कही वो सही है कि अगर हम श्रेष्ठता की बात कर रहे हैं जिसमें मेरी और आपकी सहमति है और बाकी लोगों की भी होगी. और यहाँ हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि जब हम श्रेष्ठता की बात कर रहे हैं तो वह समानता के सिद्धांत के विरुद्ध नहीं है. यानी समानता के सिद्धांत की कीमत पर श्रेष्ठता नहीं हासिल की जा सकती. इस पर आगे भी हम लोग बात कर सकते हैं. अगर श्रेष्ठता हमारा लक्ष्य है और हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की श्रेणी में शामिल होना चाहते हैं, तो वहाँ की छात्रों के दाखिले की प्रक्रियाओं को देखना बहुत आवश्यक है. आपने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का हवाला दिया है. ऐसे और शिक्षा संस्थान भारतवर्ष में हैं, जिन्होंने बहुत ही क्रिएटिव तरीके से अपनी एडमिशन प्रॉसेस बनाईं और छात्रों को शामिल किया. उनका इतिहास यह साबित करता है कि उनका यह निर्णय सही था. उनके लिए यह बहुत बड़ी ट्रेजेडी होगी कि उन्होंने जो एक विलक्षण चीज विकसित की थी, उसको हटाकर एक स्टैंडर्डाइज्ड और यूनिफाइड सिस्टम में उनको लाया जाए.
आपने एक दूसरी बात कही जो मुझे बहुत मार्के की लगी और वह यह थी कि जब अलग-अलग किस्म के छात्र मिलते हैं, तो औसत स्तर ऊपर उठ जाता है. अगर हम श्रेष्ठता की बात करें और इस औसतपन की बात करें तो सारे संस्थानों का और खासकर शिक्षा संस्थानों का एक मकसद यह भी होता है कि जो समाज का औसत है, उसे ऊपर ले जाएं. तो यह एक मकसद है इस औसत को ऊपर ले जाना, न कि जो औसत ऊपर है, उसको औसत पर ला देना कि आप बहुत डींग हांक रहे थे तो हम आपको खींचकर नीचे ले आएँगे. यह मकसद नहीं होता. मतलब मकसद है औसत को ऊपर ले जाएं. अगर मैं आपकी बात को ठीक से समझ पाया. दूसरा एलिमेंट वह है जिसका जिक्र आपने किया, फैकल्टी या अध्यापक. एक कुलपति के रूप में जैसा आपसे तो हमारी चर्चा होती रही है और आपकी जद्दोजहद रही है कि आप कैसे अच्छी फैकल्टी अपनी यूनिवर्सिटी में लाएं. एक कुलपति के रूप में यह काफी संतोष की बात होती है कि आप अच्छा फैकल्टी मेंबर ला पाए. तो यह जो प्रक्रिया है अध्यापकों को लाने की, बहाल करने की, इस प्रक्रिया में भी भारत के विश्वविद्यालय स्वतंत्र नहीं हैं. उनको एक केंद्रीय निर्देश दिया जाता है, यह बतलाया जाता है कि यह क्वालिफिकेशन होगी, इसके आधार पर आपकी प्रक्रिया होगी. इस प्रक्रिया से आप अध्यापकों का चयन करेंगे. लेकिन जो श्रेष्ठ विश्वविद्यालय हैं वो ऐसा नहीं करते रहे हैं, स्वयं आप ऐसा नहीं करते हैं और भारत में भी ऐसे इंस्टीट्यूशंस हैं, जो दूसरी पद्धति अपनाते हैं. तो इस संबंध में कुछ हमें बतलाएं कि फैकल्टी का सेलेक्शन क्यों बहुत ही महत्वपूर्ण या क्रूशियल है एक शिक्षा संस्थान के लिए.
प्रोफेसर पंकज चंद्र
मुझे लगता है कि फैकल्टी तो किसी इंस्टीट्यूशन की आत्मा है. और अगर देखें तो फैकल्टी से क्या निकलता है? फैकल्टी से करिकुलम निकलता है, स्टूडेंट का इंगेजमेंट निकलता है, फैकल्टी स्टूडेंट्स को इंस्पायर करती है, फैकल्टी से क्लासरूम लर्निंग होती है, फैकल्टी से रिसर्च होती है, फैकल्टी से ही एक्सेलेंस बनती है. आप देखें देश में भी और विदेश में भी कि जहाँ अच्छी फैकल्टी हैं, अच्छे लोग उसी तरफ ज्यादा आकर्षित होते हैं क्योंकि हम अच्छे माहौल में अच्छी फैकल्टी के साथ काम करना चाहते हैं. तो मुझे लगता है कि फैकल्टी का चयन एक इंस्टीट्यूशन के लिए सबसे अहम फैसला होता है. अब कैसे हम करते हैं? मुझे लगता है कि एक बार फिर मैं यह कहूँगा कि कहीं न कहीं आखिरी पिछले सौ-पौने दो सौ साल में हमने अपनी फैकल्टी पर विश्वास करना बंद कर दिया. मुझे मालूम नहीं है कि कब हुआ. तो कैसे सेलेक्शन होता है. चाहे वीसी का सेलेक्शन हो, चाहे उस पर भी बात करेंगे, चाहे फैकल्टी का सेलेक्शन हो, हम बाहर से लोगों को लेकर आते हैं. हमारा अपनी फैकल्टी पर कुछ भी ट्रस्ट नहीं है. हमें लगता है कि वह कुछ गलत ही करेगा. एक तरफ तो हम उसी फैकल्टी को हजारों बच्चों की लाइफ बनाने का दायित्व दे रहे हैं, उसको इंगेज करने की इजाजत दे रहे हैं, उसी को हम न तो करिकुलम बनाने की जिम्मेदारी दे रहे हैं, न उसको हम इम्तिहान जज करने की जिम्मेदारी दे रहे हैं, न उसको दूसरी फैकल्टी सेलेक्ट करने की इजाजत दे रहे हैं. तो मुझे लगता है कि बड़ी विरोधाभासी स्थिति है. हमें लगता है कि यह बहुत अहम परिप्रेक्ष्य है जिसे देखना चाहिए. और देशों में बिल्कुल नहीं मिलेगा. जो डिपार्टमेंट की फैकल्टी है, वही चुनाव करेगी कि कौन नया फैकल्टी आ रहा है? आप कह सकते हैं कि वह तो गलत डिसिशन ले लेंगे, अपने दोस्तों के बच्चों को ले लेंगे. मगर किसी जगह इसमें कुछ करेक्टिव मेकेनिज्म तो हो गई है और करेक्टिव मेकेनिज्म है कि आप अगर खराब लोगों को लेते जाएंगे तो आपका जो स्तर है, वह गिरता चला जाएगा. अच्छे इंस्टीट्यूशंस तो यही चाहेंगे कि इस ग्रुप के साथ सही आदमी काम कर सकें, उस फिलॉसफी को आगे बढ़ा सकें, अपना उसमें कुछ पर्सपेक्टिव डाल सकें. तो पहली चीज मुझे लगती है कि कहीं न कहीं इंस्टीट्यूशंस में भरोसा करने की जरूरत है. सोसाइटी का, गवर्नमेंट का कि ये जो लोग इंस्टीट्यूशन में बैठे हैं, ये उसका वेलफेयर ही चाहते हैं. कोई भी अपने इंस्टीट्यूशन को डुबोना नहीं चाहता क्योंकि उसमें उसकी भी प्रेस्टीज उसमें जुड़ी है. तो हर जगह जहाँ पर भी हमने अच्छे इंस्टीट्यूशन देखे हैं.
इंडिया में अब कई अच्छे इंस्टीट्यूशंस हैं. आप इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस को ले लीजिए. कई पुराने आईआईएम को ले लीजिए, जो नई यूनिवर्सिटीज़ बनी हैं, उनको ले लीजिए. इन सब जगह जो सबसे ज्यादा समय बिताते हैं वो है फैकल्टी सेलेक्शन. और हर इंडीविजुअल को उतना समय देते हैं कि वो हमें समझ सकें कि हम किस किस्म की यूनिवर्सिटी बनाने की कोशिश कर रहे हैं और हम समझ सकें कि इस फैकल्टी की हम क्या मदद कर सकते हैं in the long run to become excellent, to become top researcher, to become top teacher. हर इंस्टीट्यूशन की कुछ मजबूती है, कुछ कमजोरियां होती हैं. तो यह बड़ा, कई दिनों का प्रॉसेस है. अब आप नॉर्मल सेलेक्शन कमेटी में देख लीजिए. लोग जाते हैं. एक तो यह कि किसी वजह से हो, चाहे लॉ का डर हो कि अगर न्यूनतम योग्यता किसी के पास है, हम उसको इंटरव्यू में नहीं बुलाते हैं तो कोर्ट में केस हो जाएगा, इसलिए हमें सबको बुलाना चाहिए. तो एक पोजिशन के लिए बड़ी तादाद में लोग पहुँचते हैं. नतीजा यह कि उनको 10-15-20-30 मिनट से ज्यादा कोई भी सेलेक्शन कमेटी नहीं दे पाती. मैं तो किसी सेलेक्शन कमेटी में एक्सटर्नल एक्स्पर्ट के बहुत खिलाफ़ हूँ क्योंकि एक्सटर्नल एक्स्पर्ट जो किसी और इंस्टीट्यूशन से आता है, वह उस इंस्टीट्यूशन का न तो कल्चर समझता है, न उसके डिपार्टमेंट की नीति समझता है कि किस वजह से यह फैकल्टी ली जा रही है, किन पर्सपेक्टिव या कल्चरल वैल्यूज का मिलन होना चाहिए, जिसकी वजह से वह फैकल्टी सबसे अच्छी बने. सो वह एक स्टैंडर्ड प्रॉसेस है.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
नमस्कार मैं अपूर्वानंद. कड़वी कॉफी की इस नई कड़ी के साथ आपके सामने फिर हाजिर हूँ. जैसा आपको मालूम है, कड़वी कॉफी अलग-अलग विषयों पर लंबी बातचीत का एक लगातार चलने वाला सिलसिला है. हम कोशिश करते हैं कि जिन विषयों पर अभी समाज में चर्चा हो रही है या हम सोच रहे हैं, उन पर ठहरकर बात कर सकें और उन मित्रों से कर सकें जो लंबे वक्त से इस पर काम करते रहे हैं. इरादा यह नहीं है कि हम सिर्फ अपना विचार व्यक्त कर दें. इरादा यह है कि उस विषय को समझा जा सके और इसीलिए इत्मिनान से बातचीत का एक सिलसिला कड़वी कॉफी के जरिए हमने शुरू किया है. आपने पिछली कड़ियां देखी होंगी, सुनी होंगी और पढ़ी होंगी क्योंकि हम इसे वीडियो के रूप में और पॉडकास्ट के साथ-साथ उसका टेक्स्ट आपको मुहैया कराते हैं. हमें इंतजार रहेगा कि आपको यह बातचीत कैसी लग रही है और उसमें हम आगे और कैसे सुधार कर सकते हैं.
आज हमारे साथ एक बहुत खास मित्र हैं प्रोफेसर पंकज चंद्र जो अभी अहमदाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति हैं और इसके पहले वे इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, बैंगलोर के निदेशक रह चुके हैं. प्रोफेसर पंकज चंद्र वैसे कुलपति या निदेशकों में नहीं हैं जिनके जीवन का ध्येय कुलपति होने या निदेशक होने में शेष हो जाता है, बल्कि विश्वविद्यालय या उच्चशिक्षा संस्थान उनकी चिंता के केंद्र में रहे हैं. 2017 में प्रोफेसर पंकज चंद्र की एक किताब प्रकाशित हुई थी Building Universities that Matter: Where are Indian Institutions Going Wrong?
इस किताब को उच्चशिक्षा के क्षेत्र में काम करने वालों ने बहुत रुचि लेकर पढ़ा था क्योंकि यह किताब जो सवाल पूछ रही थी वो पूछे जाने चाहिए कि आखिर विश्वविद्यालय बनते कैसे हैं और हम जो शिकायत करते रहते हैं कि भारत के विश्वविद्यालयों का पतन हो रहा है, उनमें 1000 तरह की गड़बड़ियां हैं, तो वो क्यों हो रही हैं? इस किताब में प्रोफेसर पंकज चंद्र ने उन विषयों पर विचार किया था. आज हम उच्चशिक्षा पर और विश्वविद्यालयों से जुड़े मसलों पर एक दूसरे से बातचीत करेंगे, समझने की कोशिश करेंगे कि हम जो विद्या, ज्ञान आदि की चर्चा बहुत करते रहते हैं और हम जो बहुत ही दंभपूर्वक यह कहते हैं कि बस हम विश्वगुरु होने वाले हैं. प्रोफेसर पंकज चंद्र क्योंकि आपने पढ़ाई दूसरे देशों में की है और दूसरे देशों में अध्यापन भी किया है. क्या आपको किसी एक ऐसे देश की याद है, जो यह दावा करता है कि वह विश्व गुरु होना चाहता है?
प्रोफेसर पंकज चंद्र
शुक्रिया अपूर्वानंद जी. मुझे तो अभी तक समझ में नहीं आया कि विश्व गुरु होने का मतलब क्या है? लेकिन हमें लगता है कि बात शायद यह है कि क्या हम एजुकेशन से या एजुकेशनल रिसर्च से विश्व में आगे बढ़ सकते हैं? अगर इस विचार से हम एजुकेशन को देखें तो यह ऑब्जेक्टिव बुरा नहीं है. ऑब्जेक्टिव तो हमेशा से एजुकेशन का यही रहा है कि किस तरह से हम अपने विचार आगे रखें, किस तरह से नई पीढ़ी को आगे बढ़ाएं. मेरे ख्याल से कोई भी देश ऐसा नहीं है जो अपने को कहता है कि मैं विश्वगुरु हूँ या सबसे आगे हूँ, या सबसे पीछे हूँ. सभी लोग जानते हैं कि एजुकेशन तो बड़ा एक कॉम्प्लिमेंटरी ज़ोन है कि 10 लोग उसमें साथ आते हैं. आज के समय में तो सबसे बड़ा इंडिकेटर यह है कि सबसे अच्छे शोध वहीं हो रहे हैं जहाँ पर कई देशों के लोग साथ आ रहे हैं. तो मुझे लगता है कि उस चर्चा में तो हम-आप नहीं घुसेंगे.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
मैं दरअसल इसी विषय पर सोच रहा था जिसे ज्ञान-विज्ञान कहते हैं, राष्ट्रीय सीमाओं में बँधा हुआ नहीं होता है. इसलिए जब हम यह कहते हैं कि यह यूरोप का ज्ञान है, तो यह एक तरह से सही है, लेकिन पूरी तरह से सही नहीं है क्योंकि यूरोप में भी अगर कोई ज्ञान पैदा हुआ है, भौगोलिक रूप से अगर किसी व्यक्ति ने यूरोप या अमेरिका या अफ़्रीका में पहली बार कहीं विचार व्यक्त किया है, तो वह सिर्फ वहाँ का नहीं होता. उसमें पूरी दुनिया का योगदान होता है. तो एक तो ज्ञान किसी राष्ट्रीय सीमा में बँधा हुआ नहीं होता और जैसा आपने कहा कि अभी दुनिया में वही विश्वविद्यालय या शोध संस्थान बहुत अच्छा काम कर रहे हैं, जिनमें अलग-अलग देशों के मस्तिष्क साथ मिलकर उस समस्या से जूझ रहे हैं, जिस समस्या को सुलझाना चाहते हैं या जिसका समाधान करना चाहते हैं. वह सिद्धांत का निरुपण हो, किसी दवा की खोज हो या कोई और चीज़ हो. इसमें अलग-अलग मुल्कों के लोग आते हैं और इसलिए आपका जो अपना अनुभव रहा है उसमें एक ऐसा कैंपस या परिसर जिसमें अलग-अलग देशों के छात्र और अलग-अलग देशों के अध्यापक साथ हों, उसके बेहतर होने की उम्मीद ज्यादा है, बजाय उसके जो बिल्कुल एक तरह के लोग यहाँ पर हों. इसके बारे में आप क्या कहेंगे?
प्रोफेसर पंकज चंद्र
बिल्कुल सही कहा आपने. अब आप सोचिए, साइंस कोई लोकल साइंस तो होती नहीं है या ह्यूमेनिटीज़ कोई लोकल तो होती नहीं है. कॉन्टेक्स्ट लोकल होता है. अब हिंदुस्तान में मुझे लगता है कि जो सबसे दिलचस्प समय माना जाता है, वह मेरे ख्याल से शुरुआती 20वीं सदी का था. जब बहुत सारे वैज्ञानिक जेसी बोस, एसएन बोस, मेघनाथ साहा थे. ये कोई इंडियन साइंस नहीं कर रहे थे. वो इंडियन थिंकिंग, इंडियन नॉलेज को ग्लोबल नॉलेज के साथ जोड़ रहे थे. दूसरा वो ग्लोबल स्तर पर एक्सेलेंस अचीव करना चाहते थे. जेसी बोस ने रेडियो वेव वगैरह की खोज की, जिस समय मार्कोनी कर रहे थे और कहते हैं वह तो उनसे आगे भी थे. उन्होंने ही पहले टेलीफोनी के बारे में बात की तो आपकी बिलकुल बात सही है. मुझे लगता है कि पढ़ने-लिखने-सोचने का, शोध करने का माहौल जितना डायवर्स होगा, उतना ही अलग-अलग विचार आ सकेंगे जो किसी एडवांसमेंट ऑफ नॉलेज के लिए बहुत जरूरी है. हम जब बीएचयू गए पढ़ने तो वहाँ तो पहली बार पूरे देश से बच्चे आ रहे हैं. उससे क्या होता है. वह सबको मौका देती है. सबको सबके विचार, सबके एक्सपिरियंस अलग हैं, सो यह डायवर्सिटी तो बहुत ही क्रिटिकल एलिमेंट है और आप दुनिया की कोई भी अच्छी यूनिवर्सिटी देख लीजिए. उसकी खूबसूरती है कि अच्छे-अच्छे लोग पूरे दुनिया भर से आ रहे हैं, चाहे पढ़ने के लिए, चाहे पढ़ाने के लिए. चाहे रिसर्च लैब में 15 और भाषाएं बोली जा रही हैं. उनके अपने कॉन्टेक्स्चुअल आइडियाज आ रहे हैं. तो यह डायवर्स व्यूज, डायवर्स बैकग्राउंड, डायवर्स पर्सपेक्टिव का इंस्टीट्यूशनल ग्रोथ के लिए होना बहुत ही ज्यादा जरूरी है.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
अभी आपने एक शब्द का इस्तेमाल किया एक्सेलेंस या उसे हम उत्कृष्टता कहें या श्रेष्ठता कहें. हम लोग जो पिछले कई वर्षों से एक दूसरे से विश्वविद्यालयों, उच्चशिक्षा संस्थानों के बारे में बातचीत करते रहे हैं. हम बाकी लोगों के साथ एक दूसरे से सहमत होते रहे हैं कि विश्वविद्यालय का एक मकसद दरअसल एक्सेलेंस हासिल करना, समाज को बतलाना है कि एक्सेलेंस क्या होता है? कामचलाऊपन की संस्कृति नहीं होनी चाहिए बल्कि एक्सेलेंस की संस्कृति होनी चाहिए. तो अक्सर लोग विश्वविद्यालय के बारे में बात करते समय इस पक्ष पर बात नहीं करते कि विश्वविद्यालय का एक मकसद उत्कृष्टता या श्रेष्ठता की प्राप्ति है. इसलिए अगर उसका एक मकसद श्रेष्ठता की प्राप्ति है, श्रेष्ठता के विचार को स्थापित करना है तो वह ऐसा किन उपायों से कर सकता है. आपको यह मौका मिला. एक तो आप एक संस्थान के निदेशक हुए जो बहुत पहले से चला आ रहा था, जिसका लंबा इतिहास था और हम निजी तजुर्बे के बारे में भी जानना चाहेंगे. दूसरा विश्वविद्यालय जो अपेक्षाकृत नया था और जिसे अपनी तरह से गढ़ने विकसित करने की छूट आपको थी. तो मैं इस इस बात पर अभी टिका हुआ हूँ कि अगर श्रेष्ठता का उद्देश्य है और आपने कुलपति या निदेशक के रूप में इसे मकसद रखा है, तो आपने अपने संस्थान में कौन सी प्रक्रियाएं शुरू कीं, जिनसे आपने इसको हासिल करना चाहा?
