GEETA PRESS : गाँधी हत्या के समर्थक विचारधारा के साथ खड़े लोगों को मिला है गाँधी शांति पुरस्कार : Kadwi Coffee 7



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“गीता प्रेस का नैतिक संसार गांधी के नैतिक संसार से उलट है, इसलिए है ऐतराज”


कल्याण पत्रिका का प्रकाशन करने वाली गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार दिए जाने के मौके पर 'Gita Press And The Making Of Hindu India' के लेखक अक्षय मुकुल से बातचीत

अपूर्वानंद

नमस्कार, मैं अपूर्वानंद. कड़वी कॉफी में आपका स्वागत करता हूँ. जैसा आपको मालूम है कड़वी कॉफी लंबी बातचीत का लगातार चलता हुआ एक सिलसिला है. इसमें हम कोशिश करते हैं कि अलग-अलग विषयों पर, अलग-अलग मसलों पर ठहरकर बात कर सकें, उन्हें समझने की कोशिश कर सकें. किसी पर अपनी राय देना, जोर-जोर से कुछ स्थापित करने की कोशिश करना एक बात है, पर उस मसले को समझना दूसरी बात है. और इसके लिए जरूरी है कि जो सवाल हमारे सामने आएं, उन पर जो लंबे वक्त से काम कर रहे हैं, सोच-पढ़-लिख रहे हैं, उनसे बातचीत की जाए. सिर्फ यह न हो कि हमारी हर विषय पर एक राय है और उस राय को हम अपने फेफड़े के जोर से सामने रखने की कोशिश करें. कड़वी कॉफी ऐसी ही एक कोशिश है. आज हमारे साथ खास बातचीत में हैं अक्षय मुकुल. अक्षय, हमें आपकी याद तीन-चार रोज पहले आई, जब हमें पता चला कि भारत सरकार ने गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार दिया है¹ और अचानक लगा कि जैसे आपकी किताब को मिल गया है, जो आपने कुछ साल पहले लिखी थी. ‘गीता प्रेस और हिंदू भारत का निर्माण’ जो हिंदी में है, अंग्रेजी में है ‘गीता प्रेस एंड मेकिंग ऑफ हिंदू इंडिया’². क्या आपको भी कोई फोन आया?

अक्षय मुकुल

हमारे एक बड़े पुराने कॉलेज के मित्र हैं और जो होता है कॉलेज के मित्रों के साथ. उन्होंने कहा कि आ रहे हैं तुम्हारे पास पार्टी लेने और मैंने कहा कि ऐसे ही आ जाओ लेकिन मुझे कुछ नहीं मिला है, वह गीता प्रेस को मिला है. गीता प्रेस वाली पुस्तक को नहीं मिला है.

अपूर्वानंद

और यह इसलिए है कि अक्षय मुकुल की किताब जब से छपी है, उस वक्त से इतनी चर्चा में रही है कि यह भ्रम होना स्वाभाविक था कि गीता प्रेस को इनाम मिला है, का मतलब अक्षय की किताब को मिला है. जबकि सच्चाई यह थी कि इस साल का गांधी शांति पुरस्कार गांधी के जन्म के 125 साल पूरे होने पर भारत सरकार द्वारा गीता प्रेस को दिया गया है. इसे 1995 में स्थापित किया गया था. गीता प्रेस पर शोध करने वाले और किताब लिखने वाले अक्षय मुकुल ने इस पर ऐतराज किया. आपको यह नैतिक रूप से ठीक नहीं लगा और लगा कि यह बिलकुल ही असंगत है. आपने इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख भी लिखा.³ हालाँकि यह रिश्ता आगे चलकर खराब हो गया. आप कहते हैं कि यह एक विडंबना की बात है कि गांधी शांति पुरस्कार गीता प्रेस को मिलेगा. आप ऐसा क्यों कहते हैं?

अक्षय मुकुल

आप देखें कि आपको किस बिनाह पर पुरस्कार मिलेगा? आप क्या करेंगे और किस वजह से मिलेगा? जैसे इसमें कि शांति फैलाने का और जो गांधी के मूल्य थे, जो विचारधारा थी, उन सब मूल्यों को जरा देखें. जैसे अंग्रेजी में कहते हैं कि गीता प्रेस एक भी बॉक्स टिक नहीं करता, जिसकी वजह से उसे यह पुरस्कार मिलना चाहिए. अगर नेल्सन मंडेला को मिला है पहले और उस हिसाब से देखें तो मैं बहुत सीमित तरीके से देखूँ तो लगता है कि गांधी के किसी भी मूल्य को, किसी विचारधारा पर गीता प्रेस खरी नहीं उतरती.

अपूर्वानंद

लेकिन अगर इसको इस तरह देखें अक्षय कि आखिर गांधी सनातनी हिंदू थे और जैसा आपने खुद अपनी किताब में लिखा है और हम सब लोग बचपन से जो कल्याण पढ़ते रहे थे और जो तब इसके प्रकाशनों से परिचित हैं, वो जानते हैं. खुद मेरे घर में गीता प्रेस के रामचरितमानस और रामायण के न जाने कितने गुटखा संस्करण होते थे. तो गीता प्रेस का एक बहुत महत्वपूर्ण काम सनातन हिंदू धर्म के मूल्यों का प्रचार था. तो आप यह क्यों कह रहे हैं कि मेल नहीं है क्योंकि गांधी, सनातनी हिंदू थे.