प्रोफेसर पंकज चंद्र
एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस में एक जरा चैलेंज हो गया है कि हर इंस्टीट्यूशन जल्दीबाजी में अपने ग्रोथ के कामों में लग गया है, जबकि एजुकेशन और एक्स्लेंस थोड़ा स्लो कुकिंग वाली प्रणाली है. उसमें आपको सोच-विचार करके, धीरे से कदम लेकर, धीरे से लोगों को एक साथ जोड़कर, उनके विचारों को सामने रखकर आगे बढ़ना पड़ेगा. तब जाकर मुझे लगता है कि उसमें से खूबसूरती से अच्छी चीजें निकलकर आएंगी. हम 3-4 इंस्टीट्यूशंस के साथ हिंदुस्तान में जुड़े. एक तो चीज है कि कहीं न कहीं एक्सेलेंस में गवर्नेंस का हाथ बहुत बड़ा है. ये जितने भी स्टेकहोल्डर्स हैं, उनको पहले तो यकीन करना चाहिए कि हम एक्सेलेंस से लाइवलीहुड ले सकते हैं, एक्सेलेंस से बेहतर सिटिजंस बना सकते हैं, एक्सेलेंस से ही हम लव फॉर लर्निंग बना सकते हैं, जो मेरे खयाल से एजुकेशन के उद्देश्य रहे हैं. हमारे दिमाग में तो हैं. अगर हम उस गवर्नेंस सिस्टम को इस तरह से बना सकें. स्टेकहोल्डर्स कौन हैं? स्टूडेंट हैं, फैकल्टी हैं, एक्सटर्नल स्टेकहोल्डर्स हैं जो पैरेंट्स हैं और लार्जर सोसाइटी है, एक एम्प्लॉयर है. अगर इस ढंग से सोचें तो कहीं न कहीं जो समाज और पेरेंट्स को समझाने का भी इंस्टीट्यूशन का दायित्व रहता है कि क्यों एक्सेलेंस की जरूरत है और किस किस्म से पढ़ाई या किस किस्म से हमारे छात्रों का पर्सपेक्टिव बनाएंगे, क्यों बनाया जाएगा. तो एक तो कम्यूनिकेशन वाली बात है. दूसरी बात यह है कि हम किस तरह अपनी फैकल्टी का सेलेक्शन करते हैं, क्या देखते हैं उसमें? किस तरह से हम स्टूडेंट्स को लेकर आते हैं?
हमारे यहाँ इंडिया में कई लोग कहते हैं कि सेलेक्शन नहीं होता, एलिमिनेशन होता है इंस्टीट्यूशंस में क्योंकि नंबर्स बहुत ज्यादा हैं. तो यह भी सोचने की बात है कि अगर हम इस पर्स्पेक्टिव से स्टूडेंट्स को यूनिवर्सिटी में लाने की कोशिश कर रहे हैं तो उसके एक्सेसलेंस पर क्या नतीजे होंगे? अगर हम बच्चे को एक कैंडिडेट की तरह देखते हैं कि उसमें क्या खूबी है, वह क्या करना चाहता है, हम इंस्टीट्यूशन के बतौर आगे बढ़ने में उसकी कैसे मदद कर सकते हैं या नहीं कर सकते तो मुझे लगता है कि उस पर्सपेक्टिव से अगर हम एडमिशन या और चीजें देखें या जो एजुकेशनल एनवायर्नमेंट क्रिएट करते हैं, उसको अलग ढंग से करेंगे. क्योंकि हम कुछ सौ या डेढ़ हजार या दस हजार बच्चों को एक समूह की तरह नहीं देख रहे हैं, हम सबको व्यक्ति की तरह देख रहे हैं. उनकी एजुकेशन को कस्टमाइज करने की कोशिश कर रहे हैं. सो मुझे लगता है कि यह एक दूसरी बात है जो हम कहीं न कहीं अगर ध्यान रखेंगे तो शायद एक्सेलेंस के ऑब्जेक्टिव या गोल की तरफ बढ़ सकते हैं. तीसरी बात...
प्रोफेसर अपूर्वानंद
नहीं, आप अपनी बात जारी रखें. आपने छात्रों के दाखिले की बात की कि हम दाखिले से ज्यादा एलिमिनेट करते हैं, उनकी संख्या बहुत ज्यादा है. लेकिन दुनिया में कुछ देशों में यह विचार है और हमारे देश में काफी प्रबल होता जा रहा है. आपने शुरू में डायवर्सिटी की बात की थी. अगर हम उसको भी ध्यान में रख लें कि सारे विश्वविद्यालयों को एक यूनिफॉर्म प्रॉसेस, मेकेनिज्म के जरिए छात्रों को दाखिल करना चाहिए. भारत में उसे लेकर प्रयोग शुरू हुआ है. अगर मुझे ठीक याद है तो चीन दूसरा देश है जो यह काम करता है. लेकिन जिन्हें हम अमेरिका के श्रेष्ठ विश्वविद्यालय कहते हैं, जहाँ जाने के लिए हमारे लोग बहुत उत्सुक रहते हैं. तो यह जो एक यूनिफॉर्म या एक कंबाइंड जरिया है, जिससे सारे विश्वविद्यालयों में दाखिले की प्रक्रिया तय हो जाएगी. जो चीन में भी है और जिसको लोग मानते हैं कि ठीक है. इसमें और दूसरी चीज जो आपने कही कि छात्रों का दाखिला एक बहुत महत्वपूर्ण चीज है जिसमें विश्वविद्यालय का हाथ रहना चाहिए. तो उसे आप हमें कुछ समझाएंगे क्या?
प्रोफेसर पंकज चंद्र
मुझे लगता है कि यह जो यूनिफॉर्म स्टैंडर्डाइज्ड सेंट्रलाइज्ड एडमिशन प्रॉसेस की थिंकिंग है, यह एक कंट्रोल मेकेनिज्म है. एक एंटिटी है, एक स्टेट है जो विश्वविद्यालयों को, कॉलेजों को कंट्रोल करने की कोशिश है और उनको वह कह रहा है कि आप सब कुछ अपने आप नहीं कर सकते. Education is based on faith and trust. एक सेंट्रल बॉडी कह रही है कि आप भरोसे के लायक नहीं हैं. कोई हार्वर्ड को तो बोलता नहीं है कि आप भरोसे के लायक नहीं हैं लेकिन वह तो एडमिशन देता है. बच्चे का हार्वर्ड में एडमिशन हो सकता है, हो सकता है कि स्टैनफर्ड में एडमिशन न भी हो. तो अब मुझे तो लगता है सबसे बड़ी बात यहीं पर आती है कि हम अपने इंस्टीट्यूशंस पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं. उनका जो फंडामेंटल टास्क है कि बच्चों को देखें और कहें कि हम किस तरह से आपको अपने इंस्टीट्यूशन में लेकर आएंगे. उसके बहुत से इंप्लिकेशन ये हैं कि हम फिर सात-आठ साल से जैसे कि इंजीनियरिंग एडमिशन में होते ही आए हैं, वो केवल उस एग्जाम की तैयारी करते हैं और स्कूल में बिल्कुल ध्यान नहीं देते हैं.
लर्निंग और एजुकेशन तो बहुत सोशियोलॉजिकल प्रॉसेस हैं. तो जो बच्चा स्कूल खत्म करके यूनिवर्सिटी आ रहा है वह कहीं न कहीं एग्ज़ाम पास करने की मशीन बनकर आ रहा है. मेरे ख्याल से उसमें लर्निंग सीकिंग इंडीविजुअल की क्षमता थोड़ी सी कम हो जाती है. मुझे लगता है कि हमारे यहाँ एजुकेशन पॉलिसी बनाने वालों में शायद एक और रियलाइजेशन न हो कि हर इंस्टीट्यूशन उसके लोगों से बनता है. वहाँ की फैकल्टी, वहाँ का एडमिनिस्ट्रेशन, वहाँ का स्टाफ. हर इंस्टीट्यूशन दूसरे से अलग है. उसकी स्ट्रेंथ्स अलग है, उसका एरिया ऑफ फोकस अलग है, उसका कल्चर अलग है. आप हमारे अच्छे माने जाने वाले इंस्टीट्यूशंस आईआईटी या आईआईएम को ही देख लें. हर इंस्टीट्यूशन अलग है. तो क्या बच्चा हर इंस्टीट्यूशनल कल्चर में क्या अच्छी तरह से परफॉर्म करेगा. यह भी तो सवाल उठता है. उसको हमें उस कल्चर में ले जाना चाहिए जहाँ पर वह कॉन्टेक्श्चुअली बहुत ही अच्छा परफॉर्म करे, जहाँ पर वह अपने को उठा सके. उसके लिए इंस्टीट्यूशन को यह ऑटोनॉमी तो होनी ही चाहिए कि वह कैसे स्टूडेंट्स को सेलेक्ट करें. एक डर लोगों का रहता है कि ये इंस्टीट्यूशंस जो हैं, ये ठीक ढंग से नहीं करेंगे. तो जो इंस्टीट्यूशन ठीक ढंग से नहीं करेंगे, तो वो बैठ भी जाते हैं. वहाँ अच्छे बच्चे जाते भी नहीं हैं. तो यह तो बहुत ही बड़ा मुद्दा है. हमारे यहाँ अभी तक इस तरह था नहीं. इंस्टीट्यूशन अपने आप चुनते थे. अब जेएनयू के ही उदाहरण ले लीजिए. अब पता नहीं अभी एडमिशन कैसे होता है लेकिन आज से 30 साल पहले जब एडमिशन होता था तो बड़ा ही सोच-विचार करके, बड़ा इंटेरेस्टिंग ढंग से एडमिशन प्रॉसेस होता था. जो कॉन्टेक्श्चुअली लर्निंग को भी लेकर आता है और एक्सेलेंस है उसके परफॉर्मेंस को भी देखता है. वह सब देखकर वो स्टूडेंट मिक्स बनाते थे. जो स्टूडेंट का जो फॉर्मेशन है वह एजुकेशन के लिए बहुत क्रिटिकल है कि किस ढंग से हम उसे ड्राइवर्स बनाएं, किस ढंग से ऐसे बच्चे लेकर आएं जिनकी अलग-अलग स्किल्स हैं, जो जब साथ में बैठेंगे तो सबका ही औसत ऊपर उठेगा. उसी से नए आइडियाज़ नए एक्सपीरियंस बनते हैं. और हम अब एक सेंट्रलाइज्ड सिस्टम की तरफ जा रहे हैं जिसके बहुत सारे परिणाम हैं. वह इंस्टीट्यूशन को अलग ढंग से बना रहा है और आगे भी बनाएगा.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
हाँ, अभी चूँकि पहला-दूसरा ही साल है, तो जैसा आपने कहा कि अकादमिक दुनिया में हम बहुत जल्दी निष्कर्षों पर नहीं पहुँचते और जब तक हमारे पास पर्याप्त सूचनाएं न हों, आंकड़े न हों, हम उसका अध्ययन नहीं कर पाते कि इसके पहले क्या स्थिति थी और इसने कैसे प्रभाव डाला है. तो हो सकता है कि अभी हम तुरंत इस पर टिप्पणी न कर सकें लेकिन सैद्धांतिक रूप से जो आपने बात कही वो सही है कि अगर हम श्रेष्ठता की बात कर रहे हैं जिसमें मेरी और आपकी सहमति है और बाकी लोगों की भी होगी. और यहाँ हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि जब हम श्रेष्ठता की बात कर रहे हैं तो वह समानता के सिद्धांत के विरुद्ध नहीं है. यानी समानता के सिद्धांत की कीमत पर श्रेष्ठता नहीं हासिल की जा सकती. इस पर आगे भी हम लोग बात कर सकते हैं. अगर श्रेष्ठता हमारा लक्ष्य है और हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की श्रेणी में शामिल होना चाहते हैं, तो वहाँ की छात्रों के दाखिले की प्रक्रियाओं को देखना बहुत आवश्यक है. आपने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का हवाला दिया है. ऐसे और शिक्षा संस्थान भारतवर्ष में हैं, जिन्होंने बहुत ही क्रिएटिव तरीके से अपनी एडमिशन प्रॉसेस बनाईं और छात्रों को शामिल किया. उनका इतिहास यह साबित करता है कि उनका यह निर्णय सही था. उनके लिए यह बहुत बड़ी ट्रेजेडी होगी कि उन्होंने जो एक विलक्षण चीज विकसित की थी, उसको हटाकर एक स्टैंडर्डाइज्ड और यूनिफाइड सिस्टम में उनको लाया जाए.
आपने एक दूसरी बात कही जो मुझे बहुत मार्के की लगी और वह यह थी कि जब अलग-अलग किस्म के छात्र मिलते हैं, तो औसत स्तर ऊपर उठ जाता है. अगर हम श्रेष्ठता की बात करें और इस औसतपन की बात करें तो सारे संस्थानों का और खासकर शिक्षा संस्थानों का एक मकसद यह भी होता है कि जो समाज का औसत है, उसे ऊपर ले जाएं. तो यह एक मकसद है इस औसत को ऊपर ले जाना, न कि जो औसत ऊपर है, उसको औसत पर ला देना कि आप बहुत डींग हांक रहे थे तो हम आपको खींचकर नीचे ले आएँगे. यह मकसद नहीं होता. मतलब मकसद है औसत को ऊपर ले जाएं. अगर मैं आपकी बात को ठीक से समझ पाया. दूसरा एलिमेंट वह है जिसका जिक्र आपने किया, फैकल्टी या अध्यापक. एक कुलपति के रूप में जैसा आपसे तो हमारी चर्चा होती रही है और आपकी जद्दोजहद रही है कि आप कैसे अच्छी फैकल्टी अपनी यूनिवर्सिटी में लाएं. एक कुलपति के रूप में यह काफी संतोष की बात होती है कि आप अच्छा फैकल्टी मेंबर ला पाए. तो यह जो प्रक्रिया है अध्यापकों को लाने की, बहाल करने की, इस प्रक्रिया में भी भारत के विश्वविद्यालय स्वतंत्र नहीं हैं. उनको एक केंद्रीय निर्देश दिया जाता है, यह बतलाया जाता है कि यह क्वालिफिकेशन होगी, इसके आधार पर आपकी प्रक्रिया होगी. इस प्रक्रिया से आप अध्यापकों का चयन करेंगे. लेकिन जो श्रेष्ठ विश्वविद्यालय हैं वो ऐसा नहीं करते रहे हैं, स्वयं आप ऐसा नहीं करते हैं और भारत में भी ऐसे इंस्टीट्यूशंस हैं, जो दूसरी पद्धति अपनाते हैं. तो इस संबंध में कुछ हमें बतलाएं कि फैकल्टी का सेलेक्शन क्यों बहुत ही महत्वपूर्ण या क्रूशियल है एक शिक्षा संस्थान के लिए.
प्रोफेसर पंकज चंद्र
मुझे लगता है कि फैकल्टी तो किसी इंस्टीट्यूशन की आत्मा है. और अगर देखें तो फैकल्टी से क्या निकलता है? फैकल्टी से करिकुलम निकलता है, स्टूडेंट का इंगेजमेंट निकलता है, फैकल्टी स्टूडेंट्स को इंस्पायर करती है, फैकल्टी से क्लासरूम लर्निंग होती है, फैकल्टी से रिसर्च होती है, फैकल्टी से ही एक्सेलेंस बनती है. आप देखें देश में भी और विदेश में भी कि जहाँ अच्छी फैकल्टी हैं, अच्छे लोग उसी तरफ ज्यादा आकर्षित होते हैं क्योंकि हम अच्छे माहौल में अच्छी फैकल्टी के साथ काम करना चाहते हैं. तो मुझे लगता है कि फैकल्टी का चयन एक इंस्टीट्यूशन के लिए सबसे अहम फैसला होता है. अब कैसे हम करते हैं? मुझे लगता है कि एक बार फिर मैं यह कहूँगा कि कहीं न कहीं आखिरी पिछले सौ-पौने दो सौ साल में हमने अपनी फैकल्टी पर विश्वास करना बंद कर दिया. मुझे मालूम नहीं है कि कब हुआ. तो कैसे सेलेक्शन होता है. चाहे वीसी का सेलेक्शन हो, चाहे उस पर भी बात करेंगे, चाहे फैकल्टी का सेलेक्शन हो, हम बाहर से लोगों को लेकर आते हैं. हमारा अपनी फैकल्टी पर कुछ भी ट्रस्ट नहीं है. हमें लगता है कि वह कुछ गलत ही करेगा. एक तरफ तो हम उसी फैकल्टी को हजारों बच्चों की लाइफ बनाने का दायित्व दे रहे हैं, उसको इंगेज करने की इजाजत दे रहे हैं, उसी को हम न तो करिकुलम बनाने की जिम्मेदारी दे रहे हैं, न उसको हम इम्तिहान जज करने की जिम्मेदारी दे रहे हैं, न उसको दूसरी फैकल्टी सेलेक्ट करने की इजाजत दे रहे हैं. तो मुझे लगता है कि बड़ी विरोधाभासी स्थिति है. हमें लगता है कि यह बहुत अहम परिप्रेक्ष्य है जिसे देखना चाहिए. और देशों में बिल्कुल नहीं मिलेगा. जो डिपार्टमेंट की फैकल्टी है, वही चुनाव करेगी कि कौन नया फैकल्टी आ रहा है? आप कह सकते हैं कि वह तो गलत डिसिशन ले लेंगे, अपने दोस्तों के बच्चों को ले लेंगे. मगर किसी जगह इसमें कुछ करेक्टिव मेकेनिज्म तो हो गई है और करेक्टिव मेकेनिज्म है कि आप अगर खराब लोगों को लेते जाएंगे तो आपका जो स्तर है, वह गिरता चला जाएगा. अच्छे इंस्टीट्यूशंस तो यही चाहेंगे कि इस ग्रुप के साथ सही आदमी काम कर सकें, उस फिलॉसफी को आगे बढ़ा सकें, अपना उसमें कुछ पर्सपेक्टिव डाल सकें. तो पहली चीज मुझे लगती है कि कहीं न कहीं इंस्टीट्यूशंस में भरोसा करने की जरूरत है. सोसाइटी का, गवर्नमेंट का कि ये जो लोग इंस्टीट्यूशन में बैठे हैं, ये उसका वेलफेयर ही चाहते हैं. कोई भी अपने इंस्टीट्यूशन को डुबोना नहीं चाहता क्योंकि उसमें उसकी भी प्रेस्टीज उसमें जुड़ी है. तो हर जगह जहाँ पर भी हमने अच्छे इंस्टीट्यूशन देखे हैं.
इंडिया में अब कई अच्छे इंस्टीट्यूशंस हैं. आप इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस को ले लीजिए. कई पुराने आईआईएम को ले लीजिए, जो नई यूनिवर्सिटीज़ बनी हैं, उनको ले लीजिए. इन सब जगह जो सबसे ज्यादा समय बिताते हैं वो है फैकल्टी सेलेक्शन. और हर इंडीविजुअल को उतना समय देते हैं कि वो हमें समझ सकें कि हम किस किस्म की यूनिवर्सिटी बनाने की कोशिश कर रहे हैं और हम समझ सकें कि इस फैकल्टी की हम क्या मदद कर सकते हैं in the long run to become excellent, to become top researcher, to become top teacher. हर इंस्टीट्यूशन की कुछ मजबूती है, कुछ कमजोरियां होती हैं. तो यह बड़ा, कई दिनों का प्रॉसेस है. अब आप नॉर्मल सेलेक्शन कमेटी में देख लीजिए. लोग जाते हैं. एक तो यह कि किसी वजह से हो, चाहे लॉ का डर हो कि अगर न्यूनतम योग्यता किसी के पास है, हम उसको इंटरव्यू में नहीं बुलाते हैं तो कोर्ट में केस हो जाएगा, इसलिए हमें सबको बुलाना चाहिए. तो एक पोजिशन के लिए बड़ी तादाद में लोग पहुँचते हैं. नतीजा यह कि उनको 10-15-20-30 मिनट से ज्यादा कोई भी सेलेक्शन कमेटी नहीं दे पाती. मैं तो किसी सेलेक्शन कमेटी में एक्सटर्नल एक्स्पर्ट के बहुत खिलाफ़ हूँ क्योंकि एक्सटर्नल एक्स्पर्ट जो किसी और इंस्टीट्यूशन से आता है, वह उस इंस्टीट्यूशन का न तो कल्चर समझता है, न उसके डिपार्टमेंट की नीति समझता है कि किस वजह से यह फैकल्टी ली जा रही है, किन पर्सपेक्टिव या कल्चरल वैल्यूज का मिलन होना चाहिए, जिसकी वजह से वह फैकल्टी सबसे अच्छी बने. सो वह एक स्टैंडर्ड प्रॉसेस है.
एक और चीज भी है कि जैसे हम आजकल कॉलेजों, यूनिवर्सिटीज में सेलेक्शन करते हैं कि जब डिपार्टमेंट के फैकल्टी शामिल नहीं रहते, तो उनकी नई फैकल्टी को मदद करने की कोई जिम्मेदारी नहीं होती कि वह एकेडमिक लाइफ में कामयाब हो. किसी और ने आपको सेलेक्ट किया है, आप तो हमारे पास आ गए हैं लेकिन जब हम मिलकर अपने डिपार्टमेंट में डिस्कस करके सौ डेढ़ सौ लोगों की एप्लिकेशन में 10 लोगों को ओपनली शॉर्टलिस्ट करते हैं तो हम यह भी कहते हैं कि अगर इनमें से कोई अच्छा आएगा तो यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इसकी मदद करें, हम इसको डिपार्टमेंट में इंटिग्रेट करें, हम इनके साथ रिसर्च करें, हम इनके साथ कोर्स पढ़ाएं, हम इनको उस ऑब्जेक्टिव या गोल की तरफ ले जाएं जिससे वह एक्सेलेंट एकेडमिक बन सकें. जैसे कहते हैं कि the success of an individual has a whole village behind. Same, the success of an academic has an entire department and a whole university behind. अब वो हम नहीं करते. वह बहुत बड़ा कारण है कि हमारे डिपार्टमेंट्स और हमारी यूनिवर्सिटीज बहुत फ्रैग्मेंटेड हैं. कोई किसी के साथ पर्सनल रिलेशनशिप अगर है तो है, लेकिन एकेडमिक रिलेशनशिप्स बहुत कम हैं. हम बाहर वालों के साथ ज्यादा काम करते हैं लेकिन अपने कुलीग्स के साथ बहुत नहीं करते. साथ में पढ़ाते नहीं हैं, साथ में रिसर्च नहीं करते, साथ में ग्रांट नहीं लिखते. अब आप बाहर की यूनिवर्सिटीज़ को देखिए तो उसमें बहुत ज्यादा कोलैबोरेशन है. अपने ही डिपार्टमेंट में नहीं बल्कि अलग यूनिवर्सिटी के अलग-अलग डिपार्टमेंट में लोग साथ आते हैं, सेमिनार्स में साथ बैठते हैं क्योंकि वो सब एक-दूसरे के प्रमोशन में जिम्मेदार रहे हैं.
यूएस-यूरोप में जो प्रमोशन होता है, वह बड़ी लंबी प्रक्रिया है. एक साल की प्रक्रिया है. अगर आप किसी को प्रमोट करते हैं, उसका डोसियर बनवाते हैं, फिर एक फैकल्टी आपके डिपार्टमेंट का कोई एक व्यक्ति नियुक्त किया जाता है, जो आपके पेपर पढ़ते हैं. उसके बाद आपके स्कूल की एक कमेटी बनती है, जहाँ पर आपका केस डिस्कस होता है, फिर यूनिवर्सिटी के पास जाता है. और डिपार्टमेंट के लोग आपके डोसियर ऊपर कॉमेंट्स करते हैं और फिर आपको प्रमोट किया जाता है. इस प्रॉसेस का रीज़न यही है कि ज्यादातर लोग जो आपकी सक्सेस से जुड़े हैं, वो आपके एक्सेलेंस को पहचानें. कहीं ऐसा न हो कि आपकी की हुई कोई अच्छी चीज किसी से मिसआउट हो जाए. तो एक्सेलेंस को परखने के लिए भी तो कई लोग चाहिए. वह बहुत जरूरी है कि वो लोग चाहिए जिनका सिस्टम में स्टेक हो. हमारे यहाँ सेलेक्शन कमेटी होती है, प्रमोशन कमेटी होती है. हम बाहर से लोगों को लेकर आते हैं, जिनको उस सिस्टम के बारे में या किस तरह से उस टीचर ने परफॉर्म किया उसके बारे में कोई खबर नहीं होती. चार पन्ने का नोट है, उसको पढ़कर तीन एक सवाल पूछकर हम उसका सेलेक्शन या प्रमोशन डिसाइड करते हैं. मुझे लगता है कि यह बहुत बड़ी कमजोरी है कि यूनिवर्सिटी की आत्मा उसकी फैकल्टी को बिल्कुल ही कमजोर कर दिया है. जो बाहर से प्रभाव है हम इस समय उसकी बात नहीं करेंगे लेकिन उसकी भी एक भूमिका होती है.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
हाँ, तो इसका मतलब यह हुआ कि आप सबके लिए कोई एक सेट ऑफ क्वालिफिकेशन नहीं सुझा रहे हैं. और फिर विश्वविद्यालय इसके लिए भी स्वतंत्र होंगे कि वो किस व्यक्ति को किस स्कॉलर को किस रूप में अपॉइंट कर रहे हैं. हो सकता है कि आप किसी को प्रोफेसर के रूप में अपॉइंट करें और किसी को हो सकता है आप असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में अपॉइंट करें. और यह पूरी तरह से आपकी आजादी होगी. जिन प्रक्रियाओं का वर्णन अभी आपने किया वह एक सामूहिक प्रक्रिया है जिसमें एक प्रकार से पूरा विश्वविद्यालय शामिल है. फिर जिम्मेदारी सबकी हो जाती है. वह सिर्फ कुलपति का या उसकी पसंद-नापसंद का मामला नहीं होता. कुछ पसंद-नापसंद को जस्टिफाई कर सकता है लेकिन अगर प्रक्रिया के तौर पर देखें तो वह सिर्फ कुलपति तय नहीं कर रहा है, पूरा विश्वविद्यालय उसकी एकेडमिक कम्यूनिटी तय कर रही है. आपने कहा कि फैकल्टी इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है कि उससे बहुत सारी चीजें जुड़ी हुई हैं. जैसे उससे करिकुलम जुड़ा हुआ है या जिसे आप सिलेबस कहते हैं, वह जुड़ा हुआ है, उससे रिसर्च जुड़ा हुआ है. शोध को लेकर कई वर्षों से हम लोग बात करते रहे हैं कि जब विश्वविद्यालय में हम शिक्षकों की बात करते हैं, अध्यापन की बात करते हैं तो बिना शोध के एक अच्छे अध्यापक की कल्पना करना कठिन है. मगर मैं करिकुलम यानी पाठ्यक्रम के बिंदु पर अभी रुकना चाहूँगा. आपने कहा कि असल में अध्यापक उसका स्रोत है. अध्यापक के जिम्मे यह चीज है. और हर जगह किसी एक विषय के विश्वविद्यालय के अध्यापक उस विषय के सिलेबस या पाठ्यक्रम के निर्माण के लिए जिम्मेदार होंगे और वही बनाएंगे. उनको वह बाहर से बनाकर नहीं दिया जाएगा. जैसे आप किसी राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की कल्पना नहीं कर सकते. वह अहमदाबाद यूनिवर्सिटी का होगा, दिल्ली यूनिवर्सिटी का होगा, जयप्रकाश यूनिवर्सिटी छपरा का होगा.
मुझे याद है कि कई साल पहले जब मूक्स की काफी धूम मची हुई थी तो उस वक्त पॉलिटिकल फिलॉसफी के स्टार प्रोफेसर प्रोफेसर सैंडल के जस्टिस को लेकर कोर्स को अमेरिका के एक विश्वविद्यालय को कहा गया है कि इसे अपने यहाँ लगाइए. वह छोटा सा कॉलेज या विश्वविद्यालय था. उसने कहा कि नहीं हम यह नहीं करेंगे. प्रोफेसर सेंडल बहुत बड़े शिक्षक हैं, लेकिन हम अपना पाठ्यक्रम स्वयं बनाएंगे और उन्होंने खुला पत्र प्रोफेसर सैंडल को लिखा कि यह हम पर लादने की कोशिश की जा रही है लेकिन हम ऐसा नहीं करना चाहते और प्रोफेसर सैंडल ने जवाब लिखा कि यह पूरी तरह से आपकी स्वतंत्रता है कि आप अपना कोर्स बनाएँ. तो यह जो करिकुलम का मामला है, उस पर भी हम थोड़ी बात करें कि क्यों यह बहुत आवश्यक है कि वह विकेंद्रित हो, डिसेंट्रलाइज्ड हो और वह दरअसल इंस्टीट्यूशन स्पेसिफिक हो. आप जिस इन्स्टिट्यूशन में हैं वहाँ करिकुलम बना रहे हैं और क्यों उसमें यूनिफॉर्मिटी हमेशा मदद नहीं करती. वह चाहे पॉलिटिकल साइंस या मैथमेटिक्स ही क्यों न हो?
प्रोफेसर पंकज चंद्र
जब करिकुलम के बारे में हम सोचते हैं तो कुछ चीजें तो हमेशा ध्यान रखते हैं कि हम उस करिकुलम से अंडरग्रेजुएट या ग्रेजुएट लेवल पर क्या क्रिटिकल हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. कुछ क्रिटिकल थिंकिंग की एबिलिटी, कुछ एनेलिटिकल एबिलिटी, कुछ कम्यूनिकेशन की एबिलिटी, कुछ इंडिपेंडेंट थिंकिंग की एबिलिटी और कुछ डिसिप्लिनरी नॉलेज कि अगर व्यक्ति उस डायरेक्शन से उसी विषय में आगे पढ़ना चाहे या उसे लेकर अपना लाइवलीहुड बनाना चाहे या नौकरी करना चाहे तो उसको डिसिप्लिनरी गहराई की जरूरत है. सो जब हम एक सिलेबस या करिकुलम बनाते हैं तो ये चीजें ध्यान रखते हैं. जो गोल्स हैं, एक डिसिप्लिन की कुछ इन्फॉर्मेशन या सब्जेक्ट की कुछ डिसिप्लिन होती है, उस सब्जेक्ट का नॉलेज सिस्टम या एक्स्प्लोरेशन होता है, यह कई ढंग से किया जा सकता है. मैं तो ऑपरेशंस मैनेजमेंट का प्रोफेसर हूँ. हम बड़े तौर पर मेन्युफैक्चरिंग, सप्लाई चेन इन सब चीजों को पढ़ाते हैं. अगर हमें कपेसिटी प्लानिंग बढ़ानी है, उसके बारे में सिखाना है तो कई ढंग से कपेसिटी प्लानिंग को बता सकते हैं, कई विषयों से उसको सिखा सकते हैं और हमारे डिसिप्लिन में जो अलग अलग विषय हैं, उनको वो चीज़ें, वो स्किल्स, वह पर्सपेक्टिव, वह डीप थिंकिंग, एनेलिटिकल एबिलिटी दी जा सकती है. एक टीचर के नाते अपने डिसिप्लिन के लिए अपने पैशन के तहत जब हम पढ़ाएंगे, तो मुझे लगता है कि क्लास का माहौल और जो रिसर्च है, वह मैं ज्यादा लाऊँगा, ज्यादा अच्छी तरह से पढ़ा सकूँगा. तो अलग-अलग कॉलेजों में जो प्रोफेसर्स हैं, जो उनके इंटेरेस्ट हैं, उनमें कुछ चीजें फंडामेंटल हैं जो सभी लोग अच्छी तरह पढ़ाते हैं.
सो करिकुलम का जो रोल है, स्टैंडर्डाइजेशन का जो रोल है, वह केवल ब्रॉड पैरामीटर डिफाइन करने का है कि देखिए जब कोई बीए, बीएससी या बीटेक के बाद ग्रेजुएट करेगा तो यह ब्रॉड नॉलेज, ये ब्रॉड स्किल्स, यह ब्रॉड पर्सपेक्टिव, यह ब्रॉड थिंकिंग उसमें होनी चाहिए. आप यूएस या यूरोप में ही क्यों न चले जाएं, आप दो अच्छे इंस्टीट्यूशन ले लीजिए. एक स्वीडन में ईपीएफएल (Swiss Federal Institute of Technology Lausanne), दूसरा स्विट्जरलैंड में ईटीएच (ETH Zürich) ले लीजिए. दोनों बड़े अच्छे इंस्टीट्यूशंस हैं. दोनों की पढ़ाई का करिकुलम अलग है. दोनों ही बैचलर ऑफ इंजीनियरिंग देते हैं, दोनों ही एक दूसरे की डिग्री को मान्यता देते हैं, दोनों ही इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में चीजें पढ़ाते हैं. लेकिन जिस ढंग से पढ़ाते हैं, वह भी अलग है. हम जो हैं किसी वजह से कॉन्टेंट पर ज्यादा केंद्रित हैं, और प्रॉसेस ऑफ लर्निंग और पैडेगॉजी को हमने बिल्कुल अलग रख दिया है. हमारे लिए content is the king जबकि कॉन्टेंट से जो लर्निंग हो रही है, जो आउटकम है, उसके ऊपर हमने फोकस नहीं किया. और दुनियाभर के इंस्टीट्यूशंस ने इसको थोड़ा सा अलग ढंग से देखा है कि कॉन्टेंट तो है ही, थोड़ा बहुत तो फंडामेंटल कॉन्टेंट सबको इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग वालों को पढ़ना है. जिन्हें इकोनॉमिक्स पढ़ना है तो उन्हें कुछ फंडामेंटल चीजें तो माइक्रो में जाननी ही पड़ेंगी लेकिन हम क्या किस कॉन्टेक्स्ट में किस किताब से किस ढंग से उसको पढ़ाते हैं. Those are the things that make it very different, make those two institutions very different. इंस्टीट्यूशनल ग्रोथ उसमें है, अपनी यूनीकनेस है. आपने जो जस्टिस वाला कोर्स कहा, कई लोग दुनियाभर में जस्टिस का कोर्स पढ़ाते होंगे. हर लॉ स्कूल में जस्टिस के ऊपर कोर्स पढ़ाया जाता होगा, लेकिन सब अलग ढंग से पढ़ाते हैं. सबके करिकुलम अलग हैं, सबके टॉपिक्स अलग हैं. तो क्यों? Why should justice be seen through one lens. जस्टिस को भी कई ढंग से देखना चाहिए. एक ही यूनिवर्सिटी में जस्टिस के कई कोर्स हो सकते हैं.
सो मुझे लगता है कि जब हम सेंट्रलाइज्ड ढंग से एक सेंट्रल पर्सपेक्टिव से एजुकेशन को देखना शुरू करते हैं और सबको समान फ्रेमवर्क में डालते हैं और फिर पुश करते हैं कि आप उसके डिटेल में उसको फॉलो करें, उसके करिकुलम, यहाँ तक कि आप किताब भी वही लीजिए और आप टॉपिक्स भी वही डिफाइन कीजिए तो कहीं न कहीं मुझे लगता है कि जो फैकल्टी का इनोवेशन है, पैशन है, उनका रिसर्च है, वह परे हो जाता है. और फिर उस स्तर पर मुझे परेशानी होती है. उसी स्तर पर एक्ज़ामिनेशन होता है और मुझे लगता है कि यह हमें एक्सेलेंस से बहुत दूर ले गया है. मुझे लगता है कि यह कंट्रोल ड्रिवेन माइंडसेट के तहत एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस पर भरोसे की कमी है. कई बार हमने लोगों को कहते सुना है, चाहे वो इंडस्ट्री में हों या दूसरी जगह हों कि education cannot be left to educationists alone. तो मैं तुरंत सवाल पूछता हूँ कि who will you leave that to? आप बच्चे को 12 साल के लिए स्कूल में भेजते हैं. तीन-चार साल के लिए यूनिवर्सिटी में भेजते हैं. वहाँ पर तो आप ट्रस्ट कर रहे हैं. तो उनकी एजुकेशन के लिए क्यों नहीं ट्रस्ट कर पाते? वेल बीइंग के लिए क्यों ट्रस्ट कर पा रहे हैं? उनके मेंटल ग्रोथ, एक्सेलेंस उनको क्यों नहीं दे पा रहे हैं. एक बार छोड़कर तो देखिए. इतने साल तक तो हम लोग यूँ ही करते आए हैं तो छोड़कर भी कुछ साल देख लें. अच्छे इंस्टीट्यूशंस में फैकल्टी को जितनी एकेडमिक फ्रीडम मिलती है, उतना ही वह इनोवेट करता है, उतना ही वह डीप एक्सपेरिमेंट करता है. उसी से मुझे लगता है कि उनकी एक्सेलेंस और स्टूडेंट की लर्निंग प्रॉसेस एक्सेलेंस की तरफ बढ़ती है.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
यह बिल्कुल ठीक है कि आपको अध्यापकों पर विश्वास करना होगा. यहाँ करिकुलम में भी वहीं सिद्धांत कारगर है, विविधता का सिद्धांत, एकरूपता और केंद्रीयता का नहीं कि आप यह कहें कि फलां विषय का पाठ्यक्रम है तो वह 80 प्रतिशत समरूप रहेगा और आप 20% अपना कुछ डाल सकते हैं. तो इस प्रकार के समीकरण से एक अच्छे पाठ्यक्रम की कल्पना आप नहीं कर सकते. इससे एक दूसरी बात निकलती है जिस पर पिछले कई वर्षों से बहुत ज़ोर दिया जा रहा है. उस पर भी हम लोग कई सालों से चर्चा करते रहे हैं. अमेरिका में जब 2011-12 में मूक्स यानी मैसिव ओपन ऑनलाइन कोर्स की चर्चा शुरू हुई और इसको एक इलाज की तरह देखा गया कि वह बड़े पैमाने पर लो क्वालिटी एजुकेशन की कमी पूरी करेगा क्योंकि स्टार प्रोफेसर्स के जरिए हम ऑनलाइन कोर्स देंगे और लोग एक्सेस करेंगे और फिर यूनिवर्सिटीज़ को भी उत्साहित किया जाएगा कि वे उसके आधार पर डिग्री दें.