अक्षय मुकुल

यह बहुत ही बढ़िया प्रश्न है. अभी मैं देख रहा हूँ और कल सरकार के एक मंत्री ने भी लिखा है. गीता प्रेस के बारे में लोगों को एक कन्फ्यूजन है कि गीता प्रेस के रामायण, महाभारत के गुटखा और हनुमान चालीसा छापने से किसी को ऐतराज है. वो रिलीजियस टेक्स्ट हैं, ठीक है. आप सस्ते दामों में बहुत उत्कृष्ट किताबें छाप रहे हैं या कहें कि क्वालिटी की चीजें लोगों तक पहुँच रही हैं. अभी भी कल्याण शायद मेरे हिसाब से 7 रुपए का आता है. बात है उनके राजनीतिक पहलू की. अगर आप एक सेकेंड के लिए परिपेक्ष्य को भूल भी जाएं. गीता प्रेस 1923 में स्थापित हुआ और 1927 में कल्याण शुरू होता है. कल्याण इनका मुख्य वाहन है. यह साधारण हिंदू घरों में पहुंचने का सबसे बढ़िया तरीका था और अभी भी पहुँच रहा है. कल्याण को 97 साल हो गए हैं. गीता प्रेस को 100 वर्ष हो गए हैं और यह पहुँच रहा है. यह मासिक कहता है कि हम भक्ति, ज्ञान और वैराग्य के मासिक हैं लेकिन 1926 के बाद से अब तक इतिहास के जो भी फ्लैश पॉइंट्स रहे हैं, उसमें आप देखेंगे यह सुर में सुर मिलाकर हिंदू राष्ट्रवाद के बहुत सारे संगठनों के साथ मिलकर काम करते रहे हैं. फ्लैश प्वाइंट्स के बारे में मैं कुछ बताना चाहूँगा. मंदिर प्रवेश 1932 में शुरू होता है, इसके बाद आप 40 के दशक में जाएं, जब देश में बहुत कुछ गंभीर घट रहा है, लगता है स्वतंत्रता मिलने वाली है, विभाजन है और सांप्रदायिकता चरम पर है, चारों तरफ हिंदू-मुस्लिम दंगे हो रहे हैं. 1947 के बाद हिंदू कोड बिल, फिर गोरक्षा समिति का बड़ा आंदोलन चलता है और 1960 के दशक में इसी संसद पर अटैक किया जाता है. उससे बड़ी हिंसा तब तक किसी ने नहीं देखी थी. उसके बाद आप बाबरी मस्जिद का मामला देख लें, उसके बाद आप रामसेतु देख लें.

तो हर मुददे पर जो भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का मासिक है, तीनों को भूलकर राजनीतिक भाषा में काम करता है. लोग कहते हैं कि जब वो धार्मिक किताबें छाप रहे हैं तो आपको इससे क्या दिक्कत है? कोई दिक्कत नहीं है, किसी को दिक्कत नहीं है. किताबें तो बाइबल सोसाइटी भी छापती है. आप उससे बड़े हो गए हैं साइज के हिसाब से. मगर यह जो मासिक है और मासिक के अलावा भी जो उनके बहुत सारे पैंफलेट्स हैं, जिनको लोग उतना नहीं पढ़ते. जैसे मैं आपको बताऊँ 1926 में एक स्त्री धर्म प्रश्नोत्तरी उन्होंने छापी, जो अब तक छप रही है. उसे अगर आज बड़े शहर से लेकर मुफस्सिल शहर में आप किसी स्कूल जाती या कॉलेज जाती लड़की को पढ़वा दें तो वह विद्रोह कर देगी कि यह क्या हो रहा है. उसमें है क्या? सरला और सावित्री के बीच वार्तालाप है. सावित्री ज्ञानी हैं, सरला सरल महिला हैं और बताया जा रहा है कि महिला को कैसे पेश आना चाहिए और हर तरीके से उनके पति के साथ कैसे रिश्ते होने चाहिए, संभोग कब करना चाहिए, विधवा के लिए क्या नियम हैं. यह 1926 से लेकर अब तक बिक रहा है. कोई न कोई तो पढ़ रहा है, कोई न कोई तो इससे प्रभावित हो रहा है. फिर आप नारी अंक ले लें, जो 1940 के दशक में आया और उसमें यही सब बातें हैं. उसके अलावा जो एक सेलेब्रेशन है. आज किसी ने ट्विटर पर हिटलर की माँ के बारे में नारी अंक से लेकर ट्वीट किया, जो मेरी पुस्तक में भी है. तो महिलाओं का काम है प्रोक्रिएशन यानी आप बच्चा पैदा करें, बच्चे को बड़ा करें समाज सेवा के लिए और आप चारदीवारी की मालकिन हैं, बाहर की दुनिया मर्दों की दुनिया है. यह अभी तक चल रहा है.

अपूर्वानंद

जब आप इसकी बात कर रहे थे, उसके पहले आपने कहा कि यह भक्ति और वैराग्य की पत्रिका है, तो यह वैराग्य तो कतई नहीं है.

अक्षय मुकुल

एकदम नहीं है

अपूर्वानंद

आसक्ति है. सांसारिक. बहुत ज़्यादा रुचि है आपकी. मंदिर प्रवेश के समय क्या करना है और फिर बाबरी मस्जिद केस और गोरक्षा समिति और कौन सी राजनीति भारत में प्रभावी हो और न हो. तो ये सारे संसार के विषय हैं, धार्मिक नहीं हैं. अपना उद्देश्य धार्मिक-आध्यात्मिक बताने वाली संस्था की इसमें गहरी रुचि है और वह हस्तक्षेप करती है. यह आप कह रहे हैं. और आप अभी स्त्रियों की बात कर रहे थे. तो दो चीजें मेरे ध्यान में आईं, जो आपने अपनी किताब में लिखी हैं. एक सती के प्रसंग पर जो इनका रुख है और दूसरा जो तथाकथित हिंदू बाबा हैं, जो दुराचार, बलात्कार में आरोपी हैं तो उनका पक्ष पोषण. तो इसे आप जरा बताएं कि सती के प्रश्न पर और स्त्रियों के साथ व्यवहार के प्रश्न पर क्या आरोप हैं?

अक्षय मुकुल

देखिए सती के प्रश्न पर एक लंबा लेख हनुमान प्रसाद पोद्दार का है जिसको मैंने पुस्तक में उद्धत किया है. इसमें वह कहते हैं कि सती के बारे में आपकी समझ गलत है. जब किसी के पति का देहांत होता है तो उसकी पत्नी के अंदर इतने केमिकल रिऐक्शन होते हैं और वह कुछ चीजों का नाम लेते हैं. और वो रिएक्शन इतना तेज होता है कि अपने आप उनके शरीर में आग लग जाती है. और यह लिखा गया है.

अपूर्वानंद

मैं मनोज गुप्ता की किताब पढ़ रहा था और उसमें लिखा है कि मोतीलाल नेहरू ने दरअसल सती का समर्थन करते हुए यह तर्क दिया था कि उन्हें अपने आप खुद ही आग लग जाती थी, केमिकल रिएक्शन की वजह से.

अक्षय मुकुल

और उसको वह लंबा-चौड़ा एक्सप्लेन कर रहे हैं कि आप लोगों की समझ गलत है. यह किसने कहा कि वो आत्मदाह कर रही है. कल्याण में आत्मदाह करने वाले कुछ केसेज छपे थे और उसमें उन महिलाओं को बहुत तरीके से सेलेब्रेट किया गया था कि यह है असली पत्नी. और जब स्कूल के दरवाजे लड़कियों के लिए खुल रहे हैं और वो कॉलेज जाने लगीं तो इनको इससे बहुत ज्यादा परेशानी है. उनका सदाचार अंक देखें. हम बचपन में सुनते थे कि अगर तुम गलत काम करोगे तो तुम्हें ऊपर नरक में गर्म तेल में तला जाएगा और उसके चित्र भी हैं. अगर आप शराब पीते हैं तब आप नर्क में जाएंगे, आप जुआ खेलते हैं तो जाएंगे, अगर आप व्यभिचारी हैं तब आपके साथ यही होगा, तो इस तरह के एक मॉरल यूनिवर्स को गीता प्रेस ने क्रिएट किया और यह चलता रहा. आप 1926 से लेकर देख लें अभी तक. अभी भी कल्याण मेरे पास आता है और मैं पढ़ता हूँ. उसमें आप देखेंगे कि अभी भी पोद्दार जी और जयदयाल गोयनका के लेख छपते हैं. कुछ नए लेख भी छपते हैं और घुमा-फिराकर वही बातें की जाती हैं. अब सती की बात नहीं कर सकते क्योंकि यह गैरकानूनी है और उस पर लगभग सहमति बन चुकी है तो वो उस पर बात नहीं करते. अगर आप देखें तो जब शारदा एक्ट पास होता है तो अंदर ही अंदर ये लोग बहुत परेशान थे कि लड़कियों की शादी की उम्र क्यों बढ़ा रहे हैं. गोयनका जी लिखते हैं कि शारदा एक्ट तो गलत हो रहा है, यह नहीं होना चाहिए. ये सब दकियानूसी चीजें, ये सब बातें कल्याण हमेशा से लगातार छापता रहा और यह मुझे समझ नहीं आता कि यह कहाँ से भक्ति, ज्ञान और वैराग्य है. ये कंप्लीट कंट्रोल ऑफ वीमेन चाहते हैं. जिसे अंग्रेजी में कहेंगे Women's lives are men's business और यही रहा है.

अपूर्वानंद

तो असल चिंतन है कि सुशील और घर को चलाने वाली औरत की भूमिका में वह रहे. अगर वह शिक्षा भी ले तो देशहित में बच्चों को शिक्षित करने के लिए आए. तो यह एक तरह का प्रतिक्रियावादी ख्याल है, जिसे शायद औरत स्वीकारना न चाहें. लेकिन एक और बात से आपका इंडियन एक्सप्रेस का लेख शुरू होता है जिसमें आप कहते हैं कि गांधी और पोद्दार के बीच संवाद का रिश्ता था. और यह तर्क दिया जा सकता है कि ठीक है, मैं गांधी की कुछ बातों से सहमत नहीं हूँ. लेकिन गीता प्रेस से गांधी का एक रिश्ता रहा है और यह रिश्ता परस्पर सम्मान का रिश्ता था. जैसा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी दावा करता है कि ऐसा नहीं है कि गांधी से हमारा कोई रिश्ता नहीं था. उन्होंने कहा था कि हमसे उन्होंने बात की थी. इसलिए यह कहना गलत है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और गांधी के बीच में विरोध था बल्कि वो कहते हैं कि गांधी के मन में आरएसएस को लेकर स्वागत का भाव था या प्रशंसा का भाव था. उसी प्रकार का दावा गीता प्रेस भी कर सकता है.