मैं अब तक जो समझ पाया हूँ कि मूक्स का जो आरंभिक दंभ या उत्साह था, वह तो ठंडा पड़ गया है लेकिन भारतवर्ष में उसने तेजी पकड़ ली है और वह एक दूसरे ढंग से तेजी पकड़ी है यानी आधिकारिक रूप से भी अब यह कहा जा रहा है कि यह जो क्लासरूम टीचिंग है, जिसे आप फिजिकल टीचिंग कहते हैं, इसको कम से कम करना चाहिए. यहाँ तक कि लक्ष्य दिया गया है कि हमें उत्तरोत्तर इस दिशा में बढ़ना चाहिए कि क्लासरूम टीचिंग 30% रह जाए और 70% टीचिंग ऑनलाइन हो जाए. मुझे बहुत पहले की याद है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के एक दीक्षांत समारोह में सैम पित्रोदा आए थे और सैम पित्रोदा ने भाषण देते हुए कहा था कि अब पढ़ाई का ये तरीका बहुत पुराना पड़ गया है. अब हमें एक विषय में पाँच स्टार प्रोफेसर्स चाहिए और बाकी जगह हमें फैसिलिटेटर्स चाहिए. तो वो पाँच प्रोफेसर्स के लेक्चर ऑनलाइन हो जाएंगे और उसके बाद फैसिलिटेटर चाहिए जो छात्रों तक पहुँचा देगा क्योंकि जो आपने कहा कि हम यह मान रहे हैं कि कॉन्टेंट अपलोड हो जाएगा और उसके बाद छात्र उसको ग्रहण करेंगे. भारतवर्ष में अब इसे आधिकारिक तौर पर सुझाया जा रहा है. क्लासरूम्स में इसलिए कि यह जो शिक्षक नाम का प्राणी है, इसके चलते काफी अस्थिरता भी हो सकती है, अनिश्चितता भी हो सकती है. तो हम स्टैंडर्डाइज करेंगे और एक क्वालिटी एजुकेशन को ऑनलाइन इसमें लाएंगे. अब तो यह भी कहा जा रहा है कि हम और भी आगे बढ़ गए हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का ज़माना है तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर अब विश्वविद्यालय को ध्यान देना चाहिए. इन दो चीजों के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?
प्रोफेसर पंकज चंद्र
मुझे लग रहा है कि चाहे वह एकेडमिक ग्रुप हो या एडमिनिस्ट्रेटर्स हों, स्टेट और सिटी लेवल पर या कंट्री लेवल पर जो इस बारे में सोच रहे हैं, उनको थोड़ा इंस्टीट्यूशन और लर्निंग प्रॉसेस समझने की जरूरत है. आपने हमने सभी ने ऑनलाइन पढ़ाया है और हमने उसके थोड़े-बहुत एडवांटेज भी देखे हैं लेकिन हमारे सामने उसके डिसएडवांटेज भी बहुत ज्यादा सामने आए. हम यह हम भूल जाते हैं कि लर्निंग एक सोशियोलॉजिकल प्रॉसेस है. यह कॉन्टेंट एक्विज़िशन का प्रॉसेस नहीं है और इसीलिए मैं बार-बार कह रहा हूँ कि कॉन्टेंट पर फोकस करके हमारा विचार हो गया है कि हम एक कोर्स में चार ही चीजें क्लास में पढ़ें, लेकिन चार चीज़ को बहुत अच्छी तरह से करें, बनिस्बत 40 चीजें उस करिकुलम में डालने की कोशिश करें. एक तरफ हम बोलते हैं लाइफ लॉन्ग लर्निंग तो पूरी जिंदगी पड़ी है कि जो हमने 40 में से जो 36 चीजें नहीं पढ़ी हैं, उन्हें हम सीख लेंगे. कुछ मास्टर्स के लेवल पर सीख लेंगे, कुछ काम करते समय सीख लेंगे, कुछ सेल्फ लर्निंग से सीख लेंगे. कोई जरूरी नहीं है कि हम हर चीज़ चार साल में सीखें.
मुझे लगता है कि हम एक आत्मविश्वास से भरे व्यक्ति, एक बेहतरीन विचारक को तैयार करके समाज में लाएं और उसके लिए बहुत जरूरी है क्लासरूम. क्लासरूम मतलब चहारदीवारी नहीं, क्लासरूम मतलब collection of people, students and teachers together. वह क्लासरूम है, चाहे वो बाहर बैठे हों, अंदर बैठे हों, घर में बैठे हों, कहीं बैठे हैं मगर it’s that collection of people क्योंकि जब टीचर पढ़ा रहा है और जब किसी बच्चे ने सवाल पूछा, किसी छात्र ने, तो किसी तीसरे ने इसका जवाब दिया तो जो चौथा बच्चा है वह भी सीख रहा है उस जवाब से. जब इंडिविजुअली सीखते हैं, मूक के सामने बैठे हुए तो इस किस्म की लर्निंग जो औरों से हमें होती है, औरों के सवालों से औरों के असाइनमेंट से, औरों के प्रश्न के डिस्कशन से, औरों के जवाब के डिस्कशन से, औरों के पर्सपेक्टिव कॉन्टैक्स्ट से वह नहीं हो पाती. हर छात्र अपना कॉन्टैक्स्ट लेकर क्लास में आता है, और उस कॉन्टेस्क्स्ट के तहत सवाल का जवाब देता है, उसी कॉन्टैक्स्ट के तहत वह असाइनमेंट करता है. अगर उसका डिस्कशन करें तो मुझे लगता है कि लर्निंग बहुत ही रिच है. वह कहीं न कहीं मूक नहीं बन पा रहा है. कुछ इसमें एजुटेक कंपनी का पर्सपेक्टिव है कि वो इसको बिज़नेस के तहत देखते हैं. हम मूक के विरुद्ध नहीं जा रहे हैं. मेरे ख्याल से आज से करीब आठ-नौ साल पहले मूक की कॉन्फ्रेंस में हम लोग गए थे, यही समझने के लिए कि क्या कॉन्टेक्स्ट है. हमने वहाँ पर पूरे उत्साह से लोगों से बातें की थीं और लोगों को समझा था कि कोई अगर बच्चा अकेला किसी गाँव में या कहीं डिस्टेंट एरिया में रह रहा है, तो बेशक इसका बहुत महत्व है. It may be a value as a complement also कि अगर हम इंस्टीट्यूशनली कई चीजें नहीं पढ़ा पा रहे हैं, हमारे पास वो केपेबिलिटीज नहीं हैं, तो कॉंप्लिमेंट की तरह है. मगर जो एक क्लासरूम लर्निंग की प्राइमेसी है, उसकी वैल्यू है, अगर उसको हम हटा दें तो मुझे लगता है कि यह एजुकेशन के लिए बहुत बड़ी ट्रैजिडी होगी. कहीं न कहीं हम education and learning as a process से हटकर education as a compliance से संचालित होने वाले माहौल में चले जाएंगे. हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि जो लोग बैठकर रूल्स बना रहे हैं, वो यह नहीं समझ पा रहे हैं कि एजुकेशन और लर्निंग होती कैसे है, कैसे बच्चा सीखकर तैयार होकर निकलता है. यह करना है, इसमें पाँच कोर्स करने हैं, इस तरह के करने हैं, उसमें आप टिकमार्क कर दें तो एजुकेशन हो गया. मुझे लगता है कि इससे हमें थोड़ा हटना पड़ेगा और वह तभी हट पाएंगे जबकि हम इंस्टीट्यूशन के ऊपर फोकस करें बनिस्बत इंडीविजुअल इंस्टीट्यूशन के. मुझे लगता है कि नई प्रणाली चाहें एनईपी हो, चाहे कोई और इन्नोवेटिव थिंकिंग वाले प्रॉसेस हों, इंडीविजुअल इंस्टीट्यूशन के ऊपर फोकस करना पड़ेगा कि वो कैसे लागू करते हैं, वो कैसे अपने सोच में उसको लागू करते हैं. तब जाकर वहाँ ओनरशिप भी होती है, तब जाकर वहाँ पर फैकल्टी शामिल होती है, तब वहाँ जाकर नए असाइनमेंट भी बनते हैं, नए उदाहरण निकलकर आते हैं और वहाँ पर जो स्टूडेंट ज्यादा सीखता है. मूक के मामले में मुझे लग रहा है कि बहुत सारी चीजें जिसकी केपेबिलिटीज एक इंस्टीट्यूशन में अगर नहीं हैं तो एक मेकेनिज्म बना है कि चलिए हम वहाँ से भी पढ़ सकते हैं लेकिन रेग्युलर क्लास का सब्स्टिट्यूट नहीं है.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
एक तर्क यह भी दिया जाता है कि जब कुछ साल पहले इसकी चर्चा शुरू हुई कि दरअसल, यह जो टीचर ड्रिवन क्लासरूम प्रॉसेस है, टीचर की टिरेनी है
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, टीचर तय कर रहा है, तो अब हम छात्र को उससे आजाद कर रहे हैं, छात्र को हम यह आजादी दे रहे हैं कि उनके सामने इतनी सारी चीजें हैं, उनमें से वो चुनाव कर लें और चुनाव करके अपना बुके खुद बनाएं. अब यह बात सुनने में बहुत आकर्षक लगती है क्योंकि तर्क जनतांत्रिक तर्क है, जिसमें आप छात्र को स्वतंत्र कर रहे हैं शिक्षक से और छात्र को अवसर दे रहे हैं कि वह अपना पाठ्यक्रम स्वयं तैयार करें, अपने लेक्चर्स स्वयं तैयार कर लें. तो इस जनतांत्रिक तर्क के खतरे क्या हैं?
प्रोफेसर पंकज चंद्र
एजुकेशन के परिप्रेक्ष्य में किसी को तैयार करने का यह तो बहुत ही कमजोर तर्क है that a student should have a choice is a good idea by itself क्योंकि हर स्टूडेंट चाहता है कि वह किस ढंग से कुछ चीजें और सीख सके. But it is no substitute for a certain body of knowledge. दूसरी चीज़ है कि कौन वह चॉइस, कौन वह बुके तय करेगा, कौन डिफाइन करेगा कि उस बुके में किस किस्म के फूल रखे जाएंगे. तो वह डिसिशन उसी का हो सकता है जो उस डिसिप्लिन में उस कॉन्टेक्स्ट में, उस एजुकेशनल एनवायरनमेंट से बहुत सालों तक जुड़ा हुआ है और समझता है कि एक स्टूडेंट जो क्लास 12 के बाद यूनिवर्सिटी में आ रहा है या मास्टर्स में आ रहा है, उसको क्या जरूरत है? यह भी सही है कि बहुत जगह हम यह डिसीशन मेकिंग क्योंकि सेंट्रलाइज कर देते हैं तो दुनिया जैसे बदल रही है, जो उसकी जरूरत है, वह हम नहीं लाते. ऐसे वो भी एक सही आलोचना है पर उसको ठीक करने के लिए there is no such thing tyranny of a teacher. टीचर का तो रोल है कॉन्टेक्स्ट देकर संवाद कराना in very deep reflective mode. टीचर का तो ये काम है कि किस ढंग से हम सवाल ऐसे उठा सकें और ऐसा डाइवर्ट सोच क्लास में ला सकें कि बच्चा अपने आप खोज सके. यह तो टीचर का काम है.
तो मुझे लगता है कि जो दुनिया भर में चुनाव दिए जाते हैं वो किसी अलग वजह से दिए जाते हैं. वो टीचर को खत्म करने के लिए नहीं हैं, टीचर ही चुनाव देता है कि आप अपने को ब्रॉडली एजुकेट कीजिए. अपने और जगह के आइडियाज लेकर आइए. जब पेंडेमिक हुआ तो तय हुआ कि किस ढंग से किस तरह वायरस 6.5 फ़ीट यात्रा करता है और अगर हम 6.5 फ़ीट दूर रहेंगे तो शायद हमें इन्फेक्शन नहीं होगा. तो तमाम एटमॉस्फेरिक साइंटिस्ट, एयरोसोल एक्स्पर्ट उसके ऊपर शोध कर रहे थे लेकिन उन्होंने एक हिस्टरी के पीएचडी स्टूडेंट को पकड़ा कि आप जरा हमारे 100 साल के पेपर्स को देखिए, उनमें से निकालिए कि कैसे रिसर्च हुआ.
मैं जिस बात पर जोर देना चाहता हूँ वह यह कि जो ब्रॉड एजुकेशन चॉइस का एक तात्पर्य है कि हम किस तरह एक डोमेन के आइडिया को दूसरे में लाकर अपनी लर्निंग को एनरिच कर सकें. इसका यह मतलब नहीं है कि हम फ्री फॉर ऑल करके डिफाइन कर दें कि जो छात्र है उस कुछ भी ले ले. ले सकता है लेकिन तब एक्स्पर्टीज वाला ऑब्जेक्टिव शायद ही हो. हो सकता है कि ब्रॉड एजुकेशन लेकर छात्र जा सके और हो सकता है कि वही उस स्टूडेंट का ऑब्जेक्टिव हो एजुकेशन. लेकिन वह चॉइस देने के लिए टीचर को और इंस्टीट्यूशन को आपको ऑटोनॉमी या राइट देना पड़ेगा कि किस ढंग से उस चॉइस को बनाया जा सके? सो कहीं न कहीं हम दुनिया से आइडियाज़ ले रहे हैं लेकिन क्यों वो आइडियाज़ लिए गए हैं, वह नहीं समझ पा रहे हैं. किसी दूसरी प्रॉब्लम का सॉल्यूशन बनाकर उसको पेश कर रहे हैं. तो एजुकेशन डीप और ब्रॉड दोनों है और आज के समय में जो इंटरडिसिप्लिनरी एजुकेशन है, वह भी बहुत जरूरी है. Because it makes your deep deeper. वह आपको छितर-बितर के सोचने के लिए नहीं, वह तो आपको केंद्रित कर रहा है कि आप किस ढंग से बहुत आइडियाज को एक सेंट्रलाइज्ड एरिया में लाकर सोच को और अपने डिसिप्लिन में अच्छे सवाल पूछ सकें. वो उस चीज़ की ट्रेनिंग है. सोसाइटी की ओर चीजें हैं जो आप जान सकें. तो मुझे लगता है कि इस आइडिया को हम कंप्लाएंस के रूप में न लें बल्कि एक ब्रॉड एजुकेशनल डेवलपमेंट ऑफ पर्सपेक्टिव के तहत लें. इसके डेवेलपमेंट की जिम्मेदारी अगर फैकल्टी नहीं लेगी तो कौन लेगा? क्या स्टेट के एजुकेशन डिपार्टमेंट डिफाइन करेंगे? तो फिर वो पढ़ा भी लें.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
एजुकेशन डिपार्टमेंट के लोगों की बात तो अलग है, लेकिन हमारी बातचीत की शुरुआत में आपने एक शब्द का इस्तेमाल किया था स्लो कुकिंग. मैं रसोई के सामने बैठा हुआ हूँ और मैं जानता हूँ कि बहुत सारी चीजें धीमी आंच पर पकती हैं. आप अगर आंच तेज कर देंगे तो वो जल जाएंगी, खराब हो जाएंगी और इसलिए पकाने वालों को पता है कि कौन सी चीज़ धीमी आंच पर पकेगी, किसको बिल्कुल तेज कर देना है. और कम से कम यह प्रक्रिया जिसको आपने कहा पाठ्यक्रम की प्रक्रिया यह धीमी आंच की प्रक्रिया है और इसलिए पाठ्यक्रम जब बदलते भी हैं तो एक लंबी प्रक्रिया के तहत बदलते हैं. लेकिन भारतवर्ष में कई वर्षों से हमने नीति निर्माताओं को देखा है कि वो उसमें खासी हड़बड़ी करना चाहते हैं यानी तीन महीने में सिलेबस बदला जा सकता है. फिर अगले साल उसका पूरा ढांचा बदल दिया जा सकता है, फिर उसके अगले साल और ढांचा बदल दिया जा सकता है और हम पिछले सात-आठ वर्षों में देखें तो जो केंद्रीय संस्था है उसकी तरफ से एक के बाद एक अनेक ढांचे प्रस्तावित किए गए हैं जिसने खासी अराजकता पैदा कर दी है और नीति निर्माताओं की यह समझ बन गई है कि सिलेबस क्या चीज़ है, यह तो तीन महीने में बन सकता है, यह तो दो दिन में बन सकता है. मुझे याद है दिल्ली विश्वविद्यालय में जब कई वर्ष पहले चार साल के स्नातकस्तरीय पाठ्यक्रम को कहा गया कि इसको लागू कर दिया जाएगा और वह तीन महीने में लागू कर दिया गया तो ऑक्सफोर्ड या केंब्रिज विश्वविद्यालय की शायद प्रेसिडेंट आई हुई थीं, उन्होंने कहा कि I admire you because you have achieved this feat and it takes years what you have done in three months. इसको लोगों ने यहाँ तारीफ के रूप में देखा. तो इस पर आप क्या कहना चाहेंगे? Why it is slow cooking and why syllabus is not something which you can change year after year. हर तीन महीने पर या चार महीने पर या दो दिन में वह क्यों नहीं बन सकता है?
प्रोफेसर पंकज चंद्र
मुझे लगता है कि पिछले 20-25 साल में हमारे समाज में जिस इकोनॉमिक मॉडल ने जगह बनाई है, उससे एक तो बड़ी असंतुष्टि इंडस्ट्री वालों ने जताई है कि ये यूनिवर्सिटी तैयार नहीं हैं. ये यूनिवर्सिटीज़ बदलाव नहीं कर रही हैं, ये ठीक से ग्रेजुएट नहीं कर रहे हैं. कहीं वह बात थोड़ी सच भी है कि यूनिवर्सिटीज़ बहुत सारी चीजें बदलने में थोड़ी खामोश रहती हैं लेकिन इंडस्ट्री या ब्यूरोक्रेसी का किसी आयडिया को लाने का जो तरीका है वह बड़ा टॉप डाउन है. एक सीईओ ने, एक सेक्रेटरी ने किसी मिनिस्टर साहब ने कहा कि यह होना चाहिए. अब वह टॉप डाउन होकर नीचे चले आए. एजुकेशन बिल्कुल इसके विपरीत रहा है. एजुकेशन तो बिल्कुल बॉटम अप प्रॉसेस है और यह बदलाव के मामले में हमेशा स्लो शिप रही है और तभी एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस 700-800 साल तक एक्सेलेंस को बनाए रहे और बाकी इंडस्ट्रीज 150 साल में 75 साल में बंद हो जाती हैं. सरकारें हैं, मिनिस्ट्रीज हैं, वो भी आती हैं-जाती हैं. सो, उसका रीज़न यही है कि एक लॉन्ग टर्म एक्सेलेंस बनाए रखने के लिए आपको लॉन्ग टर्म फिलोसॉफिकल मूरिंग को पकड़कर रखना पड़ता है. जो नए फैकल्टी आ रहे हैं, नए एडमिनिस्ट्रेटर्स यूनिवर्सिटी में आ रहे हैं, उनको उनके बारे में बताना पड़ता है, उसके साथ उनको उस प्रॉसेस में लाना पड़ता है.
यूएस-यूरोप में जो प्रमोशन होता है, वह बड़ी लंबी प्रक्रिया है. एक साल की प्रक्रिया है. अगर आप किसी को प्रमोट करते हैं, उसका डोसियर बनवाते हैं, फिर एक फैकल्टी आपके डिपार्टमेंट का कोई एक व्यक्ति नियुक्त किया जाता है, जो आपके पेपर पढ़ते हैं. उसके बाद आपके स्कूल की एक कमेटी बनती है, जहाँ पर आपका केस डिस्कस होता है, फिर यूनिवर्सिटी के पास जाता है. और डिपार्टमेंट के लोग आपके डोसियर ऊपर कॉमेंट्स करते हैं और फिर आपको प्रमोट किया जाता है. इस प्रॉसेस का रीज़न यही है कि ज्यादातर लोग जो आपकी सक्सेस से जुड़े हैं, वो आपके एक्सेलेंस को पहचानें. कहीं ऐसा न हो कि आपकी की हुई कोई अच्छी चीज किसी से मिसआउट हो जाए. तो एक्सेलेंस को परखने के लिए भी तो कई लोग चाहिए. वह बहुत जरूरी है कि वो लोग चाहिए जिनका सिस्टम में स्टेक हो. हमारे यहाँ सेलेक्शन कमेटी होती है, प्रमोशन कमेटी होती है. हम बाहर से लोगों को लेकर आते हैं, जिनको उस सिस्टम के बारे में या किस तरह से उस टीचर ने परफॉर्म किया उसके बारे में कोई खबर नहीं होती. चार पन्ने का नोट है, उसको पढ़कर तीन एक सवाल पूछकर हम उसका सेलेक्शन या प्रमोशन डिसाइड करते हैं. मुझे लगता है कि यह बहुत बड़ी कमजोरी है कि यूनिवर्सिटी की आत्मा उसकी फैकल्टी को बिल्कुल ही कमजोर कर दिया है. जो बाहर से प्रभाव है हम इस समय उसकी बात नहीं करेंगे लेकिन उसकी भी एक भूमिका होती है.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
हाँ, तो इसका मतलब यह हुआ कि आप सबके लिए कोई एक सेट ऑफ क्वालिफिकेशन नहीं सुझा रहे हैं. और फिर विश्वविद्यालय इसके लिए भी स्वतंत्र होंगे कि वो किस व्यक्ति को किस स्कॉलर को किस रूप में अपॉइंट कर रहे हैं. हो सकता है कि आप किसी को प्रोफेसर के रूप में अपॉइंट करें और किसी को हो सकता है आप असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में अपॉइंट करें. और यह पूरी तरह से आपकी आजादी होगी. जिन प्रक्रियाओं का वर्णन अभी आपने किया वह एक सामूहिक प्रक्रिया है जिसमें एक प्रकार से पूरा विश्वविद्यालय शामिल है. फिर जिम्मेदारी सबकी हो जाती है. वह सिर्फ कुलपति का या उसकी पसंद-नापसंद का मामला नहीं होता. कुछ पसंद-नापसंद को जस्टिफाई कर सकता है लेकिन अगर प्रक्रिया के तौर पर देखें तो वह सिर्फ कुलपति तय नहीं कर रहा है, पूरा विश्वविद्यालय उसकी एकेडमिक कम्यूनिटी तय कर रही है. आपने कहा कि फैकल्टी इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है कि उससे बहुत सारी चीजें जुड़ी हुई हैं. जैसे उससे करिकुलम जुड़ा हुआ है या जिसे आप सिलेबस कहते हैं, वह जुड़ा हुआ है, उससे रिसर्च जुड़ा हुआ है. शोध को लेकर कई वर्षों से हम लोग बात करते रहे हैं कि जब विश्वविद्यालय में हम शिक्षकों की बात करते हैं, अध्यापन की बात करते हैं तो बिना शोध के एक अच्छे अध्यापक की कल्पना करना कठिन है. मगर मैं करिकुलम यानी पाठ्यक्रम के बिंदु पर अभी रुकना चाहूँगा. आपने कहा कि असल में अध्यापक उसका स्रोत है. अध्यापक के जिम्मे यह चीज है. और हर जगह किसी एक विषय के विश्वविद्यालय के अध्यापक उस विषय के सिलेबस या पाठ्यक्रम के निर्माण के लिए जिम्मेदार होंगे और वही बनाएंगे. उनको वह बाहर से बनाकर नहीं दिया जाएगा. जैसे आप किसी राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की कल्पना नहीं कर सकते. वह अहमदाबाद यूनिवर्सिटी का होगा, दिल्ली यूनिवर्सिटी का होगा, जयप्रकाश यूनिवर्सिटी छपरा का होगा.
मुझे याद है कि कई साल पहले जब मूक्स की काफी धूम मची हुई थी तो उस वक्त पॉलिटिकल फिलॉसफी के स्टार प्रोफेसर प्रोफेसर सैंडल के जस्टिस को लेकर कोर्स को अमेरिका के एक विश्वविद्यालय को कहा गया है कि इसे अपने यहाँ लगाइए. वह छोटा सा कॉलेज या विश्वविद्यालय था. उसने कहा कि नहीं हम यह नहीं करेंगे. प्रोफेसर सेंडल बहुत बड़े शिक्षक हैं, लेकिन हम अपना पाठ्यक्रम स्वयं बनाएंगे और उन्होंने खुला पत्र प्रोफेसर सैंडल को लिखा कि यह हम पर लादने की कोशिश की जा रही है लेकिन हम ऐसा नहीं करना चाहते और प्रोफेसर सैंडल ने जवाब लिखा कि यह पूरी तरह से आपकी स्वतंत्रता है कि आप अपना कोर्स बनाएँ. तो यह जो करिकुलम का मामला है, उस पर भी हम थोड़ी बात करें कि क्यों यह बहुत आवश्यक है कि वह विकेंद्रित हो, डिसेंट्रलाइज्ड हो और वह दरअसल इंस्टीट्यूशन स्पेसिफिक हो. आप जिस इन्स्टिट्यूशन में हैं वहाँ करिकुलम बना रहे हैं और क्यों उसमें यूनिफॉर्मिटी हमेशा मदद नहीं करती. वह चाहे पॉलिटिकल साइंस या मैथमेटिक्स ही क्यों न हो?
प्रोफेसर पंकज चंद्र
जब करिकुलम के बारे में हम सोचते हैं तो कुछ चीजें तो हमेशा ध्यान रखते हैं कि हम उस करिकुलम से अंडरग्रेजुएट या ग्रेजुएट लेवल पर क्या क्रिटिकल हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. कुछ क्रिटिकल थिंकिंग की एबिलिटी, कुछ एनेलिटिकल एबिलिटी, कुछ कम्यूनिकेशन की एबिलिटी, कुछ इंडिपेंडेंट थिंकिंग की एबिलिटी और कुछ डिसिप्लिनरी नॉलेज कि अगर व्यक्ति उस डायरेक्शन से उसी विषय में आगे पढ़ना चाहे या उसे लेकर अपना लाइवलीहुड बनाना चाहे या नौकरी करना चाहे तो उसको डिसिप्लिनरी गहराई की जरूरत है. सो जब हम एक सिलेबस या करिकुलम बनाते हैं तो ये चीजें ध्यान रखते हैं. जो गोल्स हैं, एक डिसिप्लिन की कुछ इन्फॉर्मेशन या सब्जेक्ट की कुछ डिसिप्लिन होती है, उस सब्जेक्ट का नॉलेज सिस्टम या एक्स्प्लोरेशन होता है, यह कई ढंग से किया जा सकता है. मैं तो ऑपरेशंस मैनेजमेंट का प्रोफेसर हूँ. हम बड़े तौर पर मेन्युफैक्चरिंग, सप्लाई चेन इन सब चीजों को पढ़ाते हैं. अगर हमें कपेसिटी प्लानिंग बढ़ानी है, उसके बारे में सिखाना है तो कई ढंग से कपेसिटी प्लानिंग को बता सकते हैं, कई विषयों से उसको सिखा सकते हैं और हमारे डिसिप्लिन में जो अलग अलग विषय हैं, उनको वो चीज़ें, वो स्किल्स, वह पर्सपेक्टिव, वह डीप थिंकिंग, एनेलिटिकल एबिलिटी दी जा सकती है. एक टीचर के नाते अपने डिसिप्लिन के लिए अपने पैशन के तहत जब हम पढ़ाएंगे, तो मुझे लगता है कि क्लास का माहौल और जो रिसर्च है, वह मैं ज्यादा लाऊँगा, ज्यादा अच्छी तरह से पढ़ा सकूँगा. तो अलग-अलग कॉलेजों में जो प्रोफेसर्स हैं, जो उनके इंटेरेस्ट हैं, उनमें कुछ चीजें फंडामेंटल हैं जो सभी लोग अच्छी तरह पढ़ाते हैं.
सो करिकुलम का जो रोल है, स्टैंडर्डाइजेशन का जो रोल है, वह केवल ब्रॉड पैरामीटर डिफाइन करने का है कि देखिए जब कोई बीए, बीएससी या बीटेक के बाद ग्रेजुएट करेगा तो यह ब्रॉड नॉलेज, ये ब्रॉड स्किल्स, यह ब्रॉड पर्सपेक्टिव, यह ब्रॉड थिंकिंग उसमें होनी चाहिए. आप यूएस या यूरोप में ही क्यों न चले जाएं, आप दो अच्छे इंस्टीट्यूशन ले लीजिए. एक स्वीडन में ईपीएफएल (Swiss Federal Institute of Technology Lausanne), दूसरा स्विट्जरलैंड में ईटीएच (ETH Zürich) ले लीजिए. दोनों बड़े अच्छे इंस्टीट्यूशंस हैं. दोनों की पढ़ाई का करिकुलम अलग है. दोनों ही बैचलर ऑफ इंजीनियरिंग देते हैं, दोनों ही एक दूसरे की डिग्री को मान्यता देते हैं, दोनों ही इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में चीजें पढ़ाते हैं. लेकिन जिस ढंग से पढ़ाते हैं, वह भी अलग है. हम जो हैं किसी वजह से कॉन्टेंट पर ज्यादा केंद्रित हैं, और प्रॉसेस ऑफ लर्निंग और पैडेगॉजी को हमने बिल्कुल अलग रख दिया है. हमारे लिए content is the king जबकि कॉन्टेंट से जो लर्निंग हो रही है, जो आउटकम है, उसके ऊपर हमने फोकस नहीं किया. और दुनियाभर के इंस्टीट्यूशंस ने इसको थोड़ा सा अलग ढंग से देखा है कि कॉन्टेंट तो है ही, थोड़ा बहुत तो फंडामेंटल कॉन्टेंट सबको इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग वालों को पढ़ना है. जिन्हें इकोनॉमिक्स पढ़ना है तो उन्हें कुछ फंडामेंटल चीजें तो माइक्रो में जाननी ही पड़ेंगी लेकिन हम क्या किस कॉन्टेक्स्ट में किस किताब से किस ढंग से उसको पढ़ाते हैं. Those are the things that make it very different, make those two institutions very different. इंस्टीट्यूशनल ग्रोथ उसमें है, अपनी यूनीकनेस है. आपने जो जस्टिस वाला कोर्स कहा, कई लोग दुनियाभर में जस्टिस का कोर्स पढ़ाते होंगे. हर लॉ स्कूल में जस्टिस के ऊपर कोर्स पढ़ाया जाता होगा, लेकिन सब अलग ढंग से पढ़ाते हैं. सबके करिकुलम अलग हैं, सबके टॉपिक्स अलग हैं. तो क्यों? Why should justice be seen through one lens. जस्टिस को भी कई ढंग से देखना चाहिए. एक ही यूनिवर्सिटी में जस्टिस के कई कोर्स हो सकते हैं.
सो मुझे लगता है कि जब हम सेंट्रलाइज्ड ढंग से एक सेंट्रल पर्सपेक्टिव से एजुकेशन को देखना शुरू करते हैं और सबको समान फ्रेमवर्क में डालते हैं और फिर पुश करते हैं कि आप उसके डिटेल में उसको फॉलो करें, उसके करिकुलम, यहाँ तक कि आप किताब भी वही लीजिए और आप टॉपिक्स भी वही डिफाइन कीजिए तो कहीं न कहीं मुझे लगता है कि जो फैकल्टी का इनोवेशन है, पैशन है, उनका रिसर्च है, वह परे हो जाता है. और फिर उस स्तर पर मुझे परेशानी होती है. उसी स्तर पर एक्ज़ामिनेशन होता है और मुझे लगता है कि यह हमें एक्सेलेंस से बहुत दूर ले गया है. मुझे लगता है कि यह कंट्रोल ड्रिवेन माइंडसेट के तहत एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस पर भरोसे की कमी है. कई बार हमने लोगों को कहते सुना है, चाहे वो इंडस्ट्री में हों या दूसरी जगह हों कि education cannot be left to educationists alone. तो मैं तुरंत सवाल पूछता हूँ कि who will you leave that to? आप बच्चे को 12 साल के लिए स्कूल में भेजते हैं. तीन-चार साल के लिए यूनिवर्सिटी में भेजते हैं. वहाँ पर तो आप ट्रस्ट कर रहे हैं. तो उनकी एजुकेशन के लिए क्यों नहीं ट्रस्ट कर पाते? वेल बीइंग के लिए क्यों ट्रस्ट कर पा रहे हैं? उनके मेंटल ग्रोथ, एक्सेलेंस उनको क्यों नहीं दे पा रहे हैं. एक बार छोड़कर तो देखिए. इतने साल तक तो हम लोग यूँ ही करते आए हैं तो छोड़कर भी कुछ साल देख लें. अच्छे इंस्टीट्यूशंस में फैकल्टी को जितनी एकेडमिक फ्रीडम मिलती है, उतना ही वह इनोवेट करता है, उतना ही वह डीप एक्सपेरिमेंट करता है. उसी से मुझे लगता है कि उनकी एक्सेलेंस और स्टूडेंट की लर्निंग प्रॉसेस एक्सेलेंस की तरफ बढ़ती है.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
यह बिल्कुल ठीक है कि आपको अध्यापकों पर विश्वास करना होगा. यहाँ करिकुलम में भी वहीं सिद्धांत कारगर है, विविधता का सिद्धांत, एकरूपता और केंद्रीयता का नहीं कि आप यह कहें कि फलां विषय का पाठ्यक्रम है तो वह 80 प्रतिशत समरूप रहेगा और आप 20% अपना कुछ डाल सकते हैं. तो इस प्रकार के समीकरण से एक अच्छे पाठ्यक्रम की कल्पना आप नहीं कर सकते. इससे एक दूसरी बात निकलती है जिस पर पिछले कई वर्षों से बहुत ज़ोर दिया जा रहा है. उस पर भी हम लोग कई सालों से चर्चा करते रहे हैं. अमेरिका में जब 2011-12 में मूक्स यानी मैसिव ओपन ऑनलाइन कोर्स की चर्चा शुरू हुई और इसको एक इलाज की तरह देखा गया कि वह बड़े पैमाने पर लो क्वालिटी एजुकेशन की कमी पूरी करेगा क्योंकि स्टार प्रोफेसर्स के जरिए हम ऑनलाइन कोर्स देंगे और लोग एक्सेस करेंगे और फिर यूनिवर्सिटीज़ को भी उत्साहित किया जाएगा कि वे उसके आधार पर डिग्री दें.
मैं अब तक जो समझ पाया हूँ कि मूक्स का जो आरंभिक दंभ या उत्साह था, वह तो ठंडा पड़ गया है लेकिन भारतवर्ष में उसने तेजी पकड़ ली है और वह एक दूसरे ढंग से तेजी पकड़ी है यानी आधिकारिक रूप से भी अब यह कहा जा रहा है कि यह जो क्लासरूम टीचिंग है, जिसे आप फिजिकल टीचिंग कहते हैं, इसको कम से कम करना चाहिए. यहाँ तक कि लक्ष्य दिया गया है कि हमें उत्तरोत्तर इस दिशा में बढ़ना चाहिए कि क्लासरूम टीचिंग 30% रह जाए और 70% टीचिंग ऑनलाइन हो जाए. मुझे बहुत पहले की याद है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के एक दीक्षांत समारोह में सैम पित्रोदा आए थे और सैम पित्रोदा ने भाषण देते हुए कहा था कि अब पढ़ाई का ये तरीका बहुत पुराना पड़ गया है. अब हमें एक विषय में पाँच स्टार प्रोफेसर्स चाहिए और बाकी जगह हमें फैसिलिटेटर्स चाहिए. तो वो पाँच प्रोफेसर्स के लेक्चर ऑनलाइन हो जाएंगे और उसके बाद फैसिलिटेटर चाहिए जो छात्रों तक पहुँचा देगा क्योंकि जो आपने कहा कि हम यह मान रहे हैं कि कॉन्टेंट अपलोड हो जाएगा और उसके बाद छात्र उसको ग्रहण करेंगे. भारतवर्ष में अब इसे आधिकारिक तौर पर सुझाया जा रहा है. क्लासरूम्स में इसलिए कि यह जो शिक्षक नाम का प्राणी है, इसके चलते काफी अस्थिरता भी हो सकती है, अनिश्चितता भी हो सकती है. तो हम स्टैंडर्डाइज करेंगे और एक क्वालिटी एजुकेशन को ऑनलाइन इसमें लाएंगे. अब तो यह भी कहा जा रहा है कि हम और भी आगे बढ़ गए हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का ज़माना है तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर अब विश्वविद्यालय को ध्यान देना चाहिए. इन दो चीजों के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?
प्रोफेसर पंकज चंद्र
मुझे लग रहा है कि चाहे वह एकेडमिक ग्रुप हो या एडमिनिस्ट्रेटर्स हों, स्टेट और सिटी लेवल पर या कंट्री लेवल पर जो इस बारे में सोच रहे हैं, उनको थोड़ा इंस्टीट्यूशन और लर्निंग प्रॉसेस समझने की जरूरत है. आपने हमने सभी ने ऑनलाइन पढ़ाया है और हमने उसके थोड़े-बहुत एडवांटेज भी देखे हैं लेकिन हमारे सामने उसके डिसएडवांटेज भी बहुत ज्यादा सामने आए. हम यह हम भूल जाते हैं कि लर्निंग एक सोशियोलॉजिकल प्रॉसेस है. यह कॉन्टेंट एक्विज़िशन का प्रॉसेस नहीं है और इसीलिए मैं बार-बार कह रहा हूँ कि कॉन्टेंट पर फोकस करके हमारा विचार हो गया है कि हम एक कोर्स में चार ही चीजें क्लास में पढ़ें, लेकिन चार चीज़ को बहुत अच्छी तरह से करें, बनिस्बत 40 चीजें उस करिकुलम में डालने की कोशिश करें. एक तरफ हम बोलते हैं लाइफ लॉन्ग लर्निंग तो पूरी जिंदगी पड़ी है कि जो हमने 40 में से जो 36 चीजें नहीं पढ़ी हैं, उन्हें हम सीख लेंगे. कुछ मास्टर्स के लेवल पर सीख लेंगे, कुछ काम करते समय सीख लेंगे, कुछ सेल्फ लर्निंग से सीख लेंगे. कोई जरूरी नहीं है कि हम हर चीज़ चार साल में सीखें.