अक्षय मुकुल

हाँ कर सकता है.

अपूर्वानंद

कल्याण भी कर सकता है

अक्षय मुकुल

हाँ कर सकता है.

अपूर्वानंद

फिर आप क्यों कह रहे हैं?

अक्षय मुकुल

वही मैं कह रहा हूँ. जब आपने गांधी की बात की, आरएसएस की बात की या गीता प्रेस की बात की. अगर आप रेट्रोस्पेक्ट में देखें तो लगता है कि यह गांधी की महानता थी कि मैं किसी से भी पत्राचार कर सकता हूँ, मैं किसी से इंटरेक्ट कर सकता हूँ और उसमें किसी तरह की कोई रोकटोक नहीं होनी चाहिए. एक-दूसरे को समझने में कोई दिक्कत नहीं है. मैं शाखा गया तो मैं शाखा वाला नहीं हो गया और आरएसएस नहीं हो गया. जहाँ तक गीता प्रेस का सवाल है, यह बात सही है कि पोद्दार जी के साथ बहुत अंतरंग रिश्ते थे. गांधी ने कह रखा था कि मीटिंग के दौरान आप किसी को भी मुझसे मिलने से रोक सकते हैं लेकिन हनुमान को मत रोकिए, वह मिलेगा. 1937 की चिट्ठी में वह लिखते हैं कि कभी-कभी मेरा मन करता है कि तुम मेरे पास आ जाओ लेकिन फिर मुझे लगता है कि तुम भगवान का ही तो काम कर रहे हो. यह गांधी की महानता इसलिए है कि 1932 में पोद्दार ने गांधी को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. मंदिर प्रवेश को लेकर जो पत्राचार शुरू हुआ, उसमें उन्होंने गांधी को बहुत बुरा-भला कहा था कि आप तो खुद ही 1920 के दशक में सह भोजन के खिलाफ थे, अब आपको क्या हो गया? गांधी कहते हैं और यही गांधी की खासियत थी कि इवॉल्व करते थे. वह कहते हैं कि मैंने पहले बोला था, अब बदल लिया, इसमें क्या प्रॉब्लम है. वह इन बातों पर राजी नहीं थे. दूसरी बात, गांधी गले की हड्डी इसलिए भी थे क्योंकि वह अपने आपको सनातनी कहते थे. सनातनी थे लेकिन उनके खिड़की-दरवाजे खुले थे. उन्हें दूसरे लोगों के विचार सुनने में कोई परेशानी नहीं थी. जब हरिजनों की शादी होती है और वो 1946 में हरिजन पंडित को लेकर आते हैं. इसका मैंने जिक्र किया है. उसमें यह (पोद्दार) कहते हैं कि सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इनके फॉलोअर्स बहुत हैं, उनका असर बहुत होता है.

सनातन धर्म में होने के बावजूद वह नई-नई चीजें कर रहे हैं और इनकी जो बेसिक फिलॉसफी है, उस सनातन धर्म में यह कि भारत एक महान देश था, जहाँ हम ऊंचाइयों पर पहुँच चुके थे, मुसलमानों के आने के बाद और ब्रिटिश के आने के बाद हम धरातल में चले गए, पतन शुरू हो गया और हमारा पूरा पतन हो चुका है और हमें अब वापस वहीं जाना है. उस वापसी के रास्ते में उनके लिए गांधी बहुत बड़े बाधक हैं. तो एक रिश्ता होने के बावजूद वह गांधी की किसी चीज को नहीं मानते. अगर आप देखें तो गांधी की जो गीता पर टिप्पणी है उसको भी नहीं छापते. कहते हैं कि वह हिस्टोरिकल टेक्स्ट नहीं है, वह उसे पोएटिक टेक्स्ट कहते हैं. तो उससे उन्हें नाराजगी थी. आप गांधी के इतने अंतरंग थे और उनका गीता पर एक अलग ओपिनियन है तो छाप देते. एक मैगज़ीन, एक पत्रिका का क्या काम है. अगर विचार है तो आप उसको छापिए, लोगों को पढ़ने दीजिए. आप उस विचार को भी नहीं आने देते. गांधी आपके लिए भगवान की तरह हैं, आप वैसे उनको बहुत इज्जत देते हैं, पर जो उनकी बेसिक फिलॉसफी है, उस पर आप राजी नहीं हैं. 1940 के दशक में यह और गड़बड़ हो जाता है. गाय के मामले में भी यही है. ये कहते हैं कि अगर गांधी बोलते कि गोहत्या रोकने के लिए कानून लाओ तो शायद रुक जाता लेकिन गांधी ने कभी नहीं मांगा. गांधी को उसके लिए ब्लेम कर रहे हैं, विभाजन के लिए ब्लेम कर रहे हैं.