मुझे लगता है कि हम एक आत्मविश्वास से भरे व्यक्ति, एक बेहतरीन विचारक को तैयार करके समाज में लाएं और उसके लिए बहुत जरूरी है क्लासरूम. क्लासरूम मतलब चहारदीवारी नहीं, क्लासरूम मतलब collection of people, students and teachers together. वह क्लासरूम है, चाहे वो बाहर बैठे हों, अंदर बैठे हों, घर में बैठे हों, कहीं बैठे हैं मगर it’s that collection of people क्योंकि जब टीचर पढ़ा रहा है और जब किसी बच्चे ने सवाल पूछा, किसी छात्र ने, तो किसी तीसरे ने इसका जवाब दिया तो जो चौथा बच्चा है वह भी सीख रहा है उस जवाब से. जब इंडिविजुअली सीखते हैं, मूक के सामने बैठे हुए तो इस किस्म की लर्निंग जो औरों से हमें होती है, औरों के सवालों से औरों के असाइनमेंट से, औरों के प्रश्न के डिस्कशन से, औरों के जवाब के डिस्कशन से, औरों के पर्सपेक्टिव कॉन्टैक्स्ट से वह नहीं हो पाती. हर छात्र अपना कॉन्टैक्स्ट लेकर क्लास में आता है, और उस कॉन्टेस्क्स्ट के तहत सवाल का जवाब देता है, उसी कॉन्टैक्स्ट के तहत वह असाइनमेंट करता है. अगर उसका डिस्कशन करें तो मुझे लगता है कि लर्निंग बहुत ही रिच है. वह कहीं न कहीं मूक नहीं बन पा रहा है. कुछ इसमें एजुटेक कंपनी का पर्सपेक्टिव है कि वो इसको बिज़नेस के तहत देखते हैं. हम मूक के विरुद्ध नहीं जा रहे हैं. मेरे ख्याल से आज से करीब आठ-नौ साल पहले मूक की कॉन्फ्रेंस में हम लोग गए थे, यही समझने के लिए कि क्या कॉन्टेक्स्ट है. हमने वहाँ पर पूरे उत्साह से लोगों से बातें की थीं और लोगों को समझा था कि कोई अगर बच्चा अकेला किसी गाँव में या कहीं डिस्टेंट एरिया में रह रहा है, तो बेशक इसका बहुत महत्व है. It may be a value as a complement also कि अगर हम इंस्टीट्यूशनली कई चीजें नहीं पढ़ा पा रहे हैं, हमारे पास वो केपेबिलिटीज नहीं हैं, तो कॉंप्लिमेंट की तरह है. मगर जो एक क्लासरूम लर्निंग की प्राइमेसी है, उसकी वैल्यू है, अगर उसको हम हटा दें तो मुझे लगता है कि यह एजुकेशन के लिए बहुत बड़ी ट्रैजिडी होगी. कहीं न कहीं हम education and learning as a process से हटकर education as a compliance से संचालित होने वाले माहौल में चले जाएंगे. हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि जो लोग बैठकर रूल्स बना रहे हैं, वो यह नहीं समझ पा रहे हैं कि एजुकेशन और लर्निंग होती कैसे है, कैसे बच्चा सीखकर तैयार होकर निकलता है. यह करना है, इसमें पाँच कोर्स करने हैं, इस तरह के करने हैं, उसमें आप टिकमार्क कर दें तो एजुकेशन हो गया. मुझे लगता है कि इससे हमें थोड़ा हटना पड़ेगा और वह तभी हट पाएंगे जबकि हम इंस्टीट्यूशन के ऊपर फोकस करें बनिस्बत इंडीविजुअल इंस्टीट्यूशन के. मुझे लगता है कि नई प्रणाली चाहें एनईपी हो, चाहे कोई और इन्नोवेटिव थिंकिंग वाले प्रॉसेस हों, इंडीविजुअल इंस्टीट्यूशन के ऊपर फोकस करना पड़ेगा कि वो कैसे लागू करते हैं, वो कैसे अपने सोच में उसको लागू करते हैं. तब जाकर वहाँ ओनरशिप भी होती है, तब जाकर वहाँ पर फैकल्टी शामिल होती है, तब वहाँ जाकर नए असाइनमेंट भी बनते हैं, नए उदाहरण निकलकर आते हैं और वहाँ पर जो स्टूडेंट ज्यादा सीखता है. मूक के मामले में मुझे लग रहा है कि बहुत सारी चीजें जिसकी केपेबिलिटीज एक इंस्टीट्यूशन में अगर नहीं हैं तो एक मेकेनिज्म बना है कि चलिए हम वहाँ से भी पढ़ सकते हैं लेकिन रेग्युलर क्लास का सब्स्टिट्यूट नहीं है.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
एक तर्क यह भी दिया जाता है कि जब कुछ साल पहले इसकी चर्चा शुरू हुई कि दरअसल, यह जो टीचर ड्रिवन क्लासरूम प्रॉसेस है, टीचर की टिरेनी है
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, टीचर तय कर रहा है, तो अब हम छात्र को उससे आजाद कर रहे हैं, छात्र को हम यह आजादी दे रहे हैं कि उनके सामने इतनी सारी चीजें हैं, उनमें से वो चुनाव कर लें और चुनाव करके अपना बुके खुद बनाएं. अब यह बात सुनने में बहुत आकर्षक लगती है क्योंकि तर्क जनतांत्रिक तर्क है, जिसमें आप छात्र को स्वतंत्र कर रहे हैं शिक्षक से और छात्र को अवसर दे रहे हैं कि वह अपना पाठ्यक्रम स्वयं तैयार करें, अपने लेक्चर्स स्वयं तैयार कर लें. तो इस जनतांत्रिक तर्क के खतरे क्या हैं?
प्रोफेसर पंकज चंद्र
एजुकेशन के परिप्रेक्ष्य में किसी को तैयार करने का यह तो बहुत ही कमजोर तर्क है that a student should have a choice is a good idea by itself क्योंकि हर स्टूडेंट चाहता है कि वह किस ढंग से कुछ चीजें और सीख सके. But it is no substitute for a certain body of knowledge. दूसरी चीज़ है कि कौन वह चॉइस, कौन वह बुके तय करेगा, कौन डिफाइन करेगा कि उस बुके में किस किस्म के फूल रखे जाएंगे. तो वह डिसिशन उसी का हो सकता है जो उस डिसिप्लिन में उस कॉन्टेक्स्ट में, उस एजुकेशनल एनवायरनमेंट से बहुत सालों तक जुड़ा हुआ है और समझता है कि एक स्टूडेंट जो क्लास 12 के बाद यूनिवर्सिटी में आ रहा है या मास्टर्स में आ रहा है, उसको क्या जरूरत है? यह भी सही है कि बहुत जगह हम यह डिसीशन मेकिंग क्योंकि सेंट्रलाइज कर देते हैं तो दुनिया जैसे बदल रही है, जो उसकी जरूरत है, वह हम नहीं लाते. ऐसे वो भी एक सही आलोचना है पर उसको ठीक करने के लिए there is no such thing tyranny of a teacher. टीचर का तो रोल है कॉन्टेक्स्ट देकर संवाद कराना in very deep reflective mode. टीचर का तो ये काम है कि किस ढंग से हम सवाल ऐसे उठा सकें और ऐसा डाइवर्ट सोच क्लास में ला सकें कि बच्चा अपने आप खोज सके. यह तो टीचर का काम है.
तो मुझे लगता है कि जो दुनिया भर में चुनाव दिए जाते हैं वो किसी अलग वजह से दिए जाते हैं. वो टीचर को खत्म करने के लिए नहीं हैं, टीचर ही चुनाव देता है कि आप अपने को ब्रॉडली एजुकेट कीजिए. अपने और जगह के आइडियाज लेकर आइए. जब पेंडेमिक हुआ तो तय हुआ कि किस ढंग से किस तरह वायरस 6.5 फ़ीट यात्रा करता है और अगर हम 6.5 फ़ीट दूर रहेंगे तो शायद हमें इन्फेक्शन नहीं होगा. तो तमाम एटमॉस्फेरिक साइंटिस्ट, एयरोसोल एक्स्पर्ट उसके ऊपर शोध कर रहे थे लेकिन उन्होंने एक हिस्टरी के पीएचडी स्टूडेंट को पकड़ा कि आप जरा हमारे 100 साल के पेपर्स को देखिए, उनमें से निकालिए कि कैसे रिसर्च हुआ.
मैं जिस बात पर जोर देना चाहता हूँ वह यह कि जो ब्रॉड एजुकेशन चॉइस का एक तात्पर्य है कि हम किस तरह एक डोमेन के आइडिया को दूसरे में लाकर अपनी लर्निंग को एनरिच कर सकें. इसका यह मतलब नहीं है कि हम फ्री फॉर ऑल करके डिफाइन कर दें कि जो छात्र है उस कुछ भी ले ले. ले सकता है लेकिन तब एक्स्पर्टीज वाला ऑब्जेक्टिव शायद ही हो. हो सकता है कि ब्रॉड एजुकेशन लेकर छात्र जा सके और हो सकता है कि वही उस स्टूडेंट का ऑब्जेक्टिव हो एजुकेशन. लेकिन वह चॉइस देने के लिए टीचर को और इंस्टीट्यूशन को आपको ऑटोनॉमी या राइट देना पड़ेगा कि किस ढंग से उस चॉइस को बनाया जा सके? सो कहीं न कहीं हम दुनिया से आइडियाज़ ले रहे हैं लेकिन क्यों वो आइडियाज़ लिए गए हैं, वह नहीं समझ पा रहे हैं. किसी दूसरी प्रॉब्लम का सॉल्यूशन बनाकर उसको पेश कर रहे हैं. तो एजुकेशन डीप और ब्रॉड दोनों है और आज के समय में जो इंटरडिसिप्लिनरी एजुकेशन है, वह भी बहुत जरूरी है. Because it makes your deep deeper. वह आपको छितर-बितर के सोचने के लिए नहीं, वह तो आपको केंद्रित कर रहा है कि आप किस ढंग से बहुत आइडियाज को एक सेंट्रलाइज्ड एरिया में लाकर सोच को और अपने डिसिप्लिन में अच्छे सवाल पूछ सकें. वो उस चीज़ की ट्रेनिंग है. सोसाइटी की ओर चीजें हैं जो आप जान सकें. तो मुझे लगता है कि इस आइडिया को हम कंप्लाएंस के रूप में न लें बल्कि एक ब्रॉड एजुकेशनल डेवलपमेंट ऑफ पर्सपेक्टिव के तहत लें. इसके डेवेलपमेंट की जिम्मेदारी अगर फैकल्टी नहीं लेगी तो कौन लेगा? क्या स्टेट के एजुकेशन डिपार्टमेंट डिफाइन करेंगे? तो फिर वो पढ़ा भी लें.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
एजुकेशन डिपार्टमेंट के लोगों की बात तो अलग है, लेकिन हमारी बातचीत की शुरुआत में आपने एक शब्द का इस्तेमाल किया था स्लो कुकिंग. मैं रसोई के सामने बैठा हुआ हूँ और मैं जानता हूँ कि बहुत सारी चीजें धीमी आंच पर पकती हैं. आप अगर आंच तेज कर देंगे तो वो जल जाएंगी, खराब हो जाएंगी और इसलिए पकाने वालों को पता है कि कौन सी चीज़ धीमी आंच पर पकेगी, किसको बिल्कुल तेज कर देना है. और कम से कम यह प्रक्रिया जिसको आपने कहा पाठ्यक्रम की प्रक्रिया यह धीमी आंच की प्रक्रिया है और इसलिए पाठ्यक्रम जब बदलते भी हैं तो एक लंबी प्रक्रिया के तहत बदलते हैं. लेकिन भारतवर्ष में कई वर्षों से हमने नीति निर्माताओं को देखा है कि वो उसमें खासी हड़बड़ी करना चाहते हैं यानी तीन महीने में सिलेबस बदला जा सकता है. फिर अगले साल उसका पूरा ढांचा बदल दिया जा सकता है, फिर उसके अगले साल और ढांचा बदल दिया जा सकता है और हम पिछले सात-आठ वर्षों में देखें तो जो केंद्रीय संस्था है उसकी तरफ से एक के बाद एक अनेक ढांचे प्रस्तावित किए गए हैं जिसने खासी अराजकता पैदा कर दी है और नीति निर्माताओं की यह समझ बन गई है कि सिलेबस क्या चीज़ है, यह तो तीन महीने में बन सकता है, यह तो दो दिन में बन सकता है. मुझे याद है दिल्ली विश्वविद्यालय में जब कई वर्ष पहले चार साल के स्नातकस्तरीय पाठ्यक्रम को कहा गया कि इसको लागू कर दिया जाएगा और वह तीन महीने में लागू कर दिया गया तो ऑक्सफोर्ड या केंब्रिज विश्वविद्यालय की शायद प्रेसिडेंट आई हुई थीं, उन्होंने कहा कि I admire you because you have achieved this feat and it takes years what you have done in three months. इसको लोगों ने यहाँ तारीफ के रूप में देखा. तो इस पर आप क्या कहना चाहेंगे? Why it is slow cooking and why syllabus is not something which you can change year after year. हर तीन महीने पर या चार महीने पर या दो दिन में वह क्यों नहीं बन सकता है?
प्रोफेसर पंकज चंद्र
मुझे लगता है कि पिछले 20-25 साल में हमारे समाज में जिस इकोनॉमिक मॉडल ने जगह बनाई है, उससे एक तो बड़ी असंतुष्टि इंडस्ट्री वालों ने जताई है कि ये यूनिवर्सिटी तैयार नहीं हैं. ये यूनिवर्सिटीज़ बदलाव नहीं कर रही हैं, ये ठीक से ग्रेजुएट नहीं कर रहे हैं. कहीं वह बात थोड़ी सच भी है कि यूनिवर्सिटीज़ बहुत सारी चीजें बदलने में थोड़ी खामोश रहती हैं लेकिन इंडस्ट्री या ब्यूरोक्रेसी का किसी आयडिया को लाने का जो तरीका है वह बड़ा टॉप डाउन है. एक सीईओ ने, एक सेक्रेटरी ने किसी मिनिस्टर साहब ने कहा कि यह होना चाहिए. अब वह टॉप डाउन होकर नीचे चले आए. एजुकेशन बिल्कुल इसके विपरीत रहा है. एजुकेशन तो बिल्कुल बॉटम अप प्रॉसेस है और यह बदलाव के मामले में हमेशा स्लो शिप रही है और तभी एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस 700-800 साल तक एक्सेलेंस को बनाए रहे और बाकी इंडस्ट्रीज 150 साल में 75 साल में बंद हो जाती हैं. सरकारें हैं, मिनिस्ट्रीज हैं, वो भी आती हैं-जाती हैं. सो, उसका रीज़न यही है कि एक लॉन्ग टर्म एक्सेलेंस बनाए रखने के लिए आपको लॉन्ग टर्म फिलोसॉफिकल मूरिंग को पकड़कर रखना पड़ता है. जो नए फैकल्टी आ रहे हैं, नए एडमिनिस्ट्रेटर्स यूनिवर्सिटी में आ रहे हैं, उनको उनके बारे में बताना पड़ता है, उसके साथ उनको उस प्रॉसेस में लाना पड़ता है.
इस प्रॉसेस में बड़ा समय लगता है. एक नए इंस्टीट्यूशन से एक साल में हमने 40 लोगों को एक स्कूल में लिया. बार-बार अलग-अलग कल्चर से वह आ रहे हैं. किस ढंग से आप अपने कल्चरल फिलोसॉफिकल मोरिंग में, वैल्यूज़ में उनको डालेंगे और इसके लिए समय चाहिए. एक बार जब उसमें आते हैं तो फिर सोच होती है यानी एजुकेशनल प्रॉसेस कोई इंप्लीमेंटेशन नहीं है. इंप्लीमेंटेशन के पहले तो सोच का प्रॉसेस है. करिकुलम एक सोच का, डिस्कशन का प्रॉसेस है कि आज के समय में चैट जीपीटी4 जो आया है, इसको एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में किस तरह से शामिल करें? कैसे इसके साथ हम डील करें? एक तरफ तो है कि हम एग्जाम देना चाहते हैं जिसमें हम ओपन बुक, पेपर्स और इन्ट्रोस्पेक्टिव राइटिंग और थिंकिंग के बारे में बात करते हैं और दूसरी तरफ चैट जीपीटी. तो एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन बहुत एक्सपेरिमेंट करते हैं. छोटे-छोटे बहुत सारे एक्सपेरिमेंट करते हैं, उससे सीखते हैं, फिर उसको कार्यक्रम में लाते हैं और जब ज्यादातर फैकल्टी को साथ लेकर चलते हैं तो यह होगा कि इसको वो अच्छे ढंग से लागू कर सकेंगे. यह टॉप डाउन प्रॉसेस ही नहीं है. उसमें एक और भी बात कि एजुकेशन तो कलेक्टिव विज्डम का प्रॉसेस है कि हम कई लोगों की सोच को साथ लेकर, उनके विचारों को इक्वेट करते हुए, सबको एक दूसरे से कन्विंस करते हुए चलते हैं.
It’s a convincing process, it is not an authoritarian process you try to persuade and convince your colleagues to your arguments. That is learning. जितने भी एजुकेशनल साइकोलॉजिस्ट रहे हैं, उन्होंने सबने यही बात कही है. It is not an authoritarian process and once you are able to persuade likelihood is much higher that idea will be taken to its absolutely best levels और जिन इंस्टीट्यूशंस ने दुनिया भर में किया है, उन्होंने लंबे समय तक एक्सेलेंस को बरकरार रखा. हालाँकि वो धीमे जरूर रहे हैं. कभी-कभी समाज की ओर से उनकी आलोचना वाजिब है कि आप जल्दी रिएक्ट नहीं करते. लेकिन यह भी सोचने की बात है कि educational institutions are making lives of larger people. उस परिस्थिति को सोचें कि हर साल हम पूरा करिकुलम स्ट्रक्चर ही बदलते चले आ रहे हैं. हमें पता ही नहीं रहेगा किस किस्म के ग्रेजुएट निकलकर आ रहे हैं? वो तो स्लो प्रॉसेस होनी ही है जिससे कि हम stability of the thinking in the student in a faculty बनाएँगे लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि जो बदलाव बाहर हो रहे हैं, वो हम अंदर न लाएं, उसको रोककर रखें. मुझे लगता है कि एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस को थोड़ा बहुत जरूर बदलाव करना चाहिए.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
इसी से जुड़ा हुआ एक प्रश्न. आपने इंडस्ट्री का ज़िक्र किया. 2008-09-10 में जब हम लोग साथ में यशपाल समिति के साथ काम कर रहे थे, तो उस वक्त अक्सर यह शिकायत हम नौकरशाहों से सुनते थे कि इंडस्ट्री की यह शिकायत है कि आपकी यूनिवर्सिटी एम्प्लाएबल ग्रेजुएट पैदा नहीं कर रही है. आपके जो ग्रेजुएट्स हैं, वो एम्प्लॉएबल नहीं हैं. इस पर मैंने जितना अध्ययन किया जनरल एजुकेशन और एम्प्लाएबिलिटी के बीच रिश्ते का, तो कहीं भी एम्प्लाएबिलिटी को एक मकसद मानकर जनरल एजुकेशन की कल्पना नहीं की जाती है या उसको डिजाइन नहीं किया जाता लेकिन यह शिकायत लोगों को समझ में आती है. लोग इससे काफी सहमत होते हैं कि हाँ, आखिर आपका काम एम्प्लाएबिलिटी पैदा करना है, अगर आप वो नहीं कर रहे हैं तो फिर आपके होने का मतलब ही क्या है? तो इस आरोप के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?
प्रोफेसर पंकज चंद्र
उसमें थोड़ा सा तो थोड़ा सा तथ्य है. कुछ तो उसमें रिएलिटी जरूर है लेकिन मुझे लगता है बहुत छोटी सी. मेरे हिसाब से preparing for livelihood is also a purpose of education, one of the multiple purposes. Being a better citizen is also an important purpose of education. सो मुझे लगता है कि अगर एक स्टूडेंट निकलकर आ रहा है, वह आज के बदले हुए माहौल में अगर कुछ ऐसी स्किल्स या माइंडसेट लेकर नहीं निकल रहा है, तो मुझे लगता है कि उसको खुद को दिक्कत होगी नौकरी मिलने में. अब इसे कुछ देर के लिए अलग रख दें. हिंदुस्तान यूनीलीवर एक कंपनी है जिसे मेरे ख्याल से भारत के इंडस्ट्रियल वर्ल्ड में बहुत माना जाता है. वहाँ मैनेजरों के लिए एक साल की ट्रेनिंग होती थी. That was absolutely amazing. यही इंडस्ट्री जो अभी शिकायत कर रही है, पहले ये अपने नए एम्प्लॉई की ट्रेनिंग में बहुत समय लगाते थे. उनके साथ तीन महीने से लेकर एक साल तक की ट्रेनिंग करते थे. उनको अपने काम करने के तरीके, अपनी टेक्नोलॉजी, अपने सिस्टम्स प्रॉसेस के साथ अवगत कराते थे, उनको वो चीजें सिखाते थे. तो जो स्टूडेंट ग्रेजुएट निकलकर आ रहा है, जो एक ब्रॉड पर्सपेक्टिव लेकर आ रहा है, उसकी इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग होती थी.
आज के समय में without fail most of these institutions want an oven ready graduate कि वह जिस दिन घुसे उस दिन से वह उनके सिस्टम सीखने लग जाए. इसलिए अब वो पुश कर रहे हैं कि इंडस्ट्री-रेडी ट्रेनिंग को एजुकेशन में डाला जाए और मुझे लगता है कि यह बहुत गड़बड़ है. यह हमारे एजुकेशन सिस्टम को बहुत वीक करेगी. यहाँ तक कि हो गया है कि आज के समय में कई कंपनियां इंटर्नशिप के लिए बच्चों को लास्ट सेमेस्टर में ले लेती हैं. लास्ट दो सेमेस्टर में इंजीनियरिंग में ले लेती हैं और कहती हैं कि हमारे यहाँ काम करना शुरू कर दो. तो उसकी तो एजुकेशन ही तीन साल की रह गई. और एक साल आपको इंटर्न की तरह स्टाइपंड देंगे. एक साल बाद आपको अच्छी सैलरी दे देंगे. सो मुझे लग रहा है कि जो इंडस्ट्री हैं, इन्होंने अपनी जिम्मेदारी थोड़ी हटा ली. कुछ चीजें या स्किल्स जरूरी हैं जो हमें जरूर सिखानी चाहिए to make them ready but getting them to be industry ready की जो ये बात करते हैं, I think it’s a major fallacy और इसका लंबे समय में नतीजा यह होगा कि जो बच्चे निकलकर आएँगे, इनकी किसी भी डिसिप्लिन में कॉन्सेप्चुअल नॉलेज, इनकी एबिलिटी टु अप्लाय और डीप इंटलेक्चुअल थिंकिंग बड़ी कमजोर रहेगी. कई साल पहले मैंने एक सर्वे किया था. मैं हर पाँच साल पर कॉम्पिटीटिवनेस और मैन्युफैक्चरिंग का सर्वे करता था.
यह करीब सात-आठ साल पहले की बात है. Barely an average expenditure on training of an employee in many of the firms was less than 4000 rupees. सो मुझे लग रहा है कि अब हमें इंडस्ट्री के साथ बात करने की जरूरत है. एकेडमिक्स को इंडस्ट्री के साथ इंगेज करने की जरूरत है और उनकी बात समझने की जरूरत है, उनको समझाने की भी जरूरत है कि यह आपके लिए ही फायदेमंद है. उनका प्रॉब्लम है कि आज के समय खासकर जो बहुत सारे इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूशन आए हैं जहाँ पर एजुकेशन के नाम पर बहुत कम ही कुछ होता है और वहाँ से जो ग्रेजुएट निकलते हैं, उनकी किसी किस्म की तैयारी नहीं होती.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
यह चर्चा कि इंडस्ट्री यह चाहती है कि उसे बिल्कुल अवन रेडी ग्रेजुएट दिए जाएं ताकि आएं और वो बस शुरू हो जाएं और जो समझ की गहराई जिसको बार-बार यशपाल कहते थे कि असल चीज़ है समझ. कि आपके पास समझने की ताकत पैदा होना बहुत ज़रूरी है और इस संबंध में जो मैं लिटरेचर देख रहा था, एम्प्लाएबिलिटी और जनरल एजुकेशन. तो जनरल एजुकेशन का मकसद तो उस समझ को पैदा करना है और उस लचीलेपन को पैदा करना है. जो अलग-अलग माहौल में आपको रहने के लिए तैयार करती है, उस लचीलेपन के बिना यह नहीं हो सकता है और वह जनरल एजुकेशन ही दे सकती है. एक तरह की गलतफहमी है जिसका बहुत ज़ोर और फैशन पिछले कुछ वर्षों में बढ़ा है, यह है कि हम स्किलबेस्ड एजुकेशन करेंगे. और इसलिए स्किल शब्द बहुत फैशनेबल हो गया है. हालाँकि अभी मुझे एक स्नातक स्तर पर पहले सेमेस्टर का छात्र मिला था, तो उसने कहा कि सर हमें जो स्किल बेस्ड कोर्स पढ़ाया जा रहा है, उसमें भी कुछ स्किल जैसा तो नहीं है. वह भी सिर्फ पढ़ा रहे हैं. तो यह तो एक अलग मामला है जो हमारे मित्र कृष्ण कुमार कहते हैं कि हम किसी भी चीज़ को लाकर भारत में उसका थर्डवर्ल्डिज्म कर देते हैं तो थर्ड वर्ल्डीफिकेशन कर देते हैं यानी अधकचरापन आ जाता है. तो हम बोलते रहते हैं स्किल लेकिन कंप्यूटर भी हम पढ़ाते हैं, तो पढ़ाते हैं, कंप्यूटर कर नहीं पाते.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
इसी से जुड़ा हुआ एक प्रश्न. आपने इंडस्ट्री का ज़िक्र किया. 2008-09-10 में जब हम लोग साथ में यशपाल समिति के साथ काम कर रहे थे, तो उस वक्त अक्सर यह शिकायत हम नौकरशाहों से सुनते थे कि इंडस्ट्री की यह शिकायत है कि आपकी यूनिवर्सिटी एम्प्लाएबल ग्रेजुएट पैदा नहीं कर रही है. आपके जो ग्रेजुएट्स हैं, वो एम्प्लॉएबल नहीं हैं. इस पर मैंने जितना अध्ययन किया जनरल एजुकेशन और एम्प्लाएबिलिटी के बीच रिश्ते का, तो कहीं भी एम्प्लाएबिलिटी को एक मकसद मानकर जनरल एजुकेशन की कल्पना नहीं की जाती है या उसको डिजाइन नहीं किया जाता लेकिन यह शिकायत लोगों को समझ में आती है. लोग इससे काफी सहमत होते हैं कि हाँ, आखिर आपका काम एम्प्लाएबिलिटी पैदा करना है, अगर आप वो नहीं कर रहे हैं तो फिर आपके होने का मतलब ही क्या है? तो इस आरोप के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?
प्रोफेसर पंकज चंद्र
उसमें थोड़ा सा तो थोड़ा सा तथ्य है. कुछ तो उसमें रिएलिटी जरूर है लेकिन मुझे लगता है बहुत छोटी सी. मेरे हिसाब से preparing for livelihood is also a purpose of education, one of the multiple purposes. Being a better citizen is also an important purpose of education. सो मुझे लगता है कि अगर एक स्टूडेंट निकलकर आ रहा है, वह आज के बदले हुए माहौल में अगर कुछ ऐसी स्किल्स या माइंडसेट लेकर नहीं निकल रहा है, तो मुझे लगता है कि उसको खुद को दिक्कत होगी नौकरी मिलने में. अब इसे कुछ देर के लिए अलग रख दें. हिंदुस्तान यूनीलीवर एक कंपनी है जिसे मेरे ख्याल से भारत के इंडस्ट्रियल वर्ल्ड में बहुत माना जाता है. वहाँ मैनेजरों के लिए एक साल की ट्रेनिंग होती थी. That was absolutely amazing. यही इंडस्ट्री जो अभी शिकायत कर रही है, पहले ये अपने नए एम्प्लॉई की ट्रेनिंग में बहुत समय लगाते थे. उनके साथ तीन महीने से लेकर एक साल तक की ट्रेनिंग करते थे. उनको अपने काम करने के तरीके, अपनी टेक्नोलॉजी, अपने सिस्टम्स प्रॉसेस के साथ अवगत कराते थे, उनको वो चीजें सिखाते थे. तो जो स्टूडेंट ग्रेजुएट निकलकर आ रहा है, जो एक ब्रॉड पर्सपेक्टिव लेकर आ रहा है, उसकी इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग होती थी.
आज के समय में without fail most of these institutions want an oven ready graduate कि वह जिस दिन घुसे उस दिन से वह उनके सिस्टम सीखने लग जाए. इसलिए अब वो पुश कर रहे हैं कि इंडस्ट्री-रेडी ट्रेनिंग को एजुकेशन में डाला जाए और मुझे लगता है कि यह बहुत गड़बड़ है. यह हमारे एजुकेशन सिस्टम को बहुत वीक करेगी. यहाँ तक कि हो गया है कि आज के समय में कई कंपनियां इंटर्नशिप के लिए बच्चों को लास्ट सेमेस्टर में ले लेती हैं. लास्ट दो सेमेस्टर में इंजीनियरिंग में ले लेती हैं और कहती हैं कि हमारे यहाँ काम करना शुरू कर दो. तो उसकी तो एजुकेशन ही तीन साल की रह गई. और एक साल आपको इंटर्न की तरह स्टाइपंड देंगे. एक साल बाद आपको अच्छी सैलरी दे देंगे. सो मुझे लग रहा है कि जो इंडस्ट्री हैं, इन्होंने अपनी जिम्मेदारी थोड़ी हटा ली. कुछ चीजें या स्किल्स जरूरी हैं जो हमें जरूर सिखानी चाहिए to make them ready but getting them to be industry ready की जो ये बात करते हैं, I think it’s a major fallacy और इसका लंबे समय में नतीजा यह होगा कि जो बच्चे निकलकर आएँगे, इनकी किसी भी डिसिप्लिन में कॉन्सेप्चुअल नॉलेज, इनकी एबिलिटी टु अप्लाय और डीप इंटलेक्चुअल थिंकिंग बड़ी कमजोर रहेगी. कई साल पहले मैंने एक सर्वे किया था. मैं हर पाँच साल पर कॉम्पिटीटिवनेस और मैन्युफैक्चरिंग का सर्वे करता था.
यह करीब सात-आठ साल पहले की बात है. Barely an average expenditure on training of an employee in many of the firms was less than 4000 rupees. सो मुझे लग रहा है कि अब हमें इंडस्ट्री के साथ बात करने की जरूरत है. एकेडमिक्स को इंडस्ट्री के साथ इंगेज करने की जरूरत है और उनकी बात समझने की जरूरत है, उनको समझाने की भी जरूरत है कि यह आपके लिए ही फायदेमंद है. उनका प्रॉब्लम है कि आज के समय खासकर जो बहुत सारे इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूशन आए हैं जहाँ पर एजुकेशन के नाम पर बहुत कम ही कुछ होता है और वहाँ से जो ग्रेजुएट निकलते हैं, उनकी किसी किस्म की तैयारी नहीं होती.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
यह चर्चा कि इंडस्ट्री यह चाहती है कि उसे बिल्कुल अवन रेडी ग्रेजुएट दिए जाएं ताकि आएं और वो बस शुरू हो जाएं और जो समझ की गहराई जिसको बार-बार यशपाल कहते थे कि असल चीज़ है समझ. कि आपके पास समझने की ताकत पैदा होना बहुत ज़रूरी है और इस संबंध में जो मैं लिटरेचर देख रहा था, एम्प्लाएबिलिटी और जनरल एजुकेशन. तो जनरल एजुकेशन का मकसद तो उस समझ को पैदा करना है और उस लचीलेपन को पैदा करना है. जो अलग-अलग माहौल में आपको रहने के लिए तैयार करती है, उस लचीलेपन के बिना यह नहीं हो सकता है और वह जनरल एजुकेशन ही दे सकती है. एक तरह की गलतफहमी है जिसका बहुत ज़ोर और फैशन पिछले कुछ वर्षों में बढ़ा है, यह है कि हम स्किलबेस्ड एजुकेशन करेंगे. और इसलिए स्किल शब्द बहुत फैशनेबल हो गया है. हालाँकि अभी मुझे एक स्नातक स्तर पर पहले सेमेस्टर का छात्र मिला था, तो उसने कहा कि सर हमें जो स्किल बेस्ड कोर्स पढ़ाया जा रहा है, उसमें भी कुछ स्किल जैसा तो नहीं है. वह भी सिर्फ पढ़ा रहे हैं. तो यह तो एक अलग मामला है जो हमारे मित्र कृष्ण कुमार कहते हैं कि हम किसी भी चीज़ को लाकर भारत में उसका थर्डवर्ल्डिज्म कर देते हैं तो थर्ड वर्ल्डीफिकेशन कर देते हैं यानी अधकचरापन आ जाता है. तो हम बोलते रहते हैं स्किल लेकिन कंप्यूटर भी हम पढ़ाते हैं, तो पढ़ाते हैं, कंप्यूटर कर नहीं पाते.
एक तरह से अपने आपके साथ धोखेबाजी है. अगर हम इस बातचीत को आज के लिए पूर्णता देने की कोशिश करें तो आपने एक उद्देश्य का उल्लेख किया जो विश्वविद्यालयों का प्रमुख उद्देश्य है और अपने कहा कि नागरिकता की शिक्षा प्राप्त करना और यह नागरिकता की शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि हम लोग एक समाज बनना चाहते हैं जो उत्तरदायित्वपूर्ण समाज है और जिसमें सामूहिकता का बोध है. नागरिकता का मतलब है अपने अधिकार का बोध और दूसरे अधिकारों का बोध यानी दूसरों के अधिकारों को हासिल करने में भी आप उनकी मदद कर सकें. तो ऐसी प्रक्रियाएं फिर विश्वविद्यालयों को विकसित करनी पड़ती हैं, जो समुदाय विश्वविद्यालय में नहीं आ पाए थे, वे आ पाएं, आप उनके लिए जगह बना पाएं. जैसे जेएनयू का आपने ज़िक्र किया और यह फैकल्टी में भी और स्टूडेंट में भी. तो यह जो लर्निंग फॉर सिटिजनशिप है या नागरिकता है इसके लिए और कौन सी प्रक्रियाएं या किस प्रकार का माहौल विश्वविद्यालय में होना चाहिए?
प्रोफेसर पंकज चंद्र
मुझे लगता है कि मुझे आपको एक उदाहरण देकर यह बात बतानी पड़ेगी क्योंकि हमने अहमदाबाद यूनिवर्सिटी में इसके बारे में काफी सोच विचार किया कि कैसे उसको ला सकें. यह एक ही उदाहरण है पर मुझे लगता है बहुत तरीके से हो सकता है. तो हमने दो प्रॉसेस सोचे. एक तो यह कि उन विषयों के साथ स्टूडेंट्स को इंगेज कराया जाए जिससे उनकी नागरिकता की समझ बढ़े. हमने उसको फाउंडेशन प्रोग्राम का नाम दिया और कहा कि इसमें let’s work with grand challenges, water, climate challenge, democracy, injustice, neighbourhood जो एक अर्बनाइजेशन का प्रॉक्सी रहा है. इसके अंदर हम थोड़ा अलग पैडागाजी, ओरिएंटेशन के साथ प्रोजेक्ट के तहत आपको सोसाइटी के उन पहलुओं के साथ जुड़ने के लिए मजबूर करते हैं जिससे आप वहाँ क्या हो रहा है, कैसे वहाँ के लिए आप समाधान निकालेंगे, कैसे अपनी एजुकेशन को नए आइडियाज़ डेवलप करने में लगाएंगे ताकि आप थोड़ा सा अपने अधिकार, औरों के अधिकार, अपना कर्तव्य, औरों का कर्तव्य, इस कॉन्टेक्स्ट में समझ सकें. दूसरी चीज़ है कि हर क्लास में, हर कोर्स में, हर पेपर में अगर हम कहीं न कहीं इसका कॉन्वर्सेशन हो कि इसका इंप्लिकेशन क्या है लार्जर सोसाइटी के लिए. हम कंप्यूटर साइंस पढ़ रहे हैं, नए ऐल्गोरिदम डेवेलप कर रहे हैं, चैट जीपीटी का एनालिसिस कर रहे हैं. उसके साथ-साथ अगर हम टेक्नोलॉजी का समाज में एप्लिकेशन क्या है, इसे कोर्स के तहत ही डिस्कस करें, तो मुझे लगता है कि जरूर ऐसे सवाल उठेंगे जिससे एक यंग स्टूडेंट यह समझ सकेगा कि समाज में उसका रोल क्या है. तीसरा है कि हमें छात्रों को चीजें करने की फ्रीडम देनी पड़ेगी कि वो अपने ढंग से, अपने माध्यम से, अपने मेकेनिज्म से जो सोसाइटी में चीजें हो रही हैं, कॉन्स्टिट्यूशन क्या है, सिविलाइज़ेशन क्या है, एक डायवर्स सोसाइटी का होना क्या है, मेजॉरिटी-माइनॉरिटी का मतलब क्या है, उसे अपने आप समझने की प्रॉसेस को प्रोत्साहित करने की जरूरत है. अब वो अपने ढंग से करेंगे. उसको हमें गाइड करने की भी जरूरत नहीं होगी और उसमें डिबेट होगा, उसमें कॉन्फ्लिक्ट होगा, उसमें कन्वर्सेशन होगा.