1920 के दशक के अंत में गीता प्रेस के हेडक्वार्टर गोविंद भवन कलकत्ता में एक बहुत बड़ा सेक्स स्केंडल हुआ. वहाँ पर हीरालाल नाम के एक मैनेजर थे, जो खुद को प्रचारक भी कहते थे. उनकी सभा में बहुत मारवाड़ी महिलाएं आती थीं. उनमें एक विधवा महिला गर्भवती हो गई और वह हंगामा बढ़ते-बढ़ते बहुत ज्यादा बढ़ गया. अगर आप चाँद का मारवाड़ी अंक देखें तो उसके कम से कम 10 पन्ने उसी पर हैं. हिंदू पंच जो हिंदू महासभा से जुड़ा था, उन्होंने तो ऐसा कैंपेन किया कि एक अंक नहीं, दस अंकों में वो लगे रहे. गतांक से आगे, गतांक से आगे चलता रहा. अंत में जीडी बिड़ला को गांधी को लिखना पड़ा कि देखिए लोगों ने कलकत्ता में मारवाड़ियों के स्कूलों में बेटियों को भेजना बंद कर दिया है. फिर गांधी क्या करते हैं. गांधी नवजीवन में एक बड़ा लेख लिखते हैं कि जीते-जी किसी आदमी को भगवान मत मानो. तुम लोगों ने गलती की, हीरालाल को तुमने भगवान बना लिया. मरने के बाद आदमी का आकलन करो. भगवान किसी को नहीं बनाना चाहिए और उन पतियों को जिनकी पत्नियां वहाँ गई थीं और जो इसमें फँस गई थीं, उनको बोला कि इनको माफ़ कर दो क्योंकि उनको पता नहीं था. फिर जाकर मामला कुछ सँभला. तो गांधी इनके काम आए और आप देखिए, कल्याण में पूरे स्केंडल का कोई जिक्र नहीं है. वह तो चाँद का मारवाड़ी अंक और हिंदू पंच इन दोनों ने बचा लिया. इन्होंने लिख-लिखकर इनको काफी शर्मिंदा किया और गांधी वहाँ भी काम आए. खासकर पार्टीशन को लेकर जो नाराजगी है वो बहुत ज्यादा है. यहाँ तक कि 1948 में आप संदेह पर ही गिरफ्तार हो जाते हैं.

अपूर्वानंद

हाँ, यह बात बताना बहुत जरुरी है कि 30 जनवरी 1948 को गांधी की हत्या होती है और उसके बाद देशभर में गिरफ्तारियां होती हैं. जिन पर संदेह था कि वो उनकी हत्या की विचारधारा और उस हत्या के लिए वातावरण बनाने में शामिल थे, उनकी गिरफ्तारियां होती हैं.

अक्षय मुकुल

और गांधी के बहुत करीबी जीडी बिड़ला ने इनकी मदद करने से मना कर दिया और कहा कि ये सनातन नहीं शैतान धर्म कर रहे थे.

अपूर्वानंद

तो सनातन नहीं शैतान धर्म, यह एक सख्त टिप्पणी है.

अक्षय मुकुल

हाँ, सख्त टिप्पणी है जबकि बिड़ला इनके बहुत करीब थे. 

अपूर्वानंद

बिरला करीब थे और जैसा आपने कहा कि गांधी भी इनके करीब थे, मगर पोद्दार को अगर चुनना पड़ता कि आप इस विचारधारा को चुनेंगे या गांधी के जीवन को चुनेंगे तो उन्होंने उस विचारधारा को चुना जिसने गांधी की हत्या का वातावरण बनाया जिसके समर्थक नाथूराम गोडसे, सावरकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ थे. तो यह जो आपने कल्याण और गीता प्रेस के नैतिक संसार की बात की है. गांधी शांति पुरस्कार का अपना एक नैतिक संसार है जिसमें नेल्सन मंडेला भी हैं और बाबा आमटे भी हैं. और आवश्यक नहीं कि कोई गांधी की तरह ही राजनीतिक भी हो. बाबा आमटे को आप कह सकते हैं कि उस प्रकार के नहीं हैं जैसे नेल्सन मंडेला हैं. गांधी शांति पुरस्कार का भी अपना एक नैतिक संसार है और जैसा आपने अपनी किताब में लिखा है कि इसका अपना एक नैतिक संसार है. इनमें विरोध किस प्रकार का है? हालाँकि हमने उसकी बात की है.

अक्षय मुकुल

हर मामले में आप देख लें. जाति के मामले में, धर्म के मामले में, महिलाओं के मामले में. ये सब अहम मुददे हैं, जिसमें जाति को लेकर इनमें सबसे ज्यादा फर्क है. दोनों में मनमुटाव है और वो गांधी की इन सब बातों को नहीं मानते. गांधी की कभी भी किसी धर्म खासकर इस्लाम को लेकर या मुसलमानों को लेकर कोई टिप्पणी नहीं मिलेगी, लेकिन 1940 के दशक में ऐसे नारे 'जिन्ना चाहे दे दे जान, नहीं मिलेगा पाकिस्तान,' ये सब चीजें भक्ति, ज्ञान और वैराग्य के मासिक में छप रही थीं. गीता प्रेस की एक खासियत है कि वो व्यक्ति पूजा नहीं करते. इसीलिए उनके 100 साल के इतिहास में आपको गीता प्रेस से छपी पोद्दार की या गोयनका की कोई जीवनी नहीं मिलेगी. जो भी छपी हैं, बाहर से छपी हैं. इस बात पर वो अडिग रहे. मगर एक बार वो 1946 में इससे हटे, जब मालवीय का देहांत होता है तो कल्याण का एक स्पेशल मालवीय अंक निकलता है. मालवीय अंक अभी काफी दुर्लभ है. ये दावा करते हैं कि मालवीय जी ने अपना आखिरी इंटरव्यू इनके एक लेखक को दिया था. आपको लगेगा ही नहीं कि यह भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का मासिक है. गांधी की विचारधारा एक खुला दरवाजा है, जहाँ गांधी हर चीज़ बात करने को राजी हैं. यहाँ यह नहीं है. कहने को वो कहते हैं कि गीता प्रेस हिंदुओं के सबसे बड़े प्रवक्ता हैं. वे कहते हैं कि हिंदुओं की सबसे बड़ी कमी यह है कि आप हम तरह-तरह की भाषाओं में बात करते हैं, हमारे भीतर बहुत सारे पंथ हैं और अगस्त 1926 में कल्याण का जो पहला संपादकीय है, उसमें वह कहते हैं कि हमें संघ बल की जरूरत है. हिंदू महासभा से उनके बहुत मतभेद हैं. हिंदू महासभा तो मंदिर प्रवेश के पक्ष में है लेकिन ऐसा नहीं है कि हिंदू महासभा की ओर से किसी को लिखने देंगे कि मंदिर प्रवेश जरूरी है. हिंदू महासभा के लोग चंदकरण शारदा और बाकी नेता लिख रहे हैं लेकिन वो ऐसी चीजों पर लिख रहे हैं जिस पर वो एकराय हैं. मतभेद नहीं है. मतभेद वाली चीज सिर्फ एक बार आती है. संपूर्णानंद ने किसी के लेखन पर टिप्पणी की यानी रिजॉइंडर का जो सिस्टम है वह एक ही बार हुआ और तब संपूर्णानंद शायद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. उनके लिखने के बाद कहा गया कि अब इस विषय पर सब बहस खत्म होती है. अगर गांधी से आपके मतभेद हैं तो गांधी के मतभेदों को भी छापिए. आप उनको अपने पाठकों तक पहुँचने भी नहीं दे रहे हैं और आपको गांधी चाहिए भी. गांधी बहुत बड़ा आदमी है. गांधी के कहने पर आप विज्ञापन नहीं लेते, पुस्तक समीक्षा नहीं करते. गांधी से आपने वह लिखवाया, कल्याण के लिए उनसे आशीर्वाद लिया और गांधी को लगा कि यह काम हो रहा है. गांधी को इतनी परेशानी नहीं है इनसे, जितनी इनको परेशानी है.

अपूर्वानंद

जैसा आपने कहा कि वह वक्त था जिसमें गांधी समाज में एक व्यापक सहमति भी कायम करना चाहते हैं. इसलिए सनातनियों से उनका संवाद और बहस लगातार चलती रहती थी. मुझे ख्याल आता है कि जवाहरलाल नेहरू ने एक बार तंग आकर गांधी से कहा था कि आप सनातनियों से बहस कर रहे हैं और ये मोटी अक्ल के लोग हैं. तो गांधी ने जवाब दिया था कि मुझे दरअसल इनसे बहस करने में मजा आता है, जैसे एक पतंगा जान देने के लिए लपकता है वैसे ही अब सनातनियों की दशा है. गांधी पर बहुत से आक्रमण हो रहे थे. उस दौरान सनातनी हिंदुओं द्वारा गांधी की हत्या का प्रयास भी पुणे में किया गया. इसको आपने विडंबना कहा है लेकिन यह एक तरह की अनैतिकता भी है.

अक्षय मुकुल

अनैतिकता है. यह हम सब पर एक सवाल है. अगर मैं थोड़ा रफ लैंग्वेज में कहूँ तो हम सब पर थप्पड़ है कि आप अपना गांधी पढ़ें, अपना गांधी समझें और हम गांधी के नाम का पुरस्कार गीता प्रेस को देंगे. आपको जो करना है, कर लें.

अपूर्वानंद

हाँ, तो जो अभी की सरकार है, यह दरअसल गांधी के पूरे अर्थ को बदल देना चाहते हैं. अगर इसको शुरू से देखें तो गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने एक बहुत विशालकाय केंद्र बनाया था गांधी के नाम पर. अब गांधी और विशालता, दोनों में कोई मेल नहीं है. उनका जो सौंदर्यशास्त्र था, उससे बिल्कुल भिन्न जाकर गांधी को एकदम अलग बना देना. उसी प्रकार मैंने कुछ वर्ष पहले साबरमती आश्रम में देखा था. गांधी के नाम पर जो प्रदर्शनी है, उसके ब्योरे में जाने का अभी वक्त नहीं है क्योंकि हमारे पास उसके चित्र नहीं, लेकिन उस प्रदर्शनी को देखने के बाद एक बहुत ही विकृत अर्थ दिखाई पड़ता है. साबरमती आश्रम को पूरा बदल दिया है. यानी खोल का गांधी का है लेकिन उसके अंदर अर्थ पूरा दूसरा कर दिया है.

अक्षय मुकुल

जी वही हो रहा है.

अपूर्वानंद

तो यह जो अनैतिकता है, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी है. गांधी की हत्या के फौरन बाद 13 दिनों का शोक राष्ट्रीय स्वयंसेवक ने घोषित कर दिया और खुद को गोडसे से तुरंत दूर कर लिया. जिस पर नागार्जुन की तीन कविताएँ भी हैं और लगभग वही चीज अभी दोहराई जा रही है, जब गांधी शांति पुरस्कार आप गीता प्रेस को दे रहे हैं. तो जैसा आपने कहा कि कल्याण भक्ति ज्ञान, वैराग्य की बात करता है, लेकिन दरअसल वह हिंदू राष्ट्रवाद की बात करने की कोशिश कर रहा है. एक हिंदू भारत बनाने की बात कर रहा है.