प्रोफेसर पंकज चंद्र
मुझे लगता है कि मुझे आपको एक उदाहरण देकर यह बात बतानी पड़ेगी क्योंकि हमने अहमदाबाद यूनिवर्सिटी में इसके बारे में काफी सोच विचार किया कि कैसे उसको ला सकें. यह एक ही उदाहरण है पर मुझे लगता है बहुत तरीके से हो सकता है. तो हमने दो प्रॉसेस सोचे. एक तो यह कि उन विषयों के साथ स्टूडेंट्स को इंगेज कराया जाए जिससे उनकी नागरिकता की समझ बढ़े. हमने उसको फाउंडेशन प्रोग्राम का नाम दिया और कहा कि इसमें let’s work with grand challenges, water, climate challenge, democracy, injustice, neighbourhood जो एक अर्बनाइजेशन का प्रॉक्सी रहा है. इसके अंदर हम थोड़ा अलग पैडागाजी, ओरिएंटेशन के साथ प्रोजेक्ट के तहत आपको सोसाइटी के उन पहलुओं के साथ जुड़ने के लिए मजबूर करते हैं जिससे आप वहाँ क्या हो रहा है, कैसे वहाँ के लिए आप समाधान निकालेंगे, कैसे अपनी एजुकेशन को नए आइडियाज़ डेवलप करने में लगाएंगे ताकि आप थोड़ा सा अपने अधिकार, औरों के अधिकार, अपना कर्तव्य, औरों का कर्तव्य, इस कॉन्टेक्स्ट में समझ सकें. दूसरी चीज़ है कि हर क्लास में, हर कोर्स में, हर पेपर में अगर हम कहीं न कहीं इसका कॉन्वर्सेशन हो कि इसका इंप्लिकेशन क्या है लार्जर सोसाइटी के लिए. हम कंप्यूटर साइंस पढ़ रहे हैं, नए ऐल्गोरिदम डेवेलप कर रहे हैं, चैट जीपीटी का एनालिसिस कर रहे हैं. उसके साथ-साथ अगर हम टेक्नोलॉजी का समाज में एप्लिकेशन क्या है, इसे कोर्स के तहत ही डिस्कस करें, तो मुझे लगता है कि जरूर ऐसे सवाल उठेंगे जिससे एक यंग स्टूडेंट यह समझ सकेगा कि समाज में उसका रोल क्या है. तीसरा है कि हमें छात्रों को चीजें करने की फ्रीडम देनी पड़ेगी कि वो अपने ढंग से, अपने माध्यम से, अपने मेकेनिज्म से जो सोसाइटी में चीजें हो रही हैं, कॉन्स्टिट्यूशन क्या है, सिविलाइज़ेशन क्या है, एक डायवर्स सोसाइटी का होना क्या है, मेजॉरिटी-माइनॉरिटी का मतलब क्या है, उसे अपने आप समझने की प्रॉसेस को प्रोत्साहित करने की जरूरत है. अब वो अपने ढंग से करेंगे. उसको हमें गाइड करने की भी जरूरत नहीं होगी और उसमें डिबेट होगा, उसमें कॉन्फ्लिक्ट होगा, उसमें कन्वर्सेशन होगा.
मुझे लगता है कि उससे हो सकता है कि आज नहीं, आज से पाँच साल बाद वही ग्रेजुएट की समझ जब सही स्तर पर पहुँचेगी, तो वह जरूर उस एक्सपीरियंस से थोड़ा समझदारी से सोच सकेगा. आखिरी चीज़ है कि कहीं न कहीं हमें अपने छात्रों को अंडरसर्व्ड सिचुएशंस, अंडरसर्व्ड कम्युनिटीज़, अंडरसर्व्ड पीपल, जैसे ओल्ड एज हमारे देश में तो बहुत तेजी से बढ़ चली है, उनके साथ जुड़ने के लिए कुछ न कुछ क्रिया करनी पड़ेगी. जिससे वो लोग समझ सकें कि उनका रोल सोसाइटी में क्या है और हमने देखा है कि हमने जब-जब इंस्टीट्यूशन में ये चीजें की हैं और छात्रों को इस तरह के मौकों में चाहे मेंडेटरी या वॉलंटरी ढंग से जोड़ा है, तो जरूर वो कुछ अलग सोच लेकर बाहर निकले. अगर यह निरंतर होता रहे तो मुझे लगता है कि एक एजुकेशनिस्ट के नाते हमें खुश होना चाहिए कि जो छात्र निकलकर आ रहे हैं, इनमें इंडिपेंडेंट थिंकिंग की क्षमता है. मुझे लगता है कि हर चीज़ से हटकर सिटिजनशिप की अगर हम बात करें तो अगर हम छात्रों में इंडिपेंडेंट थिंकिंग क्षमता अगर किसी न किसी ढंग से ला सकें तो उसके बाद वह कुछ भी सोचें, उससे तो हमें कोई गिला-शिकवा है ही नहीं. तो मुझे लगता है कि we will be able to make the graduates with the purpose and dedication.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
हम यहाँ बातचीत को अब खत्म कर रहे हैं. विश्वविद्यालय का एक दूसरा मकसद है और दोनों एक दूसरे से जुड़ते हैं. एक्सेलेंस आपने कहा और इंडिपेंडेंट थिंकिंग कहा. एक्सेलेंस और एक ऑटोनॉमस बीइंग एक स्वायत्त संस्था जो जिम्मेदार हो. जिम्मेदारी का मतलब है परस्परता या एक दूसरे से रिश्ते को समझना और कितनी तरह के रिश्ते हो सकते हैं? तो यह जो इंडिपेंडेंट थिंकिंग है, स्वतंत्र चिंतन है. यह स्वतंत्र चिंतन फिर कोई केंद्रीय विचार को मानने से जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि अपना विचार है और उसके लिए बहुत जरूरी है बहस, उसके लिए बहुत जरूरी है विवाद, असहमति और इसके लिए विश्वविद्यालय को भी तैयार रहना चाहिए, समाज को भी तैयार रहना चाहिए, विश्वविद्यालय इस रूप में एक सुरक्षित जगह है. हम एक ऐसा परिसर बनाते हैं जिसमें आप उन विचारों पर भी बहस कर सकते हैं जिन पर सड़क पर बहस करने से आपको खतरा होगा और यह जिम्मेदारी विश्वविद्यालय की होती है कि वह सुरक्षित माहौल बनाए जिसमें छात्र आकर वैसे विचारों को व्यक्त कर सकें, उन पर प्रयोग कर सकें, जो विचारों की प्रयोगशाला हो.
प्रोफेसर पंकज चंद्र
मैं एक और भी चीज़ अंडरलाइन करूँगा वो है ट्रस्ट. कहीं न कहीं लार्जर सोसाइटी को विश्वविद्यालयों पर और शिक्षकों के ऊपर ट्रस्ट करने की ज्यादा जरूरत है. मैं आपको एक छोटा सा उदाहरण दूँगा. हमेशा से मुझे तकलीफ रही है कि हम अपने एग्ज़ेमिनेशन को इनविजिलेट करते हैं. यह इसलिए करते हैं कि हमें डर है कि छात्र नकल करेगा और नकल होती है. तो हमने एक छोटा सा एक्सपेरिमेंट किया क्योंकि सभी हमारे यहाँ कोई भी प्रोफेसर, न छात्र कोई भी तैयार नहीं था. हम बच्चों को दो ग्रुप में ले गए. एक प्रोफेसर ने कहा कि अच्छा आप इस रूम में जा सकते हैं जो इनविजिलेटेड है या आप दूसरे रूम में जा सकते हैं जो अनइनविजिलेटेड है. कुछ छात्र उठकर उस अनइनविजिलेटेड रूम में गए. दरवाजा बंद कर दिया गया, उनको पेपर आदि सब कुछ दे दिया गया और वो निकले, उन्होंने अपना आंसरशीट सबमिट कर दिया, चले गए. हम लोग बहुत उत्सुक थे कि क्या हुआ उस अनइनविजिलेटेड रूम में जहाँ 10-12 लोग गए थे. रात में वह प्रोफेसर जिन्होंने छोटा सा एक्सपेरिमेंट किया था, उनके पास दो छात्राओं के ईमेल आए जिन्होंने कहा कि पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी ने हम पर ट्रस्ट किया और आपको एक चीज़ बता दें कि हो सकता है शायद दिमाग में आता कि इधर देख लें, उधर देख लें लेकिन किसी ने इस रूम में नकल नहीं की, न नकल करने की कोशिश की. मुझे लगता है कि अगर हम सोसाइटी को बदलना चाहते हैं और इसमें एजुकेशन का बहुत बड़ा रोल है, तो कहीं न कहीं सोसाइटी को एजुकेशनिस्ट पर भरोसा करना पड़ेगा और एजुकेशनिस्ट को टीचरों को इसे निभाने की जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी. तो मैंने सोचा यह जरूर मैं कहूँगा कि यह बात बहुत खटकती है.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
हाँ, विश्वास बहुत ऊँची चीज है. हालाँकि जो सत्ता होती है, वह अक्सर लोगों से कहती है कि आप हम पर विश्वास कीजिए और वह शायद बहुत स्वास्थ्यकर नहीं है. लोगों को हमेशा सत्ता को लेकर संदेह रहना चाहिए. लेकिन विश्वास का यह तत्व बहुत आवश्यक है. यानी कम से कम समाज को अपने शिक्षा संस्थानों पर विश्वास करना होगा, उनकी पहरेदारी नहीं करनी होगी. वे जो प्रयोग कर रहे हैं, हमेशा उनकी जाँच नहीं करते रहना होगा और उनको डांटना-धमकाना पाठ्यक्रम में किसे शामिल कर रहे हैं, किसे शामिल नहीं कर रहे हैं, जो एक पहरेदारी जैसी होने लगती है. तो समाज और विश्वविद्यालय के बीच भी विश्वास की आवश्यकता है और स्वयं विश्वविद्यालय के भीतर भी विश्वास के माहौल की आवश्यकता है. नौकरशाही भी हमेशा शिक्षकों पर संदेह न करे, छात्रों पर संदेह न करे. राज्य भी हमेशा संदेह न करे क्योंकि संदेह से फिर सेंट्रलाइजेशन की प्रॉसेस शुरू होती है कि हम एक यूनिफॉर्म सेट ऑफ नॉम्स बना देंगे इससे और यशपाल समिति की वह बात हमें याद है जब प्रोफेसर यशपाल कहा करते थे कि autonomy and freedom should not be a reward for excellence क्योंकि उस समय यह बहस चली थी.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
हम यहाँ बातचीत को अब खत्म कर रहे हैं. विश्वविद्यालय का एक दूसरा मकसद है और दोनों एक दूसरे से जुड़ते हैं. एक्सेलेंस आपने कहा और इंडिपेंडेंट थिंकिंग कहा. एक्सेलेंस और एक ऑटोनॉमस बीइंग एक स्वायत्त संस्था जो जिम्मेदार हो. जिम्मेदारी का मतलब है परस्परता या एक दूसरे से रिश्ते को समझना और कितनी तरह के रिश्ते हो सकते हैं? तो यह जो इंडिपेंडेंट थिंकिंग है, स्वतंत्र चिंतन है. यह स्वतंत्र चिंतन फिर कोई केंद्रीय विचार को मानने से जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि अपना विचार है और उसके लिए बहुत जरूरी है बहस, उसके लिए बहुत जरूरी है विवाद, असहमति और इसके लिए विश्वविद्यालय को भी तैयार रहना चाहिए, समाज को भी तैयार रहना चाहिए, विश्वविद्यालय इस रूप में एक सुरक्षित जगह है. हम एक ऐसा परिसर बनाते हैं जिसमें आप उन विचारों पर भी बहस कर सकते हैं जिन पर सड़क पर बहस करने से आपको खतरा होगा और यह जिम्मेदारी विश्वविद्यालय की होती है कि वह सुरक्षित माहौल बनाए जिसमें छात्र आकर वैसे विचारों को व्यक्त कर सकें, उन पर प्रयोग कर सकें, जो विचारों की प्रयोगशाला हो.
प्रोफेसर पंकज चंद्र
मैं एक और भी चीज़ अंडरलाइन करूँगा वो है ट्रस्ट. कहीं न कहीं लार्जर सोसाइटी को विश्वविद्यालयों पर और शिक्षकों के ऊपर ट्रस्ट करने की ज्यादा जरूरत है. मैं आपको एक छोटा सा उदाहरण दूँगा. हमेशा से मुझे तकलीफ रही है कि हम अपने एग्ज़ेमिनेशन को इनविजिलेट करते हैं. यह इसलिए करते हैं कि हमें डर है कि छात्र नकल करेगा और नकल होती है. तो हमने एक छोटा सा एक्सपेरिमेंट किया क्योंकि सभी हमारे यहाँ कोई भी प्रोफेसर, न छात्र कोई भी तैयार नहीं था. हम बच्चों को दो ग्रुप में ले गए. एक प्रोफेसर ने कहा कि अच्छा आप इस रूम में जा सकते हैं जो इनविजिलेटेड है या आप दूसरे रूम में जा सकते हैं जो अनइनविजिलेटेड है. कुछ छात्र उठकर उस अनइनविजिलेटेड रूम में गए. दरवाजा बंद कर दिया गया, उनको पेपर आदि सब कुछ दे दिया गया और वो निकले, उन्होंने अपना आंसरशीट सबमिट कर दिया, चले गए. हम लोग बहुत उत्सुक थे कि क्या हुआ उस अनइनविजिलेटेड रूम में जहाँ 10-12 लोग गए थे. रात में वह प्रोफेसर जिन्होंने छोटा सा एक्सपेरिमेंट किया था, उनके पास दो छात्राओं के ईमेल आए जिन्होंने कहा कि पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी ने हम पर ट्रस्ट किया और आपको एक चीज़ बता दें कि हो सकता है शायद दिमाग में आता कि इधर देख लें, उधर देख लें लेकिन किसी ने इस रूम में नकल नहीं की, न नकल करने की कोशिश की. मुझे लगता है कि अगर हम सोसाइटी को बदलना चाहते हैं और इसमें एजुकेशन का बहुत बड़ा रोल है, तो कहीं न कहीं सोसाइटी को एजुकेशनिस्ट पर भरोसा करना पड़ेगा और एजुकेशनिस्ट को टीचरों को इसे निभाने की जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी. तो मैंने सोचा यह जरूर मैं कहूँगा कि यह बात बहुत खटकती है.
प्रोफेसर अपूर्वानंद
हाँ, विश्वास बहुत ऊँची चीज है. हालाँकि जो सत्ता होती है, वह अक्सर लोगों से कहती है कि आप हम पर विश्वास कीजिए और वह शायद बहुत स्वास्थ्यकर नहीं है. लोगों को हमेशा सत्ता को लेकर संदेह रहना चाहिए. लेकिन विश्वास का यह तत्व बहुत आवश्यक है. यानी कम से कम समाज को अपने शिक्षा संस्थानों पर विश्वास करना होगा, उनकी पहरेदारी नहीं करनी होगी. वे जो प्रयोग कर रहे हैं, हमेशा उनकी जाँच नहीं करते रहना होगा और उनको डांटना-धमकाना पाठ्यक्रम में किसे शामिल कर रहे हैं, किसे शामिल नहीं कर रहे हैं, जो एक पहरेदारी जैसी होने लगती है. तो समाज और विश्वविद्यालय के बीच भी विश्वास की आवश्यकता है और स्वयं विश्वविद्यालय के भीतर भी विश्वास के माहौल की आवश्यकता है. नौकरशाही भी हमेशा शिक्षकों पर संदेह न करे, छात्रों पर संदेह न करे. राज्य भी हमेशा संदेह न करे क्योंकि संदेह से फिर सेंट्रलाइजेशन की प्रॉसेस शुरू होती है कि हम एक यूनिफॉर्म सेट ऑफ नॉम्स बना देंगे इससे और यशपाल समिति की वह बात हमें याद है जब प्रोफेसर यशपाल कहा करते थे कि autonomy and freedom should not be a reward for excellence क्योंकि उस समय यह बहस चली थी.
आपको याद ही होगा कि जब सारे लोगों ने कहा कि Autonomy and freedom is the first and last principal तो कुछ लोगों ने कहा कि नहीं जो अच्छा करें उनको ऑटोनॉमी दी जाए. तो यशपाल ने कहा कि बिना फ्रीडम और बिना ऑटोनॉमी के आप अच्छा कर ही नहीं सकते. तो आपका बहुत-बहुत शुक्रिया प्रोफेसर पंकज चंद्रा. हमने एक कुलपति की पूरी सुबह ले ली है. आपके पास काफी चिंताएं होंगी. आप सबने यह चर्चा सुनी जो विश्वविद्यालयों को लेकर है, विश्वविद्यालय कैसे बनने चाहिए, क्यों नहीं बन पाते हैं और कैसे वो बन सकते हैं. ऐसा नहीं है कि भारतवर्ष को निराश हो जाना चाहिए और यह देखना चाहिए कि नहीं श्रेष्ठ विश्वविद्यालय तो बाहर ही हैं और हमें बाहर ही जाना है, बल्कि वे प्रक्रियाएं जो कोई भी समाज अपने ढंग से लागू कर सकता है, वे प्रक्रियाएं यूनिवर्सल हैं. उन प्रक्रियाओं को देखने की आवश्यकता है. तो बहुत-बहुत शुक्रिया प्रोफेसर पंकज चंद्र. आपकी राय का हमें इंतजार रहेगा बहुत-बहुत शुक्रिया.
प्रोफेसर पंकज चंद्र
धन्यवाद
Share Kadwi Coffee
1
Profile of Professor Pankaj Chandra
2
Building Universities that Matter: Where are Indian Institutions Going Wrong?- Pankaj Chandra
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San Jose State Professors Criticize edX as ‘Social Injustice’
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MOOC
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Pitroda calls for rejig of 'obsolete' education
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The Tyranny of ‘Teaching and Learning’
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History saved lives in this pandemic. Will society listen next time?
8
Report of ‘The Committee to Advise on Renovation and Rejuvenation of Higher Education’
9
Competitiveness of Indian Manufacturing: Findings of the Third National Manufacturing Survey 2009
10
India has not taken education seriously since independence: Prof. Krishna Kumar
11
Foundation Programme, Ahmedabad University, Gujarat
प्रोफेसर पंकज चंद्र
धन्यवाद
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History saved lives in this pandemic. Will society listen next time?
8
Report of ‘The Committee to Advise on Renovation and Rejuvenation of Higher Education’
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Competitiveness of Indian Manufacturing: Findings of the Third National Manufacturing Survey 2009
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India has not taken education seriously since independence: Prof. Krishna Kumar
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Foundation Programme, Ahmedabad University, Gujarat
(सब्सटेक के अलावा आप हमारा यह पॉडकास्ट गूगल पर और स्पॉटिफ़ाई पर भी सुन सकते हैं. पॉडकास्ट को वीडियो में देखने के लिए आप हमारे यूट्यूब पेज पर यहाँ जाकर देख सकते हैं.)
(कड़वी कॉफी एक हिंदी पॉडकास्ट है, जिसमें सम-सामयिक विषयों पर विद्वान लंबी बातचीत के लिए ऑनलाइन या ऑफलाइन एकत्रित होते हैं. पॉडकास्ट की मेजबानी करते हैं दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के अध्यापक और लेखक अपूर्वानंद. पॉडकास्ट में चर्चा का उद्देश्य नारेबाजी और फतवा देना नहीं, न ही किसी सुनिश्चित निष्कर्ष तक पहुँचना है, वरन बातचीत के जरिए अपने समय को समझना है. चर्चा का विषय आपको शीर्षक और उपशीर्षक से स्पष्ट हो जाएगा.)
(कड़वी कॉफी एक हिंदी पॉडकास्ट है, जिसमें सम-सामयिक विषयों पर विद्वान लंबी बातचीत के लिए ऑनलाइन या ऑफलाइन एकत्रित होते हैं. पॉडकास्ट की मेजबानी करते हैं दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के अध्यापक और लेखक अपूर्वानंद. पॉडकास्ट में चर्चा का उद्देश्य नारेबाजी और फतवा देना नहीं, न ही किसी सुनिश्चित निष्कर्ष तक पहुँचना है, वरन बातचीत के जरिए अपने समय को समझना है. चर्चा का विषय आपको शीर्षक और उपशीर्षक से स्पष्ट हो जाएगा.)
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