अक्षय मुकुल

लेकिन यह ऐसे ही नहीं हुआ है. यह पिछले 100 साल की मेहनत का फल है और गीता प्रेस अकेले नहीं है. इस तरह के बहुत छोटे-छोटे संस्थान हैं, बड़े संस्थान हैं, जिन्होंने ईंट दर ईंट इसको आधार दिया है. अभी हम जिस कगार पर हैं देश में, वह बनाया गया है और गीता प्रेस जैसे संस्थानों का बहुत-बहुत बड़ा योगदान रहा है क्योंकि आरएसएस की भाषा साधारण हिंदू घरों में पहुँचाने का काम, हिंदू महासभा की भाषा पहुँचाने का काम कल्याण कर रहा था. आप अगर 1946 के गोरखपुर में हुए हिंदू महासभा के वार्षिक अधिवेशन को देखें जिसमें 12 रिज़ॉल्यूशन पास किए जाते हैं और वह कल्याण में छपता है क्योंकि पीरियड इतना इंटेंस है कि वो बोलते हैं कि यह होना चाहिए क्योंकि अब पाकिस्तान तय है, तो जो हिंदुस्थान बनेगा उसमें हमें यह चाहिए. आप देखें तो लगेगा कि जैसे कोई 2014 में ये बातें कर रहा हो कि भगवा ध्वज होना चाहिए, गोहत्या बंद होनी चाहिए, मुसलमानों को फौज में नौकरी नहीं मिलनी चाहिए, सरकारी नौकरियों में मुसलमानों को उसी अनुपात में दो जिसमें हिंदुओं को पाकिस्तान में दे रहे हैं, नौजवानों की मिलिशिया बनाओ, खुद को प्रोटेक्ट करो. ये भाषा तो भक्ति-ज्ञान-वैराग्य की कहीं से नहीं है. भक्ति, ज्ञान, वैराग्य की मेरी-आपकी समझ है, उससे मुझे लगता है कि आप सहमत होंगे कि यह कहीं से नहीं है. तो यह कल्याण का कौन सा रिलीजन है.

अपूर्वानंद

यह पूरी तरह से सांसारिक है. आपने फ्लैश प्वाइंट्स की बात की थी. अगर हम उनको संक्षेप में दोहरा सकें. तो 1947 के बाद जब-जब धर्मनिरपेक्ष भारत की नींव पर संकट आया. जैसे आपने 1966 में संसद पर आक्रमण की बात कही और वह आक्रमण गोरक्षक महाभियान समिति की ओर से हुआ और एक तथाकथित साधु ने किया. कामराज का घर भी जला दिया.

अक्षय मुकुल

अगर उस वक्त भी कल्याण देखें तो आपको ताज्जुब होगा कि किस तरीके से अपने पाठकों को इस्तेमाल किया जा रहा है. आपको याद होगा कि उस जमाने में लिफाफे आते थे. कल्याण में लिफाफे लगे हैं और हर पाठक से कहा जा रहा है कि आप प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखिए, राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखिए. उसके बाद एक चिट्ठी है जिसका मैंने उद्धण भी दिया है. जब पूरा वायलेंस होता है तो पोद्दार गोलवलकर को लिख रहे हैं कि आपके लोगों ने बहुत मदद की. अब वह ट्रेनिंग में मदद की, किसमें मदद की. जबर्दस्त हिंसा हुई थी और गोरक्षा समिति में गोलवलकर थे और हनुमान प्रसाद पोद्दार उसकी प्रमुख कमेटी में थे. और यह 1949 में रामलला के स्थापित होने के बाद हुआ. यह कहानी मैं ऑन रिकॉर्ड कह सकता हूँ. मैंने किताब में लिखा है और यह बात मुझे रामबहादुर राय ने कही थी जो सरकार से बहुत करीब थे. उन्होंने कहा था कि उनको नानाजी देशमुख ने यह कहानी बताई थी और वह रिकॉर्ड नहीं कर पाए थे. जब वह इसे रिकॉर्ड करने गए तो उन्होंने मना कर दिया. कहानी यह थी कि 1949 में रामलला को रखने में जो हम तीन-चार लोगों के नाम जानते हैं, शकुंतला नायर और बाकी दो-तीन साधु, उन्होंने कहा था कि उनमें हनुमान प्रसाद पोद्दार भी थे. तो फिर रामबहादुर राय ने अपनी पत्रिका में 2014 में इसे लिखा और मैंने उसका उद्धरण दिया है. उसमें उन्होंने लिखा है कि हनुमान प्रसाद पोद्दार भी थे. चलिए इस पर संदेह हो भी लेकिन यह गीता प्रेस के रिकॉर्ड में है कि 1949 में मंदिर बनाने का 1500 रुपए से पहला फंड, जो उस समय बहुत बड़ी रकम थी, 1949 में वह पोद्दार शुरू करते हैं. और जब बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किया जाता है, कल्याण कहता है कि जो ध्वस्त हुआ, वह तो मंदिर था, मस्जिद कहाँ से थी. यह तर्क दिया गया. कहा कि वह तो मंदिर ही था तो इन लोगों ने मंदिर को ध्वस्त कर दिया क्योंकि जर्जर हो गया था.

अपूर्वानंद

यह फिर एक प्रकार का पाखंड है कि हम जो अपराध करते हैं उसको स्वीकार भी नहीं करते. यह साहस भी नहीं है. तो आप जो बात कह रहे हैं, वह यह है कि 1949 में बाबरी मस्जिद में जो मूर्तियां चोरी-चोरी रखी गई थीं, उस षड्यंत्र में हनुमान प्रसाद पोद्दार भी शामिल थे, जिसको सर्वोच्च न्यायालय ने अपराध कहा. उसी सर्वोच्च न्यायालय ने जिसमें बाबरी मस्जिद की जमीन राम मंदिर को दे दी, उसी ने यह कहा कि 1949 में जो किया गया था वह अपराध था और 1992 में जो किया गया था वह अपराध था, तो उसी अपराध में हनुमान प्रसाद पोद्दार भी शामिल थे.

अक्षय मुकुल

मतलब आप भी जानते हैं कि रामबहादुर राय संघ के काफी करीब हैं. उन्होंने 2014 में नई सरकार के आने के बाद लिखा है. मैं उनकी पत्रिका का नाम भूल रहा हूँ जिसके वह संपादक थे. उन्होंने मुझे बताया तो मैं बोला कि कुछ ऑन रिकॉर्ड होना चाहिए. उन्होंने बहुत ढूंढा जनसत्ता में. किसी ने शायद अप्रवासी जी ने लिखा था, लेकिन नहीं मिला तो फिर उन्होंने बोला मैं फिर से इसमें लिख रहा हूँ. उन्होंने लिखा है तब मैंने साइड के लिए जिम्मेदारी ली है. हमें तो पता नहीं था. तो सिर्फ यह कहना कि हम धार्मिक पुस्तकें छापते हैं और आप इसके खिलाफ़ हैं, आप गीता प्रेस के बारे में भ्रांति फैला रहे हैं, गलत है. दो गीता प्रेस हैं. एक गीता प्रेस वो है, जो धार्मिक पुस्तकें छापता है. रामचरितमानस, हनुमान चालीसा छापता है. उससे किसी को क्या दिक्कत है. लेकिन आप बाकी जो चीज कर रहे हैं, वह राजनीति है. सनातन धर्म के नाम पर एक बड़ी कोरियोग्राफी चल रही है. 1920 का दशक बड़ा अहम दशक है क्योंकि इसी दशक में आरएसएस आता है, हिंदू महासभा पहले से ही है, गीता प्रेस बनता है. तो यह बड़ा अहम दशक है. मैं आपको एक छोटी चीज बताऊँ. गोलवलकर आयुर्वेद चिकित्सा के लिए केरल जाते हैं. वह कहते हैं कि मैं यहाँ आया हूँ, पर मुझे गीता प्रेस की चीजें कैसे मिलेंगी? वहाँ से आरएसएस का एक कार्यकर्ता लिखता है कि कोई तरीका ढूँढिए कि केरल में कल्याण आता रहे और उसका इंतजाम किया जाता है. जब गोलवलकर गोरखपुर जाते हैं तो कहते हैं मैं तो आया ही पहली बार हूँ. मैं हनुमान प्रसाद पोद्दार से मिलना चाहता हूँ कि आदमी कौन है.

अपूर्वानंद

गांधी की हत्या के बाद प्रतिबंध लगता है, तो छूटने के बाद उनका स्वागत हनुमान प्रसाद पोद्दार कर रहे हैं.

अक्षय मुकुल

एक मीटिंग में अटल बिहारी वाजपेयी हैं और दूसरी बनारस की मीटिंग में हनुमान प्रसाद पोद्दार उनको इंट्रोड्यूस कर रहे हैं. यह सीआईडी की रिपोर्ट से है. सीआईडी आर्काइव्स से है कि हनुमान प्रसाद पोद्दार ने इंट्रोड्यूस किया और बाहर हमेशा की तरह सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट खड़े चिल्ला रहे हैं, नारे लगा रहे हैं और अंदर टाउन हॉल में यह चल रहा है.

अपूर्वानंद

यानी हनुमान प्रसाद पोद्दार और गीता प्रेस अपने आपको गांधी की हत्या के बाद भी गांधी की हत्या के षड्यंत्र में या उसके लिए माहौल बनाने वालों, जिनको खुद सरदार पटेल ने जिम्मेदार बताया था, उनका स्वागत करने में हनुमान प्रसाद पोद्दार को कोई परेशानी नहीं थी. इसलिए अक्षम मुकुल का यह मानना है कि यह अनैतिक है कि गांधी के हत्यारों के साथ या गांधी की हत्या के समर्थन वाली विचारधारा के साथ खड़ा होने वालों को गांधी शांति पुरस्कार दिया जा रहा है.

अक्षय मुकुल

एकदम.

अपूर्वानंद

जो गांधी के नैतिक संसार से बिल्कुल अलग, उसके विपरीत नैतिक संसार खड़ा कर रहे हैं, उनको यह पुरस्कार दिया गया है. इसलिए आपको इससे ऐतराज है. बहुत-बहुत शुक्रिया. आपने यह चर्चा सुनी. मेरा आपसे अनुरोध है कि आप अक्षय मुकुल की किताब पढ़ें. जो हिंदी पढ़ते हैं उनके लिए 'गीता प्रेस और हिंदू भारत का निर्माण' और जो अंग्रेजी पढ़ते हैं वो पढ़ सकते हैं 'गीता प्रेस एंड द मेकिंग ऑफ हिंदू इंडिया'. बहुत-बहुत शुक्रिया.

अक्षय मुकुल

धन्यवाद.

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The Real Ram Janmabhoomi Story

(कड़वी कॉफी का यह पॉडकास्ट सब्सटेक के अलावा गूगल और स्पॉटिफ़ाई पर भी उपलब्ध है. पॉडकास्ट के वीडियो को आप हमारे यूट्यूब पेज पर जाकर देख सकते हैं.)

 

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